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पढ़ेंगे आयुर्वेद, बनेंगे सर्जन!

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पढ़ेंगे आयुर्वेद, बनेंगे सर्जन!

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भारतीय चिकित्सा केन्द्रीय परिषद (CCIM) ने 19 नवंबर को एक नोटिफिकेशन जारी किया है, जिसके मुताबिक आयुर्वेद के डॉक्टर भी अब सर्जरी कर सकेंगे। इस फैसले को लेकर चौतरफा विरोध शुरु हो गया है। इंडियन मेडिकल असोसिएशन (IMA) ने इस नोटिफिकेशन को वापस लेने की मांग करते हुए इसे चोर दरवाजे से मेडिकल संस्थानों में एंट्री का प्रयास बताया है। ज्यादातर डॉक्टर भी इस फैसले से हैरान और परेशान हैं। सवाल ये है कि क्या ये देश के मरीजों के लिए सही फैसला है?

क्या कहता है CCIM नोटिफिकेशन?

 CCIM यानी Central Council of Indian Medicine ने सरकार से मंजूरी के बाद एक नोटिफिकेशन जारी कर कहा है कि आयुर्वेद के डॉक्टर भी कुल 58 तरह की सर्जरी करेंगे। नोटिफिकेशन के मुताबिक :-

  • आयुर्वेद के पीजी कोर्स में अब सर्जरी को भी जोड़ा जाएगा। साथ ही अधिनियम का नाम बदलकर भारतीय चिकित्सा केंद्रीय परिषद (स्नातकोत्तर आयुर्वेद शिक्षा) संशोधन विनियम, 2020 कर दिया गया है।
  • स्नातकोत्तर (पीजी) के विद्यार्थियों को विभिन्न सर्जरी के बारे में गहन जानकारी दी जाएगी।
  • आयुर्वेद के सर्जरी में पीजी करने वाले छात्रों को आंख, नाक, कान, गले के साथ ही जनरल सर्जरी के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित किया जाएगा।
  • शल्य तंत्र (जनरल सर्जरी) और शालक्य तंत्र (नाक, गाल, गला, सिर और आंख की सर्जरी) के पीजी स्कॉलरों को पढ़ाई के दौरान स्वतंत्र रूप से विभिन्न तरह की चीर-फाड़ की प्रक्रिया का व्यावहारिक ज्ञान दिया जाएगा।
  • इन छात्रों को स्तन की गांठों, अल्सर, मूत्रमार्ग के रोगों, पेट से बाहरी तत्वों की निकासी, ग्लुकोमा, मोतियाबिंद हटाने और कई सर्जरी करने का अधिकार होगा।
  • उन्हें ऑप्थेलमोलॉजी (आंख), ऑर्थो (हड्डी) और डेंटल (दांत) से संबंधी बीमारियों के इलाज के लिए जरूरी सर्जरी का भी अधिकार होगा।
  • छात्रों को नेत्र, कान, नाक, गला, सिर और सिर-दंत चिकित्सा के विशेषज्ञ जैसी डिग्री भी दी जाएंगी।

समर्थन में क्या हैं तर्क?

भारतीय चिकित्सा केंद्रीय परिषद (CCIM) का कहना है कि उसके डॉक्टर पिछले 25 सालों से आयुर्वेद संस्थानों और अस्पतालों में सर्जरी कर रहे हैं। इसलिए इस नोटिफिकेशन का मकसद सिर्फ इस तरह की सर्जरी को वैधता प्रदान करना है। आयुर्वेद की प्रैक्टिस कर रहे डॉक्टरों की ओर से लंबे समय से एलोपैथी की तरह अधिकार देने की मांग की जा रही थी। इस नए नोटिफिकेशन के बाद उन्हें पढ़ाई के दौरान ही सर्जरी की ट्रेनिंग दी जाएगी और इससे संबंधित डिग्री भी मिलेगी।

क्या कहता है IMA?

