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चुनाव की चौसर, पासवान का पासा!

बिहार चुनाव राजनीति राज्य संपादकीय

चुनाव की चौसर, पासवान का पासा!

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the master plan of Chirag in Bihar Election

बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Election) के पहले चरण के लिए मतदान की तैयारी शुरु हो गई है और प्रचार अभियान के बाद अब गेंद जनता के पाले में है। यूं तो जनता को मोटे तौर पर जेडीयू-भाजपा गठबंधन और आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन के बीच चुनाव करना है, लेकिन इन सबके बीच सबकी नजर लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) पर है। दरअसल इस पार्टी ने जनता और पार्टियां…दोनों को कन्फ्यूज कर रखा है। जनता समझ नहीं पा रही है कि ये नीतीश सरकार के साथ है या मुख्य विपक्षी दल आरजेडी के साथ।

क्या है कन्फ्यूजन?

जनता को कन्फ्यूजन ये है कि पार्टी सत्ता के साथ है या सत्ता के खिलाफ? पार्टी एक तरफ नीतीश के खिलाफ खुलकर खड़ी है और सीएम को जेल तक भिजवाने का वादा कर रही है, तो वहीं दूसरी तरफ बीजेपी के साथ है, उसके पक्ष में वोट देने की अपील कर रही है। चिराग बीजेपी समर्थकों से भी अपील कर रहे हैं कि वे नीतीश मुक्त सरकार के लिए वोट दें। उधर राजनीतिक दलों को ये समझ में नहीं आ रहा है कि लोजपा (LJP) सत्ता विरोधी वोट में सेंध लगायेगी, या सत्ता समर्थक वोट काटेगी?

चिराग ने पहले चरण का चुनाव प्रचार खत्म होने से कुछ ही घंटे पहले ट्वीट किया, ‘आप सभी से अनुरोध है कि जहां भी लोजपा के प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं, उन स्थानों पर लोजपा के प्रत्याशियों को वोट दें और अन्य स्थानों पर भारतीय जनता पार्टी को वोट दें।’

चुनाव (Bihar Election) को कैसे प्रभावित कर सकती है LJP?

पहले चरण के लिए 71 सीट पर होने वाले चुनाव (Bihar Election) में जेडीयू 35 सीटों पर पर चुनाव लड़ रही है और आरजेडी 42 सीटों पर। ऐसे में जेडीयू और आरजेडी के बीच 20 से 25 सीटों पर सीधे मुकाबले की उम्मीद है। इनमें से कई सीट पर लोजपा ने भी अपने उम्मीदवार उतारे हैं। यहां सत्ता विरोधी वोटों के बंटने की आशंका है। वहीं अगर एलजेपी को बीजेपी समर्थकों का भी वोट मिल गया, तो उसके उम्मीदवारों के जीतने के भी आसार हैं। एक बात और ध्यान में रखना चाहिए कि आरजेडी, जेडीयू और एलजेपी (LJP) तीनों का दलितों और पिछड़ों में अपना-अपना वोटबैंक है। यानी दलितों के वोट तीनों में बंटेंगे। ऐसे में बीजेपी की अनुपस्थिति में सवर्णों के वोट अगर एलजेपी को मिले, तो आरजेडी और जेडीयू के लिए जीत की राह मुश्किल हो जाएगी।

इसी तरह कांग्रेस 21 सीटों पर चुनाव (Bihar Election) लड़ रही है, जिसमें से जेडीयू के साथ उसका 7 सीटों पर और बीजेपी के साथ 11 सीटों पर सीधा मुकाबला है। यहां लोजपा (LJP) उम्मीदवार को जितने भी वोट मिलेंगे, वो किसी भी उम्मीदवार के लिए हार-जीत का अंतर पैदा कर सकते हैं। ऐसे में महागठबंधन की रणनीति लोजपा उम्मीदवार के प्रदर्शन पर टिकी है। इन सीटों पर अगर भाजपा के वोट, लोजपा (LJP) को मिलते हैं तो उनके लिए लड़ाई आसान हो जाएगी। पर जब लोजपा खुद अपील कर रही है कि भाजपा को वोट दें, तो इसकी गुंजाइश कम लगती है। वहीं अगर सत्ता-विरोधी वोट कांग्रेस और लोजपा में बंट गये, तो इसका फायदा बीजेपी उम्मीदवार को ही होगा।

LJP को गंभीरता से लेना क्यों जरुरी?

