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सूर्यग्रहण: बायोलॉजी विथ एस्ट्रोलॉजी!

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सूर्यग्रहण: बायोलॉजी विथ एस्ट्रोलॉजी!

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solar eclipse in India

पायथागोरस से लगभग 2 हज़ार साल बाद, स्विट्जरलैंड के डॉक्टर पारासेल्सस (1493-1541) ने खगोलीय सिद्धांत को चिकित्सा पर लागू किया..। उनका शोध कहता है कि कोई भी आदमी तभी बीमार पड़ता है, जब उसके शरीर और उसके जन्म के वक्त फ़लक में मौजूद रहे तारामंडलों के बीच लयबद्धता किसी वजह से टूट जाती है..। पारासेल्सस किसी भी मरीज़ को दवा देने से पहले उसकी कुंडली देखते थे..। इतिहास गवाह है कि उन्होंने कई लाइलाज मरीज़ों को ठीक किया..। पारासेल्सस की कही एक बात काफी मायने रखती है – आपके अंदर की लयबद्धता, हार्मनी को ठीक किए बिना आपकी बीमारी तो ठीक की जा सकती है, आपको स्वस्थ नहीं बनाया जा सकता..। पारासेल्सस के लिए स्वास्थ्य का मतलब सिर्फ बीमारी का ना होना नहीं, बल्कि इससे बढ़कर था..।

पारासेल्सस की बात को 1950 में जिओर्जी गियार्डी नाम के वैज्ञानिक के शोध से पुष्टि मिली..। गियार्डी ने अपने प्रयोगों से साबित किया कि पूरा ब्रह्मांड एक शरीर की तरह जुड़ा है..। दूर से दूर सितारे में भी अगर कोई बदलाव होता है तो कुछ असर हम पर भी यकीनन होगा..। उसके बाद क्वांट्म फिज़िक्स ने इस बात में कोई शुबहा बाकी नहीं छोड़ा..। कभी वक्त हो तो quantum entanglement को गूगल करके देखिए..। परमाणविक कण एक दूसरे से इस कदर जुड़े होते हैं कि अगर आप यहां एक कण को छेड़ते हैं तो खरबों प्रकाश वर्ष दूर भी दूसरे कण में भी वैसा ही बदलाव ज़रूर होगा..। ये सिद्धांत व्यवहारिक स्तर पर लागू होगा तो आज के सुपरकंप्यूटर कल के बच्चों के खिलौने बन जाएंगे..।

अनेकों वेद ऋचाएं हैं, जो यही कहती हैं कि अंतरिक्ष में सब कुछ एक दूसरे से जुड़ा है..। देखा जाए तो हम भी सितारों के ही कणों से निर्मित हैं..। लेकिन एक ऐसे वैज्ञानिक भी हुए हैं जिन्होंने अंतरिक्ष की घटनाओं का हमारे खून के साथ ताल्लुक साबित करके दिखाया..। जापान के डॉक्टर तामात्तो महिलाओं के रक्त पर दो दशकों से शोध कर रहे थे..। उन्होंने पाया कि महिलाओं का खून पुरुषों के खून के मुकाबले एक चीज़ में ख़ास है..। वो ये कि महिलाओं का खून माहवारी और गर्भावस्था में पतला हो जाता है..। लेकिन तामात्तो को एक बात और पता चली..। जब तेज़ सौर तूफान आते हैं तो पुरुषों का खून भी पतला हो जाता है..। जब खून तक खगोलीय घटनाओं से प्रभावित हो सकता है तो हम, आप या और कुछ क्यों नहीं….?

(लेखक एवं पत्रकार अवर्ण दीपक के फेसबुक व़ॉल से साभार)

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