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फसल काट पाएंगे तेजस्वी?

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फसल काट पाएंगे तेजस्वी?

Challenges ahead for Tejasvi yadav in Bihar
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जब राजनीति में उम्मीदों की बात होती है, तो सबसे ज्यादा चर्चा नये चेहरों की होती है। इनकी जीत का कोई दावा नहीं करता, लेकिन मन-ही-मन आस लगाये रहते हैं। जनता से लेकर नेता तक….सभी परिवर्तन चाहते हैं, लेकिन सीना ठोककर कोई नहीं कहता। परिणाम में उलटफेर की लोगों को उम्मीद भी होती है और आशंका भी। लालू प्रसाद की अनुपस्थिति में तेजस्वी यादव ने 15 सालों से सत्ता के शीर्ष पर बैठे नीतीश कुमार को ललकारा है। पिछले चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी और उसके नेता से जनता को उम्मीदें भी हैं। लेकिन सवाल ये है कि क्या राजनीति के अखाड़े में तेजस्वी… नीतीश जैसे मंझे हुए खिलाड़ी को टक्कर देने की स्थिति में हैं?

बिहार में इसी साल अक्तूबर-नवंबर में विधानसभा चुनाव होने हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष…चुनावी तैयारियों में जुट गया है। लेकिन मुख्य विपक्षी पार्टी… राष्ट्रीय जनता दल (राजद) कई मोर्चों पर घिरती नजर आ रही है। पार्टी के मुखिया लालू प्रसाद यादव रांची जेल में बंद हैं…इसके नेता चुनावी मौसम में या तो पाला बदलकर निकल रहे हैं या फिर विरोध का झंडा बुलंद कर रहे हैं। वहीं घटक दलों की ओर भी तेजस्वी यादव पर दबाव बढ़ता जा रहा है।

टूट-फूट का दौर जारी

शनिवार को राजद की टिकट पर दो बार विधायक चुने गये कद्दावर नेता विजेंद्र यादव ने पार्टी छोड़ दी। विजेंद्र यादव तीस सालों से राजद में रहे हैं। ये साल 2000 से 2010 तक लगातार विधायक रहे और राजद के प्रदेश उपाध्यक्ष का पद भी संभाला। उनके भाई अरुण यादव भी राजद विधायक हैं। भोजपुर में किंगमेकर के तौर पर चर्चित विजेंद्र यादव का आरोप है कि राजद में इन दिनों पुराने लोगों को सम्मान नहीं मिल रहा है। उन्होंने रघुवंश प्रसाद सिंह का उदाहरण देते हुए कहा कि जब उनकी कद्र नहीं हो रही, तो बाकियों की क्या बिसात है।

वरिष्ठों को भी शिकायत

वहीं, पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह भी पार्टी छोड़ने के मूड में दिख रहे हैं। 74 वर्षीय रघुवंश प्रसाद सिंह ने कोरोना से जंग जीत ली है और दो-तीन दिनों में उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिल जाने की संभावना है। किसी जमाने में लालू प्रसाद और रघुवंश प्रसाद सिंह के कट्टर विरोधी रहे रामा सिंह को राजद में शामिल किये जाने से वो नाराज चल रहे हैं। चर्चा है कि लालू प्रसाद ने खुद रघुवंश बाबू से फोन कर उन्हें मनाने की कोशिश की है। लेकिन, रामा सिंह के मामले में रघुवंश प्रसाद समझौता करने को तैयार नहीं हैं। उधर, तेजस्वी यादव रामा सिंह को शामिल करने को लेकर अड़े हुए हैं। दरअसल राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद और तेजस्वी यादव को आगामी चुनाव के मद्देनजर रामा सिंह ज्यादा फायदेमंद नजर आ रहे हैं।

रघुवंश प्रसाद सिंह (फाइल फोटो)

वंशवाद की राजनीति का आरोप

पिछले हफ्ते आरजेडी के पांच विधान पार्षदों ने भी पाला बदलकर जदयू की सदस्यता ग्रहण कर ली। इन सभी नेताओं ने अपने इस कदम के पीछे तेजस्वी यादव को वजह बताया। इनका कहना है कि वे आरजेडी की मौजूदा वंशवाद की राजनीति और तेजस्वी यादव के नेतृत्व से असंतुष्ट थे। चुनावी राजनीति पर भले ही इसका ज्यादा असर ना पड़े, लेकिन इसकी वजह से विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष राबड़ी देवी की कुर्सी खतरे में पड़ गई है। 75 सदस्यों वाली बिहार विधान परिषद में, राजद के पार्षदों की संख्या आठ से घटकर तीन हो गयी है। ऐसे में राबड़ी देवी के लिए नेता प्रतिपक्ष का पद बचाना मुश्किल है।

तेजस्वी यादव के साथ जीतन राम मांझी

महागठबंधन में भी दरार

महागठबंधन के स्तर पर भी तेजस्वी यादव को काफी विरोध झेलना पड़ रहा है। प्रमुख घटक दल हम के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व सीएम जीतनराम मांझी नाराज चल रहे हैं। उन्होंने एक बार फिर महागठबंधन में समन्वय समिति बनाने को लेकर अल्टीमेटम दिया है। सियासी गलियारों में ये चर्चा भी है कि जीतनराम मांझी महागठबंधन छोड़ कर दुबारा जदयू में शामिल हो सकते हैं।