  • पिछले चुनाव में विधानसभा (Bihar Election) की 243 में से 60 से ज्यादा ऐसी सीटें थीं, जहां हार-जीत का अंतर 5 से 10 हजार के बीच था। एलजेपी के उम्मीदवार इतने वोट तो ला ही सकते हैं, कि जीतनेवाला उम्मीदवार हार जाए।
  • एलजेपी (LJP) के उम्मीदवार अगर 20-25 हजार तक वोट हासिल कर पाए, तो नंबर वन प्रत्याशी की हार-जीत पर कितना अंतर पड़ेगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
  • पार्टी ने ज्यादातर उम्मीदवार ऐसे खड़े किये हैं जो बीजेपी, जदयू या आरजेडी के धुरंधर नेता हैं और टिकट नहीं मिलने की वजह से बाग़ी हो गये। अगर जनतता ने साथ दिया और चुनावी समीकरण सटीक बैठे, तो ये जीत भी सकते हैं।
  • एलजेपी की पासवानों में अच्छी पकड़ है और ये वर्ग नीतीश कुमार से खासा नाराज है। ऐसे में इस बार के चुनाव (Bihar Election) में इनका वोट एलजेपी उम्मीदवार को जीत दिलाये या नहीं, लेकिन दलित वोटों के दम पर जीतने की उम्मीद रखनेवाले प्रत्याशी की मिट्टी पलीद कर सकता है।
  • एलजेपी (LJP) को एक तरफ रामविलास पासवान की मौत के बाद सहानुभूति वोट मिलेंगे, तो दूसरी तरफ नीतीश के विरोधियों के वोट। उन्हें राजद विरोधियों के वोट भी मिल सकते हैं और बीजेपी समर्थकों के वोट भी। सभी में से थोड़ा-थोड़ा भी आया, तो एलजेपी (LJP) चुनाव परिणामों को प्रभावित करने की स्थिति में होगी।
  • विभिन्न एक्जिट पोल के मुताबिक मिथिलांचल में लोजपा को 3-5 सीटें मिल सकती हैं। लोजपा ने सत्ता मिलने पर सीतामढ़ी में सीताजी का भव्य मंदिर बनवाने का वादा किया है। पार्टी को इसका भी फायदा मिल सकता है।

एनडीए ने बदली रणनीति

बीजेपी इस बात को अच्छी तरह समझ रही है कि इस बार जनता नीतीश सरकार से नाराज है। इसलिए उनके पोस्टरों पर सिर्फ नरेन्द्र मोदी हैं, नीतीश कुमार नहीं। लोजपा (LJP) को लेकर बीजेपी के तेवर भी नरम पड़ गये हैं। बिहार रैली के दौरान प्रधानमंत्री मोदी द्वारा रामविलास पासवान को याद किए जाने के बाद चिराग को और बल मिल गया है।

उधर जेडीयू का रुख लोजपा के प्रति और भी आक्रामक हो गया है। बीजेपी पर दबाव बनाने के बाद जदयू ने चिराग को आरजेडी से जोड़ना शुरु कर दिया है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह ने साफ आरोप लगाया कि इस चुनाव (Bihar Election) में चिराग पासवान और तेजस्वी यादव में आपसी समझौता है और दोनों सोची-समझी रणनीति के तहत साथ चल रहे हैं। इस तरह जदयू लोजपा को एनडीए-विरोधी ठहराने की कोशिश में जुट गया है।

महागठबंधन ने क्या किया उपाय?

वहीं राजद नेता तेजस्वी यादव ने जनता के कंफ्यूजन का फायदा उठाने की कोशिश करते हुए बयान दे दिया कि जरुरत पड़ी तो सरकार बनाने के लिए चिराग पासवान का भी साथ ले सकते हैं। वैसे, चिराग पासवान भी ऐसी संभावना को खारिज नहीं कर रहे। आखिरकार दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। दोनों के निशाने पर नीतीश सरकार है। इसी वजह से वो अपनी रैलियों में आरजेडी, लालू प्रसाद या तेजस्वी पर निशाना नहीं साधते। वे सीधे तौर पर बिहार में भ्रष्टाचार और विकास को लेकर नीतीश कुमार का नाम ले रहे हैं।

कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं चिराग!

जानकारों का मानना है कि चिराग सोची-समझी रणनीति के तहत एक साथ कई निशाने साध रहे हैं। वो एक तरफ मोदी के ‘हनुमान’ बनकर बीजेपी के साथ सत्ता बांटने का आधार तैयार कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ राजद के साथ जाने के रास्ते को खुला रखा है। चुनाव (Bihar Election) के बाद बीजेपी अगर लोजपा (LJP) से दूरी बनाती है तो चिराग तेजस्वी से नजदीकी बढ़ा सकते हैं। इस तरह चिराग ने कई तरह के विकल्प खुले रखे हुए हैं। और खास बात ये है कि बिहार की राजनीति में ये अनोखा प्रयोग है, जिसे चिराग पासवान ने इस खूबी से अंजाम दिया है कि बड़े-बड़े राजनीतिक धुरंधर, इसकी काट ढूंढ पाने के बजाए सिर्फ दांत पीसते नजर आ रहे हैं।

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