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बिजनेसमैन नंबर वन!

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बिजनेसमैन नंबर वन!

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farmer booked flight tickets for migrant workers

लॉकडाउन में जहां दिल्ली-एनसीआर के हजारों मजदूर पैदल ही अपने गांव जाने को मजबूर हैं, वहीं आउटर दिल्ली के 10 मजदूर गुरुवार की सुबह फ्लाइट से पटना के लिए रवाना हुए। यही नहीं, पटना एयरपोर्ट से उनके घर जाने का इंतजाम भी पहले से ही किया जा चुका था। इसका मतलब ये नहीं कि इन मजदूरों के पास इतना पैसा था, बल्कि ये सारा इंतजाम उस किसान ने किया था, जिनके खेतों में ये लोग काम करते थे। है ना कमाल की बात!

बाहरी दिल्ली  के बख्तावरपुर के पास, तिगीपुर गांव के किसान पप्पन सिंह गहलोत मशरूम की खेती करते हैं। इनके यहां काम करने के लिए हर साल बिहार के कुछ मजदूर आते हैं, और सीजन के बाद वापस चले जाते हैं। ये सभी 10 मजदूर एक ही परिवार से हैं और पिछले 27 सालों से यहां मजदूरी करने के लिए आते रहे हैं। इस बार मशरुम का सीजन खत्म हो गया, फिर भी ये जा नहीं पाए क्योंकि लॉकडाउन ने मुश्किलें बढ़ा दी थीं। ऐसे में पप्पन सिंह गहलोत ने अपने खर्च पर उन सभी के लिए हवाई जहाज के टिकट की व्यवस्था की। यहां तक कि इन लोगों को घर से एयरपोर्ट तक खुद अपनी कार से छोड़ने गये।

अपने मजदूरों के साथ पप्पन सिंह गहलोत

बेकार का खर्च या समझदारी भरा निवेश?

आज के माहौल में कारोबारी अपनी जेब से इनका वेतन भी नहीं दे रहे, घरों में कामवाली बाईयों तक के पैसे नहीं दे रहे, और एक किसान अपने खेत में काम करनेवाले मजदूरों को घर भेजने के लिए लाख-दो लाख रुपये खर्च करे, तो इसे आम लोग बेवकूफी ही समझेंगे। ज्यादातर लोगों को यही लगेगा कि ये भावनात्मक फैसला है, और एक बिजनेसमैन तो ऐसा कभी नहीं कर सकता। लेकिन मेरी राय में ये बहुत ही समझदारी भरा और अच्छी तरह सोच-समझकर लिया गया फैसला है। इसमें भावना भी शामिल हो सकती है, लेकिन कारोबार की दृष्टि से ये खर्च नहीं, निवेश है।

पलायन से क्या होगी परेशानी?

