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बिहार: मुख्यमंत्री पद के 7 दावेदार

राजनीति राज्य संपादकीय

बिहार: मुख्यमंत्री पद के 7 दावेदार

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बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar elections) की तैयारियों के बीच राजनीतिक दांव-पेंच और सीटों के बंटवारे की गहमागहमी में कई नेताओं ने बड़े-बड़े सपने देखने शुरु कर दिये हैं। अगर पूछा जाए तो सभी प्रदेश के विकास के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने का दावा करते हैं, लेकिन मन-ही-मन बिहार के मुख्यमंत्री (Chief minister) की कुर्सी पर बैठने का ख्वाब पाले बैठे हैं। ऐसे ही कुछ घोषित- अघोषित नेताओं और उनकी संभावनाओं पर एक नज़र –

1. नीतीश कुमार, जेडीयू

नीतीश कुमार पिछले 15 सालों से बिहार पर राज कर रहे हैं, और अपनी राजनीतिक सूझबूझ और तगड़े विपक्ष के अभाव में एक बार फिर जीत की राह पर दिख रहे हैं। वैसे एनडीए की ओर से मुख्यमंत्री (Chief minister) पद के दावेदार नीतीश कुमार की राह इस बार आसान नहीं लग रही और मजदूरों के पलायन, बाढ़ और कोरोना से निपटने की तैयारी जैसे कई मुद्दों पर उनकी विफलता सामने आई है। लेकिन राजनीति के इस धुरंधर खिलाड़ी को मात देना आसान नहीं। वैसे भी लगभग हर चुनाव के बाद इनके सामने बहुमत की समस्या खड़ी हो रही है, लेकिन ये जोड़-तोड़ कर हर बार मुख्यमंत्री (Chief minister) की कुर्सी पाने में कामयाब हो जाते हैं। नीतीश कुमार कई वर्षों से विधानसभा का चुनाव नहीं लड़े और पिछले तीन बार से वे विधान परिषद् से चुनकर सदन में पहुंच रहे हैं.

इस बार भी इन्हें एक तरफ बीजेपी का सहयोग मिल रहा है तो दूसरी तरफ हम (HUM) और वीआईपी (VIP) जैसी पार्टियों का साथ मिल गया है। चुनावी समीकरणों के मुताबिक, इनके पास दलित वोटों को अपनी झोली में भरने के तमाम जुगाड़ हैं। बिहार के बारे में एक कड़वी सच्चाई ये है कि मतदान के लिए विकास, रोजगार, गरीबी जैसे तमाम मुद्दों पर जाति का समीकरण ही भारी पड़ता है। यही वजह है कि जेडीयू ने अपनी आधी से ज्यादा सीटों पर पिछड़ा-अतिपिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों को टिकट दिया है।

2. तेजस्वी यादव, आरजेडी

लालू प्रसाद के सुपुत्र और पूर्व उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव महागठबंधन की ओर से मुख्यमंत्री (Chief minister) पद के दावेदार हैं। लालू प्रसाद की विरासत को बचाने और बढ़ाने की कोशिश में जुटे तेजस्वी यादव महागठबंधन के नेता हैं और इन्हें कांग्रेस और वामदलों समेत कई छोटे दलों का समर्थन प्राप्त है। अगर जनता ने नीतीश कुमार की सरकार के खिलाफ वोट दिया, तो इनके मुख्यमंत्री (Chief minister) बनने के अच्छे आसार हैं। लेकिन लालू प्रसाद के समय की अराजकता को लोग भूले नहीं हैं, और यही इनके इमेज को नुकसान पहुंचा रहा है। दूसरी समस्या ये है कि इनके पास लालू प्रसाद जैसा जनता की नब्ज पहचानने और उनका समर्थन हासिल करने का हुनर नहीं है। इसकी वजह शायद ये है कि लालू प्रसाद जमीन से ऊपर उठे थे और ऊंचाईयों पर पहुंचने के बाद भी जमीन से जुड़े रहे, जबकि तेजस्वी ऊपर से आये राजनेता हैं, और अब तक जमीन से जुड़ नहीं पाये हैं। फिर भी अगर सत्ता-विरोधी लहर चली, और सितारों ने थोड़ा साथ दिया, तो ये बिहार के अगले मुख्यमंत्री (Chief minister) हो सकते हैं।

