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किंग मेकर बनना चाहते हैं चिराग!

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किंग मेकर बनना चाहते हैं चिराग!

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chirag wants to be the king maker in bihar election

बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar elections) के मद्देनज़र सबसे बड़ी राजनीतिक खबर है – लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) के अध्यक्ष चिराग पासवान (chirag paswan) का गठबंधन छोड़कर स्वतंत्र रूप से 143 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान करना। इस घोषणा से ना सिर्फ जदयू (JDU) में बेचैनी फैल गई है, बल्कि राजद और बीजेपी भी नफे-नुकसान के गणित में उलझ गये हैं। अब सवाल ये है कि लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) के इस फैसले से किसको फायदा होगा और किसको नुकसान? लेकिन उससे भी बड़ा सवाल है कि चिराग पासवान ने ये फैसला आखिर क्यों लिया?

पिता का सपना

राजनीतिक हलकों में जो चर्चा है कि उसके मुताबिक इस फैसले की सबसे बड़ी वजह थी – रामविलास पासवान की एक बार बिहार का मुख्यमंत्री बनने की चाहत। अपने राजनीतिक सफर में रामविलास पासवान बिहार में कभी भी लालू प्रसाद या नीतीश कुमार जैसा कद नहीं बना पाए। उन्हें अक्सर गठबंधन की सरकार में मंत्री पद से संतोष करना पड़ा। लेकिन वो चाहते हैं कि कम से कम उनका बेटा इस सपने को पूरा करे। राजनीतिक तौर पर ना तो रामविलास और ना ही चिराग इतने नासमझ हैं कि अकेले अपने दम पर सरकार बनाने का सपना देखें। लेकिन उन्हें पता है कि अगर रणनीति सही साबित हुई तो वो किंग मेकर बन सकते हैं। और क्या मालूम…चुनाव (Bihar elections) के बाद ऐसी स्थिति बन जाए कि बड़े दलों के घमासान में उन्हें ही मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल जाए!! इसलिए उन्होंने सिर्फ नीतीश कुमार से दूरी बनाई है…. प्रदेश बीजेपी या केन्द्र की मोदी सरकार से नहीं।

पिता रामविलास पासवान के साथ चिराग पासवान (फाइल फोटो)

पहले से चल रही थी प्लानिंग

रामविलास पासवान ने नवंबर 2019 में ही कार्यकर्ताओं से बिहार के सभी 243 सीटों पर अपनी तैयारी रखने की बात कही थी। इसके अलावा उन्होंने सभी कार्यकर्ताओं से कहा था कि वो अपने क्षेत्र में जाए और अधिक से अधिक सदस्य बनाए। लोजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद चिराग पासवान ने भी साफ कर दिया था कि पार्टी जैसी चल रही है, वैसे अब नहीं चलेगी। इसी रणनीति के तहत लोजपा के नेताओं ने बिहार सरकार की योजनाओं और नीतियों के खिलाफ धीरे-धीरे बोलना शुरू कर दिया था। कुछ महीने पहले अपने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए चिराग ने भी पार्टी को 143 सीटों पर चुनाव (Bihar elections) लड़ने के लिए तैयारी करने का आदेश दिया था।

पहले भांपा जनता का मूड

इतना तो साफ है कि ये अचानक लिया गया फैसला नहीं है, बल्कि इस राजनीतिक ड्रामे की पटकथा काफी पहले से ही लिखी जा रही थी। लोजपा अध्यक्ष चिराग पासवान ने जनता की नब्ज जानने के लिए बिहार फर्स्ट-बिहारी फर्स्ट यात्रा निकाली। इसके तहत वे पूरे राज्य में घूमे और अपनी पार्टी की सोच को लोगों तक पहुंचाया। इससे एक तरफ पार्टी मजबूत हुई तो दूसरी तरफ पार्टी की पहुंच की जमीनी हकीकत का पता चला। इस दौरान उन्हें इतना समझ में आ गया कि जनता बदलाव चाहती है और वो मौजूदा नीतीश सरकार से ज्यादा खुश नहीं है। यात्रा के दौरान मिले इसी फीडबैक पर काम करते हुए ही उन्होंने 143 सीटों पर चुनाव (Bihar elections) लड़ने की योजना बनाई। अब सत्ता में अकेले अपने दम पर वापसी संभव नहीं थी, और सरकार बनाने के लिए एक मजबूत सहयोगी जरुरी था। आरजेडी भी विकल्प हो सकता था, लेकिन यादव बंधुओं के रहते मुख्यमंत्री की कुर्सी मिलती नहीं, इसलिए बीजेपी का हाथ थामे रखा और नीतीश के खिलाफ खड़े हो गये।

सलीके से तोड़ा गठबंधन से नाता

पिछले कुछ महीनों से लोजपा का स्टैंड नीतीश कुमार और जदयू के स्टैंड से बिल्कुल अलग होता था। चुनाव (Bihar elections) के मुद्दे पर भी जहां नीतीश कुमार की पार्टी बिहार में तय समय पर चुनाव कराने की पक्षधर थी, तो वहां लोजपा ने कोरोना और बाढ़ से ग्रस्त बिहार में चुनाव कराने का पुरजोर विरोध किया। चिराग पासवान ने चुनाव आयोग को लिखी चिट्ठी में यहां तक कह दिया कि अभी चुनाव (Bihar elections) कराना आम जनता को जानबूझकर मौत के मुंह में धकेलने जैसा है। लोजपा ने मुख्यमंत्री नीतीश की महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक ‘सात निश्चय योजना’ की भी आलोचना करते हुए भ्रष्टाचार का आरोप लगाया। साथ ही कोरोना महामारी और प्रवासी श्रमिकों के मुद्दे पर भी नीतीश सरकार को विफल बताया। आखिर में गठबंधन के सामने 143 सीटों की मांग रख दी, जिसे ना तो बीजेपी मान सकती थी ना जेडीयू। इस तरफ एलजेपी को गठबंधन से बाहर निकलने का पक्का बहाना मिल गया।

चिराग को कितना फायदा?

