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रजनीगंधा सा प्यार जिसने दिखाया, उस बासु चटर्जी को सलाम !

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रजनीगंधा सा प्यार जिसने दिखाया, उस बासु चटर्जी को सलाम !

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लड़की विद्या सिन्हा सी… लड़का अमोल पालेकर सा …प्रेम रजनीगंधा सा…..खुशबू वाला प्रेम….जब मन अनुरागी होता था और पिया की प्रीत महकती थी..

बासु चटर्जी ने मध्य वर्ग की मोहब्बत को बहुत सादगी के साथ पर्दे पर पेश किया। जिसके दोस्त शैलेंद्र हों, राजेंद्र यादव हों, वो मथुरा आगरा का  बासु चटर्जी …फिल्म बनाएगा तो कहानी  राजेंद्र यादव की होगी, मन्नू भंडारी की होगी…कहानी जिंदगी की…योगेश के शब्दों की तरह सरल, सलिल के संगीत सा निर्मल …लता के सुर सा कोमल  

महानगर के जिस मध्यवर्ग को राजेंद्र यादव और मन्नू भंडारी अपने साहित्य में जगह दे रहे थे, वही मध्यवर्ग अपने हर धूप –छांव के साथ बासु चटर्जी के सिनेमा में नजर आता है। स्त्री के नजरिए से प्रेम को समझने की, समर्पण में उसकी सीमाओं के पार जाने की उत्कंठा की, रिश्ते को राग से आग तक संपूर्णता में समझने की हिन्दी सिनेमा की ये पहली कोशिश है।

कई बार यूं ही देखा है

ये जो मन की सीमा रेखा है

मन तोड़ने लगता है

अनजानी प्यास के पीछे, अनजानी आस के पीछे

 मन दौड़ने लगता है

ये है हमारी हिन्दुस्तानी सिनेमा की ताकत….जिस साल मनोज कुमार रोटी कपड़ा और मकान बनाते हैं, उसी साल राजेश खन्ना आविष्कार सी एक्सपेरिमेंटल फिल्म के लिए और जया भादुड़ी कोरा कागज के लिए बेस्ट एक्टर का अवार्ड जीतते हैं। इस्मत चुगतई और कैफी आजमी गरम हवा की कहानी लिखते हैं..मणि कौल THE NOMAD PUPPETEER के लिए बेस्ट डाक्यूमेंटरी का फिल्म फेयर जीतते हैं …और बेस्ट फिल्म का अवार्ड जीतती है रजनीगंधा

मध्यवर्ग की जिन्दगी ऋषिकेश मुखर्जी और बासु भट्टाचार्या की फिल्मों में भी दर्ज होती है, लेकिन बासु चटर्जी का  सिनेमा संवेदना के स्तर पर इनसे अलग है। लड़की जरीना वहाब ..सी…सादी….  लड़का अमोल पालेकर सा …सीधा और प्रेम जैसे आधी रात में आधा चांद ….अपूर्ण जीवन का संपूर्ण प्रेम…चितचोर

  गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा

मैं तो गया मारा

आ के यहां रे

 उस पर रुप तेरा सादा

चंद्रमा ज्यूं आधा

आधा जवां रे

आप एक बार चितचोर देखिए और फिर रितिक की.. मैं प्रेम की दीवानी हूं.. देखिए….बासु चटर्जी और सूरज बड़जात्या का फर्क समझ आ जाएगा।

जहां पहली बार मिले थे हम

जिस जगह से संग चले थे हम

नदिया के किनारे आज उसी

अमवा के तले आना

जब दीप जले आना …  

मुंबई के मानसून में लड़की मासूम मौसमी सी, लड़का शर्मीला सजीला अमिताभ सा….नीली साड़ी में मौसमी, थ्री पीस सूट में अमिताभ…बोरीवली से चर्च गेट तक …जाने कैसी चली क्या पवन,सुलग सुलग जाए मन

 लड़की सोचती है

पहले भी यूं तो भीगा था आंचल

अब के बरस क्यों सजन

सुलग सुलग जाए मन

लड़का कहता है

जब घुंघरूओं सी बजती हैं बूंदे

अरमां हमारे पलकें न मूंदें

कैसे देखें सपने नयन

सुलग सुलग जाए मन

बासु चटर्जी कहते थे … मैंने जो जीवन देखा है, उसको वैसा ही अपनी फिल्मों में दिखाता हूं …आज भी किसी डायरेक्टर के लिए ये ‘छोटी सी बात’ नहीं है।

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