3. नित्यानंद राय, बीजेपी

इन्हें बिहार की राजनीति का डार्क हॉर्स माना जा रहा है। इनकी गिनती बीजेपी के वरिष्‍ठ नेताओं में होती है, और ये केंद्र सरकार में गृह राज्यमंत्री भी हैं। ये बिहार में बीजेपी अध्‍यक्ष के रूप में भी काम कर चुके हैं। ये चुनाव नहीं लड़ रहे, लेकिन बिहार में बीजेपी की जीत इन्हीं की जीत मानी जाएगी। साथ ही ये गृह मंत्री अमित शाह के करीबी माने जाते हैं। ऐसे में अगर बीजेपी अपने दम पर बहुमत के करीब पहुंच जाती है, तो अन्य छोटे दलों की मदद से अपनी सरकार बनाने की पूरी कोशिश करेगी। ऐसे में नित्‍यानंद राय, मुख्यमंत्री (Chief minister) की रेस में सबसे आगे होंगे।

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4. चिराग पासवान, एलजेपी

रामविलास पासवान की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश में जुटे चिराग पासवान ने इस बार बड़ा दांव खेला है। एनडीए से बाहर निकलकर जहां एक ओर सत्तासीन जदयू से दूरी बनाई, वहीं बीजेपी के साथ पूरे सहयोग का दावा भी किया। ऐसे में इन्हें सत्ता-विरोधी लहर का फायदा मिल सकता है। वहीं चिराग ने बीजेपी और जेडीयू के तमाम बागी नेताओं को अपनी पार्टी से टिकट थमा दिया है। ऐसे में जिन उम्मीदवारों को अपनी पार्टी से टिकट नहीं मिला, वो एलजेपी में शामिल हो रहे हैं। अब अगर इनमें से आधे उम्मीदवार भी जीत गये, तो चिराग पासवान किंग मेकर की भूमिका में आ जाएंगे। पार्टी ने जेडीयू के सभी उम्मीदवारों के खिलाफ अपने उम्मीदवार खड़े करने का ऐलान किया है। ऐसे में अगर इनके उम्मीदवार, आरजेडी या जदयू के उम्मीदवारों को हराने में भी थोड़ी भूमिका निभा पाए, तो ये इनकी कामयाबी होगी। क्योंकि ऐसी स्थिति में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी के रुप में उभरेगी और तब चिराग के लिए मुख्यमंत्री (Chief minister) पद की दावेदारी करने का बेहतर मौका होगा, बशर्ते इनके पास बहुमत के लिए जरुरी अपनी सीटें भी हों।

5. उपेन्द्र कुशवाहा, RSLP

महागठबंधन से अलग हुए RLSP (राष्ट्रीय लोक समता पार्टी) के अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने असदुद्दीन ओवैसी (AIMIM), देवेंद्र प्रसाद यादव (SJDD), रामजी गौतम (BSP) और संतोष पांडेय (सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी) के साथ मिलकर “ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट” बनाया है। इस फ्रंट में जनवादी पार्टी (सोशलिस्ट) समेत कुल 6 पार्टियां शामिल हैं और इनकी ओर से मुख्यमंत्री (Chief minister) पद के उम्मीदवार उपेंद्र कुशवाहा होंगे।

बिहार में ऐसी कई छोटी पार्टियां हैं, जिन्होंने ना बीजेपी का साथ पसंद है और ना ही आरजेडी का। ये लोग किसी ऐसा ही गठबंधन की तलाश में थे। ऐसे में माना जा रहा है कि ओवैसी और देवेंद्र यादव की साथ में एंट्री से बिहार में तीसरे मोर्चे की ताकत बढ़ी है। ये वही मुस्लिम-यादव गठजोड़ है जिसके लिए राजद, जेडीयू और एलजेपी जी-तोड़ कोशिश कर रहे हैं।

राजनीति विश्लेषकों का मानना है कि ओवैसी की मौजूदगी से मुसलमानों वोटरों पर खासा प्रभाव पड़ेगा। ओवैसी की पार्टी बीते कुछ सालों से बिहार के सीमांचल क्षेत्र में काफी सक्रिय है। ऐसे में जब एक ओर खुद ओवैसी मैदान में हैं और दूसरी ओर देवेन्द्र यादव जैसे यादव समाज के नेता से गठबंधन कर लिया है, तो इससे सीमांचल क्षेत्र में रारजेडी को खासा नुकसान हो सकता है। उपेन्द्र कुशवाहा भले ही मुख्यमंत्री (Chief minister) बनने लायक बहुमत हासिल नहीं कर सकें, लेकिन किसी के मुख्यमंत्री बनने का सपना जरुर तोड़ सकते हैं।

6. पप्पू यादव, जन अधिकार पार्टी (JAP)

