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कौन हैं वो लोग, जिन्हें बाढ़ से मोहब्बत है?

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कौन हैं वो लोग, जिन्हें बाढ़ से मोहब्बत है?

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दुनिया के सबसे बेहतरीन इंजीनियर और साइंटिस्ट वाले देश के लिए बाढ़ क्या हर साल आने वाली आपदा होनी चाहिए?  

अकेले बिहार में हर साल 94 हजार वर्गकिमी इलाके में से 69 हजार वर्ग किमी यानी करीब 73.06% हिस्सा और 76% आबादी बाढ़ से प्रभावित होती है। स्रोत:-http://fmis.bih.nic.in/history.html

अभी बिहार में क्या हो रहा है? इसे जलसंसाधन मंत्री के ट्वीट से समझिए।

बाढ़ यहां हर साल आती है, लेकिन चुनाव पांच साल पर आता है

 जलसंसाधन मंत्री की चिंता में बाढ़ है, लेकिन जरा आराम के साथ

अभी ज्यादा जरूरी चीज चुनाव है

समाधान क्या है?

1 हाईवे की तर्ज पर वाटरवे का विकास – हमारे यहां कार्गो का 0.1% नदियों के रास्ते होता है, अमेरिका में ये औसत है 21%.IWAI यानी Inland Waterway Authority of India IWAI  की योजना है 14,500km का वाटरवे तैयार करना।  

  1. नदियों के पानी के नए storage और diversion structures- समंदर की सतह से नीचे बसा नीदरलैंड बाढ़ से बचाव के उपाय करने वालों में सबसे अव्वल है। यहां स्टोरेज और डायवर्सन के इंजीनियरिंग सोल्यूशन में Zuiderzee works और the Delta works है। डच लोगों ने बाढ़ से बचाव के लिए जहां दुनिया के सबसे बड़े बांध जैसे  Afsluitdijk बनाए  तो इसके अलावा यहां कई ऑउट ऑफ बॉक्स सोल्यूशन जैसे भारी बारिश के दौरान पार्किंग गराज को रिजर्वायर और खेल के मैदान को अस्थायी झील बनाना, अंडरग्राउंड स्टोरेज की चेन बनाना। साल दर साल समंदर से आने वाली बाढ़ से निबटने के लिए रोटरडैम में 120 एकड़ में तैरने वाले शहर का निर्माण किया गया है।
  2. पेड़ बचाए मेड़ – 1980 में राष्ट्रीय बाढ़ आयोग ने अनुमान लगाया था कि देश में 4करोड़ हेक्टेयर जमीन हर साल बाढ़ से प्रभावित होती है। दसवीं पंचवर्षीय योजना के लिए प्लानिंग कमीशन के वर्किंग ग्रुप ने बाढ़ प्रभावित इलाके को 4.5 करोड़ एकड़ मानते हुए कहा था कि पेड़ लगाने, नदियों से गाद निकालने जैसे उपाय अगर वक्त रहते किए जाएं तो इसमें से 80% इलाके बाढ़ से बचाए जा सकते हैं।
  3.  बेसिन प्लान – National Water Policy 2002 में कहा गया है कि बाढ़ रोकने के लिए एक मास्टर प्लान बनाया जाए जिसमें बाढ़ वाली नदियों के बेसिन एरिया को केंद्र में रखा जाए।
  4.  मशीन के बाड़ – लंदन और वेनिस जैसे शहरों में mechanical barrier बनाए गए हैं जो पानी के खतरे के निशान से आगे जाने पर ऊंचे कर दिए जाते हैं।

बाढ़ का अर्थशास्त्र

जो बाढ़ जनता के लिए आपदा है वही मंत्री, अफसर, ठेकेदार के लिए अवसर है। बिहार में दो तरह का flood आता है- good flood और bad flood