लेकिन असली मामला ये है कि जीतनराम मांझी को तेजस्वी यादव के मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर ऐतराज है। वो चाहते हैं कि बिहार चुनाव में सीट शेयरिंग से लेकर मुख्यमंत्री उम्मीदवार तक के सभी मुद्दों पर गठबंधन में चर्चा की जानी चाहिए और सबकी सहमति से फैसला होना चाहिए। राजद इसके लिए तैयार नहीं है।

महागठबंधन के एक और सहयोगी रालोसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने भी कुछ दिनों पहले बयान दिया था कि खुद को महागठबंधन दल का नेता घोषित कर देने से कोई महागठबंधन का नेता नहीं बन जायेगा। इसे लेकर सभी घटक दलों की बैठक होगी, जिसके बाद सीटों के बंटवारे से लेकर नेता के चयन पर भी चर्चा होगी।

हम भी हैं मैदान में!

लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान भी अपने लिए नई संभावनाएं तलाश रहे हैं। उन्होंने अपनी पार्टी के नेताओं व कार्यकर्ताओं से हर परिस्थिति के लिए तैयार रहने की अपील की है। उन्होंने कहा कि बिहार में एनडीए गठबंधन का स्वरूप बदल भी सकता है। इसलिए हमें अपनी तैयारी ऐसी रखनी चाहिए कि विधानसभा का चुनाव अकेले भी लड़ सकें।

पप्पू यादव, अध्यक्ष, जन अधिकार पार्टी

जन अधिकार पार्टी के अध्यक्ष और  मधेपुरा के पूर्व सांसद पप्पू यादव खुले तौर पर चिराग पासवान के समर्थन में उतर आये हैं। उनका कहना है कि अगर कांग्रेस नेतृत्व और राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद मिलकर पहल करें और नया चेहरा पेश करके विधानसभा चुनाव में उतरें तो यहां नई सरकार का बनना तय है। यह चेहरा चिराग पासवान, डाॅ. रघुवंश प्रसाद सिंह, प्रशांत किशोर, पप्पू यादव या दूसरा कोई भी हो सकता है। लेकिन लालू परिवार का कोई मेंबर जनता को स्वीकार नहीं। उन्होंने तेजस्वी पर ये भी आरोप लगाया कि 5 सालों से राज्य की राजनीति की धुरी होने के बावजूद, वे कई मौकों पर अपने दायित्वों से पीछे हट चुके हैं।

क्या तेजस्वी हैं मुद्दा?

राजनीति में लोग नहीं, सत्ता अहम होती है। राजद से तमाम घटक दलों के नेताओं को लगता है कि अगर किसी तरह दूसरी पार्टियों ने समर्थन दिया, तो मैं भी मुख्यमंत्री बन सकता हूं। जीतनराम मांझी पहले भी इसी तरह किस्मत से मुख्यमंत्री बने थे, और उनका सपना टूटा नहीं है। अब चाहे वो उपेन्द्र कुशवाहा हों, या जीतनराम मांझी…. चिराग पासवान हों या पप्पू यादव….सभी को लगता है कि अगर बाकी दलों ने साथ दिया, तो वो भी मुख्यमंत्री बनने की योग्यता रखते हैं। सभी तो लगता है कि तेजस्वी यादव की एकमात्र काबिलियत….उनका लालू प्रसाद का बेटा होना है। वरना राजनीति में….जनता में…. उनकी कोई खास पैठ नहीं। इसलिए कोई वंशवाद का मुद्दा उठा रहा है….तो कोई उनकी तानाशाही का…और कोई उनके तौर-तरीकों का।

तेजस्वी यादव और लालू प्रसाद (फाइल फोटो)

तेजस्वी यादव को याद रखना चाहिए कि प्लेट में सजाकर सत्ता तो उनके पिता को भी नहीं मिली थी…इसलिए उन्हें भी कुर्सी ऐसे नहीं मिलेगी। लालू प्रसाद राजनीति के खेल में अपने शातिर दिमाग और सूझबूझ की वजह से तमाम दिग्गजों को परास्त करते हुए सत्ता के शीर्ष तक पहुंचे थे। तेजस्वी के सामने भी वैसी ही चुनौतियां हैं, वैसे ही दिग्गज विरोधी हैं। लेकिन उनके लिए फायदे की स्थिति ये है कि वो बिहार की सबसे बड़ी पार्टी के नेता हैं और अगर उनकी पार्टी ने ठीक-ठाक सीटें जीत लीं…तो उनका मुख्यमंत्री बनना तय है। उन्हें बस इतना करना है कि अपने सहयोगियों को किसी तरह संभाल लें, अपने विरोधियों की संख्या कम करें और सत्ता-विरोधी लहर का फायदा उठाते हुए जनता को अपने नेतृत्व पर विश्वास दिलाएं। यकीन मानिए…लालू प्रसाद ने इतने वर्षों मेें जो जमीन तैयार की है…उसे बचाना भर है…फसल तो अपने-आप उनके हिस्से में आ जाएगी।

Shailendra

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