राजनीति के पुराने खिलाड़ी पप्पू यादव इस बार बड़ी तैयारी के साथ बिहार की राजनीति में उतर रहे हैं। ये पिछले लोकसभा चुनाव में मधेपुरा सीट से हार गए लेकिन इस बार उनका दावा है कि बिहार में उनकी पार्टी काफी अच्छा करेगी। इन्होंने एक नई पार्टी जन अधिकार पार्टी (जाप) बनाई है और चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी, बीएमपी और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) के साथ मिलकर नए गठबंधन की नींव रखी है।

इस गठबंधन को ‘प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक अलायंस’ (पीडीए) नाम दिया गया है। प्रदेश की कई छोटी-बड़ी पार्टियों और संगठनों जैसे वंचित बहुजन अगाड़ी, ऑल इंडिया माइनॉरिटी फ्रंट, ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस, अर्जक अधिकार दल, आजाद भारत पार्टी, इंडियन बिजनेस पार्टी, शोषित समाज पार्टी, राष्ट्रीय जन उत्थान पार्टी, पिछड़ा समाज पार्टी और भारतीय संगम पार्टी ने इस गठबंधन को समर्थन देने का ऐलान किया है।

प्रगतिशील लोकतांत्रिक गठबंधन ने प्रथम चरण के लिए अपने घटक दलों के बीच सीट बंटवारे का एलान कर दिया है। इनमें से 33 उम्मीदवार जन अधिकार पार्टी के और 16 एसडीपीआई और शेष सीटों पर गठबंधन के प्रत्याशी होंगे। पप्पू यादव ने फिलहाल खुद को मुख्यमंत्री (Chief minister) पद के दावेदार के रुप में पेश नहीं किया है, लेकिन सबसे बड़ी पार्टी के नेता और गठबंधन के संयोजक होने के नाते गठबंधन का चेहरा वही होंगे। इन्होंने उपेन्द्र कुशवाहा, चिराग पासवान और कांग्रेस समेत कई गैर-बीजेपी पार्टियों को अपने साथ शामिल होने का न्यौता दिया है। ऐसे में अगर ये गठबंधन सम्मानजनक सीटें हासिल कर लेता है, तो सत्ता समीकरणों पर खासा असर डाल सकता है।

7. पुष्पम प्रिया चौधरी, प्लूरल्स पार्टी

बिहार की राजनीति में सबसे नया चेहरा है – पुष्पम प्रिया चौधरी। छह माह पहले तक शायद ही बिहार की जनता इनका नाम सुना हो, लेकिन अब ये अखबारों से लेकर सड़कों तक सुर्खियों में है। दरभंगा जिले की रहने वाली पुष्पम जेडीयू नेता और पूर्व MLC विनोद चौधरी की बेटी हैं। ये हाल ही में लंदन स्कूल ऑफ इकॉनमिक्स से पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर्स की डिग्री लेकर लौटी हैं।

इन्होंने कुछ महीने पहले ही ‘प्लूरल्स’ नाम से अपनी एक पार्टी बनाई और सीधे खुद को बिहार के मुख्यमंत्री (Chief minister) पद का दावेदार घोषित कर दिया। इनकी पार्टी का लोगो है – पंख लगा हुआ घोड़ा। ये बिहार को भी इसी तरह के पंख लगाकर विकास की उड़ान देने का वादा कर रही हैं और फिलहाल इस चुनाव में जमीन पर उतरकर मेहनत करती दिख रही हैं। ये वोटर्स तक पहुंचने के लिए खास अभियान बिहार का खोंइछा चला रही हैं। इसके तहत मिथिलांचल से ताल्लुक रखने वालीं पुष्पम, महिला मतदाताओं से खोंइछा मांग रही हैं। आपको बता दें कि मिथिलांचल में खोंइछा को सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।

प्लूरल्स पार्टी की अध्यक्ष पुष्पम प्रिया चौधरी ने पहले चरण में 71 सीटों पर होने वाले चुनाव को देखते हुए अपने 40 उम्मीदवारों के नामों की घोषणा की है। दिलचस्प बात ये है कि इनके सभी उम्मीदवार सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षक, किसान, प्रोफेसर, वकील, इंजीनियर, मर्चेंट नेवी, डॉक्टर जैसे पेशेवर और पढ़े-लिखे, साफ-सुथरी छवि वाले लोग हैं। साथ ही इन सभी ने धर्म के कॉलम में अपना धर्म “बिहारी” बताया है। इस चुनाव में इनके एक-आध सीट जीतने की संभावना भी कम है, फिर भी जाति और धर्म आधारित बिहार की राजनीति में इनका प्रवेश, प्रबुद्ध जनता के लिए शुद्ध हवा के झोंके जैसा है।

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