Good flood वो है जो एक बार आता है तो धीरे-धीरे और विकराल होते जाता है यानी बचाव और राहत का काम  कई महीनों तक किसी उत्सव की तरह चलता रहता है। तटबंधों की मरम्मत, नहरों से गाद की निकासी, 24 घंटे निगरानी, लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए कम्यूनिटी किचेन, फूड पैकेट, किरासन, प्लास्टिक, मसहरी, राशन आदि का वितरण …प्रशासन इन सब कामों में पूरी तरह मुस्तैद रहता है…और इस राहत के साथ सबसे बड़ी राहत ये है कि इमरजेंसी फंड से हुए इस खर्च की ऑडिटिंग नहीं होती। यही वजह है कि हमारे यहां… बिडियो से डीएम तक हर किसी का सपना होता है….हे भगवान जब अफसरी दी है तो एक बार बाढ़ राहत का मौका भी दो। और bad flood वो है जो अफसरों को बड़ी कमाई की उम्मीद जगाने के बाद चंद हफ्तों में ही खत्म हो जाता है।  जो शराब नहीं मिलने को लेकर खुद को कोसते रहते थे, वो अफसर भी अभी बेहद खुश हैं क्योंकि बिहार में बाढ़ है और जहां बाढ़ नहीं है वहां सुखाड़ है। हमारे सरकारी तंत्र में सीई से जेई तक करप्शन का माइक्रो मैनेजमेंट इतना परफेक्ट है कि कहीं किसी सवाल की गुंजाइश ही नहीं। हर साल  मरम्मत पर अरबों खर्च होते हैं, लेकिन, कोई ये नहीं पूछता कि आखिर ये तटबंध और नहर हर साल टूटते क्यों हैं।

आम लोग सोचते थे कि सरकार बांध बनाएगी, नहर बनाएगी तो उनके खेतों की सिंचाई होगी, लेकिन हो सिर्फ ये रहा है कि इन नए बांधों और नहरों के जरिए बाढ़ नए इलाकों में पहुंच रही है। पहले अगर बाढ़ से तीन जिले प्रभावित थे तो अब दस जिले बाढ़ग्रस्त हो रहे हैं। उत्तर बिहार में अब वही इलाके बाढ़ से महफूज हैं जहां न कोई नहर है न कोई बांध।  

बिहार में बाढ़ का अपना अर्थशास्त्र है।  हर साल सरकार बाढ़पीड़ितों के राहत और पुनर्वास पर केंद्र सरकार के अनुदान से हजारों करोड़ का खर्च करती है । कभी गौर कीजिएगा, लाखों एकड़ इलाके की बाढ़ में मरने वालों की तादाद अक्सर कुछ सौ में ही दिखाई जाती है।

दरअसल प्रशासन जान-बूझकर मरने वालों की तादाद कम करके बताता है, क्योंकि ज्यादा लोगों की मौत को natural tragedy की जगह      administrative inefficiency  माना जाता है। यानी ट्रांसफर पक्का। और बाढ़ के समय अगर किसी डीएम, एसडीओ या बीडियो को ट्रांसफर का आर्डर मिले तो वो तो सदमे से ही मर जाए।

अब आप जल्द ही देखने वाले हैं, बिहार में जिला प्रशासन ट्विटर पर दावा पेश करेगा कि अमुक जिले में 150 से ज्यादा सेंटरों पर कम्यूनिटी किचेन खोले गए हैं, लेकिन दूसरी ओर हकीकत में सड़कों पर राहत का इंतजार कर रहे भूख से बिलखते हजारों लोग होंगे जिन्हें पता भी न होगा कि रोज उनके नाम पर दो वक्त का खाना और एक बार के नाश्ते की पर्ची कट रही है। कई बार मासूम बच्चे भूख से लाचार, रात में रोशनी देख कर हाईवे 57 पर खड़े हो जाते हैं और कोई तेज रफ्तार बस या ट्रक उन्हें कुचल कर आगे बढ़ जाता है।

..कभी पी साईंनाथ ने लिखा था—everybody loves a good drought । हमारे बिहार में ये बदल गया है। यहां Everybody loves a good flood!

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