अगर चिराग पासवान ने बगावत नहीं की होती, तो गठबंधन में उन्हें 20-25 से ज्यादा सीटें नहीं मिलतीं। इसलिए ये चुनाव (Bihar elections) अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने का बेहतरीन मौका है। इसमें इनके पास खोने को कुछ नहीं और पाने को सारा बिहार है। हार गये तो भी बीजेपी से सहयोग के इनाम और पिता की राजनीतिक वसीयत के तौर पर केन्द्र में मंत्री पद मिल जाएगा….लेकिन अगर 143 में से 20-30 सीटें भी जीत गये…तो सरकार बनाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। वैसे भी रामविलास पासवान ने कहा था कि उनका लक्ष्य 2020 नहीं है, बल्कि 2025 का विधानसभा चुनाव (Bihar elections) है। इस लिहाज से ये अपनी शक्ति परखने का, कुछ गलतियां करने और उससे सीखने का मौका है।

जेडीयू को होगा नुकसान?

चिराग पासवान के फैसले से जदयू में खलबली जरुर है। पहले भी जेडीयू ने लोजपा के लगातार हमले से चिढ़कर कहा था कि उनका गठबंधन भाजपा के साथ है न कि लोजपा के साथ। पार्टी के कुछ नेताओं ने LJP को तुरंत NDA से और रामविलास पासवान को मंत्री पद से हटाने की मांग भी कर डाली। सूत्रों के मुताबिक जेडीयू के नेताओं को आशंका है कि लोजपा उनकी 20-25 सीटों को प्रभावित कर सकती है। वहीं कुछ को ऐसा भी लगता है कि चिराग के फैसले को बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व के मौन समर्थन प्राप्त है। यानी बीजेपी भी जेडीयू के बिना सत्ता की संभावना तलाश रही है। अब इसे खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि राजनीति में कुछ भी संभव है। जाहिर है कई सीटों पर LJP और BJP आपस में सहयोग करेंगे, और कई सीटों पर जेडीयू के वोट कटेंगे। ऐसे में नुकसान सिर्फ जेडीयू का ही है। वैसे जदयू को इसकी आशंका पहले से ही थी और यही वजह है कि चिराग की काट के रूप में जीतन राम मांझी को शामिल किया गया।

बीजेपी को फायदा या नुकसान?

हाल ही में लोजपा का एक पोस्टर सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था जिसमें लिखा था, ‘मोदी से कोई बैर नहीं, नीतीश तेरी खैर नहीं।’ इसी वजह से राजनीतिक हलकों में ऐसी चर्चा है कि चिराग पासवान को जदयू और नीतीश की खिलाफ खड़े होने के लिए भाजपा से समर्थन मिल रहा है। बीजेपी के उम्मीदवारों को चुनाव (Bihar elections) में एलजेपी का सहयोग भी मिलेगा और जेडीयू का भी। इसलिए इन्हें कोई चिंता नहीं है। वहीं अगर त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय संघर्ष हुआ…तो ऐसे में हमेशा बड़ी पार्टियों को फायदा होता है, और इसलिए बीजेपी फायदे में रहेगी। जरा समझिये….जो जनता नीतीश के साथ है, वो भी बीजेपी उम्मीदवार को वोट देगी और जो उसके खिलाफ है, वो भी एलजेपी के जरिए बीजेपी को ही वोट देगी। पार्टी के अपने कट्टर समर्थक और मोदी भक्त तो हैं ही।

आरजेडी को फायदा या नुकसान?

इससे पहले आरजेडी यानी विपक्षी गठबंधन का मुकाबला सीधे तौर पर नीतीश और एनडीए से था। मुकाबले में दो दिग्गज होते, तो सीधे तौर पर नीतीश के साथ या उनके खिलाफ वोट पड़ते। अब एलजेपी ने जनता के सामने कन्फ्यूजन खड़ा कर दिया है। वो मोदी सरकार के साथ हैं, लेकिन नीतीश के खिलाफ। जनता का बड़ा वर्ग ऐसा है जिसे नीतीश सरकार से तो शिकायत है, लेकिन मोदी से नहीं। ऐसे में ये वोट जो पहले राजद को मिल सकते थे, अब नहीं मिलेंगे। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो ना तो नीतीश को मुख्यमंत्री के रुप में देखना चाहते हैं और ना ही तेजस्वी यादव को। उनके लिए बीजेपी समर्थित चिराग पासवान नई उम्मीद हो सकते हैं।

तमाम समीकरणों के बावजूद, जाति-आधारित राजनीति में आकंठ डूबे बिहार के लोगों की असली मंशा क्या है, ये जानना मुश्किल है। बदलाव की छटपटाहट और उचित विकल्पों के अभाव में जनता किसी एक को सत्ता की चाबी सौंपेगी, ऐसा मुश्किल लगता है। इसलिए ऐसी संभावना भी है कि बिहार चुनाव (Bihar elections) में किसी पार्टी को बहुमत ना मिले…और चिराग पासवान का किंग मेकर बनने का सपना पूरा हो जाए।

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