भारतीय चिकित्सा संघ (IMA) ने इस फैसले को पूरी तरह एकतरफा बताते हुए इसे फौरन वापस लेने की मांग की है। उसने आयुर्वेदिक डॉक्टरों को सर्जरी के लिए अयोग्य बताते हुए सीसीआईएम की कड़ी आलोचना की है। इनकी ओर से जारी बयान में कहा गया है कि अगर सीसीआईएम (CCIM) ने आईएमए की खींची हुई लक्ष्मण रेखा को लांघने की कोशिश की तो इसके घातक परिणाम सामने आएंगे। आईएमए ने सरकार से मांग की कि वो ऐसे डॉक्टरों की पोस्टिंग भारतीय मेडिकल कॉलेजों में नहीं करे।

फैसले के खिलाफ क्या हैं तर्क?

  • किसी दूसरी चिकित्सा पद्धति के विद्यार्थियों को आधुनिक चिकित्सा पद्धति की शिक्षा नहीं दी जानी चाहिए। क्योंकि विभिन्न पद्धतियों का घालमेल खतरनाक साबित हो सकता है।
  • इस फैसले से चोर दरवाजे से मेडिकल संस्थानों इंट्री का मौका मिल जाएगा और NEET जैसी परीक्षाओं को महत्व पूरी तरह से खत्म हो जाएगा।
  • आईएमए के अध्यक्ष के मुताबिक इससे चिकित्सा वर्ग में खिचड़ी जैसी स्थिति हो जाएगी और देश में हाइब्रिड डॉक्टरों को बढ़ावा मिलेगा।
  • IMA के मुताबिक, CCIM को चाहिए कि वो अपने प्राचीन ज्ञान के आधार पर सर्जरी का अपना तरीका ईजाद करें और आधुनिक मेडिकल साइंस की प्रक्रिया से पूरी तरह दूर रहें।
  • आईएमए ने सरकार से अपील की है कि हरेक सिस्टम को अपने दम पर बढ़ने दिया जाए।

होना क्या चाहिए?

सवाल ये है कि आखिर इसकी जरुरत क्या है? अगर होम्योपैथी वाले अपने तरीके से इलाज करें, आयुर्वेद वाले आयुर्वेदिक तरीके से और यूनानी वाले अपने तरीके से …तो इसमें हर्ज क्या है? और जनता के सामने ऐसे विकल्प होने चाहिए कि वो जिस पद्धति पर भरोसा करे, उसके मुताबिक अपना इलाज कर सके। कोई एक डॉक्टर सभी पद्धतियों का ज्ञाता हो, ऐसा क्यों जरुरी बनाया जा रहा है? दवाओं और पद्धतियों के घालमेल से बचने के लिए एलोपैथी वाले डॉक्टर भी दूसरे डॉक्टरों के पर्चे को खारिज कर अपने तरीके से इलाज शुरु करते हैं। फिर पद्धतियों का घालमेल मरीजों के लिए कैसे बेहतर हो सकता है?

दूसरी ओर आधुनिक मेडिकल साइंस लगातार डेवलप हो रहा है…. नई तकनीक, नई खोज, नई बीमारियां सामने आ रही हैं। ये क्षेत्र विशेषज्ञता है, इसे साल भर की ट्रेनिंग से सीखा नहीं जा सकता। वैसे भी सर्जरी के मामले में जरा सी चूक मरीज के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। इसलिए आधे-अधूरे ज्ञान के साथ किसी को इस तरह के प्रयोग की छूट नहीं मिलनी चाहिए। जो फील्ड विशेषज्ञों का है, उसमें योग्यता और ज्ञान का स्तर पर किसी भी तरह का समझौता पूरे हेल्थ सिस्टम को सालों पीछे कर सकता है।

बेहतर ये होता कि आधुनिक मेडिकल कॉलेजों में ही आयुर्वेदिक चिकित्सा का साल भर का कोर्स होता, ताकि डॉक्टर्स जरुरत के मुताबिक, प्राकृतिक चिकित्सा की मदद से मरीजों को जल्द ठीक होने में मदद कर पाते।

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