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‘पाताललोक’ की पुलिस

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‘पाताललोक’ की पुलिस

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हमारे यहां पुलिस की लाठी

गरीबों पर बरसती है

दलितों पर बरसती है

आदिवासियों पर बरसती है

महिलाओं पर बरसती है

माइनोरिटी पर बरसती है

जिन पर कानून का राज बनाने की जिम्मेदारी है, वही जब कानून तोड़ें तब क्या हो?

ये खबर उनके लिए हैं, जिन्होंने लॉकडाउन में पुलिस के हाथों आम लोगों की पिटाई के वीडियो बहुत सहज भाव से सोशल साइट्स पर शेयर किए थे।

तमिलनाडु के तूतीकोरिन से पुलिस के जुल्म की खौफनाक कहानी सामने आई है। 19 जून की रात … 58 साल के जयराज ने कोरोना कर्फ्यू में रात 9 बजे के थोड़ी देर बाद तक अपनी लकड़ी की दुकान खोल रखी थी। पुलिस उसे उठा कर थाने ले आई। मोबाइल दुकान चलाने वाले 31 साल के बेटे फिनिक्स को खबर हुई तो वो भागा-भागा थाने पहुंचा। इल्जाम है कि, बेटे ने पिता की पिटाई का विरोध किया तो पुलिस ने पिता के साथ-साथ बेटे को भी पीट-पीट कर मार डाला।

पुलिस ने इनके साथ क्या किया ?

इल्जाम है कि

  1. पुलिस ने इन्हें नंगा कर लॉक अप में दो दिन रखा
  2. तीन बार इनके परिवार वाले साफ कपड़े ले कर थाने आए, और इनके खून से सने कपड़े लेकर घर लौटे
  3. उन्हें जिस तरह से टार्चर किया गया उसके बारे में लिखना या बताना मुमकिन नहीं है
  4. दो दिन के बाद इन्हें मृत घोषित कर दिया गया। मौत की वजह हार्ट फेल होना

तमिलनाडु सरकार ने क्या किया ?

जांच पूरी होने तक दो पुलिसवालों का तबादला…..।

என் அம்மாவையே திட்டுவீங்களா?  ஆவேசமாக தட்டிக்கேட்ட சிறுவன் | Kovai Police Fight Viral Video

समूचे तमिलनाडु में इस घटना को लेकर लोगों में बहुत आक्रोश है। राज्य के खुदरा व्यापारी से लेकर तमिल सिनेमा के कई स्टार्स भी इस घटना पर अपनी नाराजगी का इजहार कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर #JusticeforJayarajAndFenix ट्रेंड कर रहा है।  दबाव में आई राज्य सरकार अब सीबीआई जांच की बात कह रही है।

अगर इंसानियत और खाकी को शर्मसार करने वाली इस घटना के बाद लोग पुलिस के रवैये में बदलाव की उम्मीद कर रहे थे, तो चंद रोज बाद तेनकासी में लॉक अप में एक ऑटो ड्राइवर की मौत से ये भ्रम भी दूर हो गया।

इस मामले में गलत क्या है ?

DK Basu vs West Bengal 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने कस्टोडियल एब्यूज के खिलाफ गाइडलाइन दी थी, जिन्हें अब Cr PC में शामिल कर लिया गया है। तूतीकोरिन पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के गाइड लाइन्स के 4 अहम प्रावधानों का उल्लंघन किया।

1.केस डायरी

जब किसी शख्स को गिरफ्तार किया जाता है तब उसे गिरफ्तार करने वाले पुलिस अफसर का नाम डायरी में दर्ज किया जाना अनिवार्य है –ये नहीं किया गया  

2.मेडिकल जांच

गिरफ्तार शख्स को 48 घंटे के अंदर मेडिकल जांच किया जाना जरूरी है -–ये नहीं किया गया  

3.वकील रखने का हक

गिरफ्तार व्यक्ति को पूछताछ के दौरान वकील से मिलने और मशविरा करने का हक है-–ये नहीं किया गया  

4.पुलिस कंट्रोल रूम

अरेस्ट करने के 12 घंटे के अंदर पुलिस कंट्रोल रूम को सूचित करना अनिवार्य है। इस सूचना में गिरफ्तारी के बाद रखे जाने की जगह और गिरफ्तारी की वजह बताना जरूरी है।-–ये नहीं किया गया  

