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BJP फिर जीत गई गुजरात का चुनावी रण, जीत की वजह 5 बड़ी बातें

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BJP फिर जीत गई गुजरात का चुनावी रण, जीत की वजह 5 बड़ी बातें

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चुनाव के परिणामों ने इस बात को एक बार फिर से साबित कर दिया है कि गुजरात में भाजपा का गढ़ अभेद्य है. क्योंकि गुजरात के मतदाताओं के मन से माटी के लाल नरेन्द्र मोदी का असर कम नहीं हुआ है. उस पर प्रभावशाली पाटीदारों का 2017 में कांग्रेस के साथ किए गए प्रयोग के बाद थककर वापस भाजपा में लौटना भी इस सफलता की एक अहम वजह रही है.

राहुल गांधी की गैर-मौजूदगी और कांग्रेस का मौन चुनावी अभियान जनता की समझ के बाहर था. कांग्रेस के पारंपरिक मतदाताओं को भी लगा कि पार्टी ने लड़ाई लड़ने से पहले ही हथियार डाल दिए. चुनाव से एक साल पहले भाजपा ने विरोध के सुर उठने से पहले ही मुख्यमंत्री के साथ-साथ पूरा मंत्रिमंडल बदल दिया. बीजेपी ने विजय रूपानी को मुख्यमंत्री पद से हटाकर भूपेंद्र पटेल को सीएम बनाकर एंटी-इनकंबेंसी से होने वाले नुकसान को रोका. वहीं गुजरात के लिए नई आम आदमी पार्टी ने भाजपा को थोड़ा झटका देने की कोशिश की लेकिन जल्द ही यह साफ हो गया कि उसके लिए अभी भाजपा को टक्कर देना आसान नहीं है. वहीं अपने चुनावी अभियान के दौरान पीएम मोदी ने कांग्रेस के उनके खिलाफ प्रयोग किए गए रावण और औकात जैसे अपशब्दों का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए किया. गुजरात में भाजपा की जीत की पांच अहम वजहें हैं.

AAP का हवाई माहौल –
गुजरात में पहली बार उतरी आम आदमी पार्टी ने शुरुआत में अच्छा-खासा माहौल तैयार किया. लेकिन गुजरात में दशकों से स्थापित भाजपा और कांग्रेस की द्विध्रुवीय लड़ाई में जगह बनाने के लिए अभी उसे और वक्त लगेगा. पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने कई रैलियां और रोड शो किये. लेकिन जमीन पर लोग उसे भाजपा यहां तक कि कांग्रेस के विकल्प के तौर पर भी नहीं देख पाए. गुजरात में आप के मुफ्त के वादे भी असरदार साबित नहीं हुए.

पीएम मोदी का जादू –
31 रैलियों और अहमदाबाद-सूरत में दो बड़े रोड शो के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस बार गुजरात में चुनाव अभियान का नेतृत्व किया. अपने गृह राज्य में भाजपा की जीत को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाते हुए जीत हासिल करने के लिए किसी तरह का कोई मौका उन्होंने नहीं छोड़ा. वहीं देश के गृहमंत्री अमित शाह ने गुजरात में करीब एक महीने पहले से चुनाव अभियान की गाड़ी को सुचारू रूप से चलाने के लिए तमाम तरह के नट बोल्ट को कसा. शाह ने यह सुनिश्चित किया की भाजपा की पूरी वोट मशीनरी जमीनी स्तर पर काम करे. पीएम मोदी ने पिछले हफ्ते अहमदाबाद में 50 किमी. लंबा रोड शो किया. जिसे पार्टी ने अब तक का सबसे बड़ा रोड शो होने का दावा किया और बताया कि इस रोड शो से साफ हुआ कि लोगों के मन में मोदी को लेकर कितना प्यार है. उनकी एक झलक पाने के लिए 10 लाख लोग इस रैली में जुटे. जिसके बाद यह साफ हो गया था कि भाजपा इस बार रिकॉर्ड जीत हासिल करेगी.