  • देश भर में करीब 12.5 करोड़ प्रवासी कामगार दिन-रात नए भारत के निर्माण में अपना योगदान दे रहे हैं। ऐसे में इन कामगारों की वापसी से विनिर्माण, खनन, परिवहन, व्यापार जैसी गतिविधियों का प्रभावित होना तय है।
  • कोरोना महामारी और लंबे देशव्यापी लॉकडाउन की वजह से कई राज्यों की औद्योगिक इकाइयों और कृषि क्षेत्र में मुश्किलें बढ़ गई हैं। इनमें विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत करीब 70 फीसदी मजदूर अपने गांव वापस जा चुके हैं।
  • लॉकडाउन में ढील के बाद भी मजदूरों का पलायन रुक नहीं रहा है। और मजदूरों के घर चले जाने से आर्थिक कामकाज दोबारा शुरू करना बड़ी चुनौती साबित हो रही है।
  • देश के विकसित राज्यों को श्रम की कमी के खतरे का आभास है। तभी तो कर्नाटक ने बेंगलुरु से पटना आने वाली तीन ट्रेनों का आरक्षण तक रद्द करवा दिया था। दरअसल बिल्डर लॉबी को डर था कि मजदूर अगर चले गए तो सारे प्रोजेक्ट्स धरे रह जाएंगे।
  • पंजाब में अकेले लुधियाना में सात लाख से ज्यादा प्रवासी मजदूर हैं। वहीं, पूरे पंजाब में इनकी संख्या 10 लाख से भी ज्यादा है।  वहीं, तेलंगाना में करीब 15 लाख प्रवासी मजदूर हैं, जो बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों से हैं। 
  • हरियाणा में भी लगभग दो लाख प्रवासियों ने खट्टर सरकार से अपने राज्य वापस भेजे जाने की अनुमति मांगी है। इनमें ज्यादातर मजदूर हैं, जो काम नहीं मिलने को पलायन की वजह बता रहे हैं।
  • पंजाब के चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के प्रमुख आरएस सचदेवा के मुताबिक लॉकडाउन में ढील के बाद राज्य में इंडस्ट्री, प्रोडक्शन यूनिट्स और कृषि क्षेत्र के काम शुरू हो रहे हैं, लेकिन श्रमिकों के पलायन से ये गंभीर रूप से प्रभावित होंगे।
  • एक तरफ राज्य सरकार प्रतिबंधों में ढील देकर इंडस्ट्रीज और कृषि क्षेत्र में काम शुरू करने को कह रही है। दूसरी ओर मजदूरों और श्रमिकों को घर भेज रही है। अब अगर श्रमिक ही नहीं रहेंगे, तो कारखानों में काम कौन करेगा? उत्पादन कैसे होगा?’
  • अखबारों में छपी एक खबर के मुताबिक, पंजाब में 2.52 लाख रजिस्टर्ड औद्योगिक इकाइयों में अभी तक सिर्फ 4,188 (1.65%) ने सीमित क्षमता के साथ उत्पादन फिर से शुरू किया है। लेकिन श्रमिकों की कमी से उत्पादन पर असर पड़ रहा है।
  • 20 जून के आसपास धान की बुवाई होनी है, जो मजदूरों की कमी के कारण संकट में पड़ सकता है। किसानों को 75 लाख एकड़ से अधिक इलाके में धान बोने के लिए कम से कम 12.5 लाख श्रमिकों की जरूरत पड़ सकती है।
  • कई इलाकों में गेहूं की फसलें तैयार खड़ी हैं, लेकिन उन्हें काटने के लिए श्रमिक नहीं मिल रहे है।
तस्वीरें एएनआई से साभार

आज हालात ये हैं कि देश की बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों में और बड़े-बड़े धनाढ्य लोगों के पास काम करने वाले मजदूर भी दर-दर की ठोकरें खाते हुए अपने घर वापस लौट रहे हैं। इनमें अगर आधे ने भी इस परेशानियों से सबक लेते हुए वापस नहीं लौटने का फैसला किया, तो उन बिल्डरों, किसानों, फैक्ट्री मालिकों और कंपनियों को कितना नुकसान होगा, जो इन्हीं की बदौलत सस्ती मजदूरी का फायदा उठाते हैं और मुनाफा कमाते हैं? ऐसे में मजदूरों को कुछ महीनों का वेतन नहीं देकर अपनी बचत करना फायदेमंद है या उन्हें वेतन और सुविधाएं देकर उनका वापस लौटना सुनिश्चित करना? अब आप ही बताइये किसान ने लाख रुपये पानी में बहाये या अपनी भविष्य की फसलों का सुरक्षित उत्पादन सुनिश्चित किया ? ये बेकार का खर्च था या सोचा-समझा निवेश? अगले दो-तीन सालों के उत्पादन की सोचें तो कौन फायदे में रहेगा, ये किसान या मजदूरों को पलायन पर मजबूर करनेवाले मालिक? क्या इस किसान को (जो एक बेहतरीन इंसान भी है) बिजनेसमैन नंबर वन कहना गलत है ?

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