लॉकअप में मौतों का हिसाब

1993 से 2017 तक भारत में कस्टोडियल डेथ के 31,845 मामले सामने आए हैं –स्रोत:- NHRC

2001 से 2010 के दस सालों में कुल 14,231, यानी हर दिन चार लोगों की हिरासत में मौत हो रही थी। आगे के 9 सालों में इस आंकड़े में 25% का  इजाफा हुआ है। अब हर दिन पांच लोग हिरासत में मर रहे हैं- स्रोत: National Campaign Against Torture NCAT

हिरासत में मौत

साल हिरासत में मौत
20111332
20121471
20131597
20171671
20181966
20191731

स्रोत: National Crime Records Bureau

लोकतंत्र में ‘लाठी’ को देशभक्ति से जोड़ कर देखने वाले ये नहीं जानते कि 2017 में सरकार का रिकार्ड बताता है कि देश में किसी पुलिसवाले को हिरासत में हुई मौत मामले में सजा नहीं हुई। रिकार्ड ये भी कहता है कि हिरासत में हुई मौतों के कुल मामले अगर 100 मान लिये जाएं तो सिर्फ 50 मामलों में चार्जशीट दायर होती है। इन 50 में से सिर्फ 25 में ही जांच पूरी होती है और इन 25 में से सिर्फ 5 मामलों में ही सजा होती है। यानी हमारे यहां हिरासत में मौत के 18 मामलों में से सिर्फ 1 में किसी पुलिस वाले को सजा मिलने की संभावना है।

 NCRB के आंकड़े बताते हैं कि हमारे यहां लॉकअप में जो मौतें दर्ज होती हैं, उनमें सबसे ज्यादा तादाद सुसाइड (71%) और अस्पताल में इलाज के दौरान मौत से होती है। जयराज और फिनिक्स का मामला भी अस्पताल में इलाज के दौरान हुई मौत के मामले के तौर पर दर्ज किया गया है।  

हिरासत में मौत के मामले में अव्वल राज्य

  1. यूपी
  2. तमिलनाडु
  3. पंजाब

ये आंकड़े 2019 के हैं। 2018 में पहले तीन राज्य हैं गुजरात, तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश। यानी पुलिस बेरहमी के मामले में तमिलनाडु ने अपनी साख कायम रखी है।

हिरासत में मौत क्यों होती है?

मणिपुर में नागरिक हितों के लिए काम कर रहे एक एनजीओ के मुताबिक इसकी सबसे अहम वजह है रिश्वत

 “The fact remains many were tortured to death for the failure to pay bribe including in front of the relatives. Victims were also tortured to extract confessions”.

Suhas Chakma, Coordinator of the  “United NGO Campaign Against Torture”

 .

सरकार की गलती क्या है?

हमरी सरकार दुनिया की बहुत कम लोकतांत्रिक सरकारों में शामिल है जिन्होंने अब तक UN Convention Against Torture को अपने यहां कानून बनाकर लागू नहीं किया है..जबकि 3 मई 2000 को भारत सरकार ने ऐसा करने का वचन लोक सभा को दिया था। आठ साल बाद जब UN Human Rights Council ने लगातार इस मांग को सामने रखा तब सरकार ने तीन बार उनसे इस बाबत कानून बनाने का वायदा किया लेकिन ऐसा किया नहीं। 2010 में संसद की सेलेक्ट कमेटी और 2017 में लॉ कमीशन  ने Prevention of Torture Bill राज्य सभा में पेश करने के लिए ड्राफ्ट किया, लेकिन ये बिल पेश नहीं हुआ। इतना ही नहीं जब 27 नवंबर 2017 को सुप्रीम कोर्ट में रिट पेटिशन 738/2016 की सुनवाई हुई तब भी सरकार ने कानून बनाने का एक बार फिर से वायदा कर लिया, और फिर भूल गई।

.दुनिया भर में पहले जांच होती है,सबूत इकट्ठा किया जाता है,तब गिरफ्तारी होती है, हमारे यहां पुलिस पहले गिरफ्तार करती है, फिर आरोपी को ही पीट-पीटकर उसका बयान लिया जाता है और उसके कथित गुनाह के सबूत इक्ट्ठा करती है।