राज्य में लगाए गए भाजपा के सभी पोस्टरों में पीएम मोदी का फोटो दूसरे नेताओं की तुलना में ज्यादा बड़ा लगाया गया. उन्होंने रैली में सुरक्षा, शांति और विकास का वादा किया. यही नहीं पीएम मोदी ने बहुत ही सतर्कता के साथ गुजराती अस्मिता और 2002 के बाद के भाजपा शासन में स्थापित शांति जैसे मुद्दों को उठाया. साथ में कांग्रेस के अपशब्दों को अपने पक्ष में हथियार बनाया और राष्ट्रवाद के मुद्दे को भी हवा दी. मोदी और शाह ने बहुत ही जमीनी स्तर पर काम करते हुए माइक्रो मैनेजमेंट किया.

भाजपा को मिला पाटीदारों का साथ –
गुजरात में पाटीदार समुदाय के 13 फीसद मतदाता हैं, लेकिन वे गुजरात में इससे कई गुना ज्यादा असर रखते हैं. इनके कांग्रेस की तरफ झुकाव की वजह से ही 2017 में कांग्रेस को 77 सीट हासिल हुई और भाजपा को 99 सीट पर ही संतोष करना पड़ा था. पाटीदार दशकों से कांग्रेस का ही साथ देते आए हैं, लेकिन 1995 में उन्होंनें भाजपा का दामन थाम लिया था. लेकिन 2015 के आरक्षण आंदोलन ने माहौल को बदल दिया. जब एक विरोध प्रदर्शन के दौरान 14 पाटीदार मारे गए थे. इससे समुदाय में खासा रोष फैला था और हार्दिक पटेल पाटीदार आंदोलन का चेहरा बने और यह आंदोलन 2019 तक चला.

लेकिन 2022 के आते-आते चीजों ने यू- टर्न लिया और ऐसा लगने लगा जैसे पाटीदार वापस भाजपा खेमें में शामिल हो गए हैं, खासकर तब जब हार्दिक पटेल भाजपा में चले गए. वे 2020 में भाजपा के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को 10 फीसद आरक्षण दिए जाने से संतुष्ट दिखे. इससे पाटीदारों को लाभ हुआ और वे वापस भाजपा में अपने समर्थन के साथ लौट गए.

कांग्रेस का मौन अभियान –
2017 में गुजरात में कांग्रेस का उत्साह से भरा चुनाव अभियान चला था. जिसमें राहुल गांधी खुद एक महीने से अधिक वक्त तक गुजरात में रहे और जोश के साथ अभियान में जुटे. उसके उटल इस बार पार्टी का अभियान ठंडा और मौन रहा. जिसने मतदाताओं को हैरान किया. जब चुनाव अपने चरम पर था, तब राहुल गांधी भी महज एक दिन के लिए गुजरात आए और दो रैली करके वापस अपनी भारत जोड़ो यात्रा को जारी रखने के लिए पडोसी राज्य मध्यप्रदेश रवाना हो गए. ऐसा लगा जैसे 2017 में मिले लाभ को भुनाने के बजाए कांग्रेस ने अपने अभियान को रिवर्स गियर में डाल दिया है.

इसके साथ ही कांग्रेस का मोदी के खिलाफ नकारात्मक अभियान कोढ़ में खाज साबित हुआ. मधुसूदन मिस्त्री के प्रधानमंत्री के लिए औकात जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने से लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का उनके लिए रावण शब्द का इस्तेमान करना, मतदाताओं को बिल्कुल नहीं भाया.

चुनाव से पहले नुकसान की भरपाई –
2021 तक भाजपा के लिए माहौल इतना खुशगवार नहीं था. भाजपा के दिमाग में विरोधी लहर का बोझ था और जनता भाजपा के राज्य में मौजूदा चेहरों से थक चुकी थी. 11 सितंबर को मोदी ने मुख्यमंत्री विजय रूपानी और उनके पूरे मंत्रिमंडल को बदल कर नए मंत्रिमंडल के साथ नया मुख्यमंत्री लाकर सभी को चौंका दिया. यह वह कदम था जिसने एक झटके से भाजपा के खिलाफ जनता के उभर रहे गुस्से को गायब कर दिया. गुजरात में भी नेतृत्व को पूरे तौर पर बदलकर एक नई शुरुआत की गई और भूपेन्द्र पटेल को मुख्यमंत्री बनाया गया. इस कदम से गुजरात के पटेल भी उनके साथ हो गए.

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