अमेरिका,ब्रिटेन और कई यूरोपीय देशों में पुलिस वाले के बॉडी सूट में इन बिल्ट कैमरा होता है जिसे ड्यूटी के वक्त ऑन रखना जरूरी होता है, ये ड्यूटी सड़क पर हो, थाने में या फिर कोई पूछताछ हो। इस तरह लिखित बयान के साथ-साथ वीडियो बयान ऑटोमैटिक तरीके से सर्वर पर अपलोड हो जाता है।

पुलिस सुधार को लेकर चंद सुझाव

1

परेशानी – पुलिस गरीब जनता की शिकायत नहीं सुनती, FIR नहीं दर्ज करती, ताकि उसके थाने के नाम पर कम केस राज्य सरकार के रिकार्ड में दर्ज हों

समाधान – जनता को थाना नहीं जाना हो। एक नंबर जैसे 911 पर शिकायत दर्ज हो। निजी एजेंसी आपके पास आ कर आपकी शिकायत दर्ज करे। आपको कभी थाना नहीं जाना हो। पुलिस को कोई और जानकारी चाहिए तो वो भी वो निजी एजेंसी फोन से या आपके पास आ कर ले। यानी पुलिस और जनता के बीच सीधा संपर्क नहीं हो, बीच में एक एजेंसी हो। सारा रिकार्ड कंप्यूटराइज्ड हो..ऑनलाइन हो।

2

परेशानी – शिकायत दर्ज हो भी गई तो उसमें कोई प्रगति नहीं होती, जब तक कि बड़ा बाबू को रिश्वत न दी जाए ?

समाधान – हर तरह की शिकायत के लिए एक निश्चित समय सीमा तय की जाए, उस सीमा के खत्म होने पर दंडात्मक कार्रवाई हो।

3

परेशानी – पुलिस किसी को कभी भी पूछताछ के नाम पर हिरासत में लेकर परेशान करती है, मारती-पीटती है, वसूली करती है।

समाधान – पुलिस को अरेस्ट करने का कोई अधिकार नहीं। कोर्ट के आदेश के बाद ही किसी की गिरफ्तारी या पूछताछ होगी। एक नया कानून बनाया जाए कि सिवाय आतंकवाद, दंगा, सरकारी धन के गबन जैसे विशेष मामलों को छोड़कर अन्य सभी मामलों में कोर्ट में पहली पेशी के वक्त ही बेल देने का प्रावधान हो। इससे अदालत में बेल के केसेज कम हो जाएंगे।

4

परेशानी – पूछताछ के नाम पर पुलिस गरीबों पर, दलित, आदिवासी, महिलाओं और माइनोरिटी पर थर्ड डिग्री का इस्तेमाल करती है। नेता, अफसर, अमीर के कहने पर गरीबों को सताती है पुलिस।

समाधान – पुलिस से थाने में पूछताछ का अधिकार छीन लिया जाए। कोर्ट में जज के आदेश के बाद सरकारी और निजी वकील के सामने कोर्ट परिसर में हो पुलिस की पूछताछ

5

परेशानी – किसी जाति, समुदाय या विरोधी पार्टी के लोगों के खिलाफ पूर्वाग्रह से प्रेरित होकर पुलिस एक्सेसिव फोर्स का इस्तेमाल करती है। जैसे – जामिया और जेएनयू में हुआ।

समाधान -.   कॉलेज छात्रों पर लाठी चार्ज करने का पुलिस को हक न हो।  प्रिंसिपल और वीसी की लिखित इजाजत के बगैर कालेज या होस्टल में पुलिस के दाखिल होने पर रोक ।

सांप्रदायिक दंगों की स्थिति में कर्तव्य में चूक करने वालों को एक्टिव पुलिस ड्यूटी से हमेशा के लिए हटा दिया जाए और उन्हें पुलिस केस रिसर्च जैसे टेबल वर्क पर परमानेंट एसाइनमेंट दिया जाए।  लॉ कमीशन के निर्देशों के मद्देनजर राज्य में पुलिस फोर्स को दो टीम में बांट दिया जाए 

1.    लॉ एंड आर्डर पुलिस- 

2.    इन्वेस्टिगेशन पुलिस – 

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