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भारत में महंगे पेट्रोल-डीजल से नहीं मिलेगी निजात

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भारत में महंगे पेट्रोल-डीजल से नहीं मिलेगी निजात

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वैश्विक स्तर पर तेल के कीमतों में लगातार वृद्धि जारी है। इसकी मुख्य वजह रूस का यूक्रेन पर हमला है। ऐसे में रूस को सबक सिखाने के लिए अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया के बाद अब यूरोपीय यूनियन बैन लगाने की तैयारी में जुट गया है। रूस पर लगाए जा रहे प्रतिबंधों का नुकसान भारत को भी हो सकता है। ऐसी आशंका जताई जा रही है कि रूस पर बैन के बाद भारत में आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हो सकती है।

यूरोपीय यूनियन, रूस पर चरणबद्ध तरीके से प्रतिबंध लगाने की तैयारी में है। ऐसी उम्मीद है कि साल 2022 के अंत तक यूरोपीय यूनियन पूरी तरह से रूसी तेल का आयात बंद कर देगा। यूरोपीय यूनियन पहले ही रूस के शीर्ष बैंकों और यूरोपीयन एयरवेव्स के जरिए रूसी ब्रॉडकास्टर्स पर प्रतिबंध लगा चुका है। पश्चिमी देश मास्को की अर्थव्यवस्था को पंगु बनाने की कोशिशों में लगातार आगे बढ़ते जा रहे हैं। रूस द्वारा यूक्रेन पर आक्रमण करने के अंजाम के बदले ये देश अब मास्को की विदेशी मुद्रा भंडार को निचोड़ लेना चाहते हैं। यदि यूरोपीय संघ रूसी तेल आयात पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा देते हैं तो पुतिन के इस देश को 27 देशों के राजनीतिक और आर्थिक ब्लॉक से प्रतिदिन 450 मिलियन डॉलर का नुकसान होगा। आपको बता दें कि यूरोप का लगभग 25 प्रतिशत कच्चा तेल रूस से आता है।

कई यूरोप के कई देश जैसे कि हंगरी, स्लोवाकिया, फिनलैंड और बुल्गारिया रूस से अपने तेल का 75 प्रतिशत से अधिक आयात करते हैं। वही दूसरी और स्पेन, पुर्तगाल और फ्रांस रूस से अपेक्षाकृत कम मात्रा में तेल आयात करते हैं। ऐसे में हंगरी, बुल्गारिया जैसे देशों में पर इस प्रतिबंध का अधिक प्रभाव पड़ सकता है क्योंकि ये देश भौगोलिक रूप से रूस के नजदीक रहने के कारण इस पर काफी हद तक निर्भर हैं। इसलिए हंगरी ने प्रतिबंध लगाने के लिए और अधिक समय मांगा है।

रूस के आयात पर यूरोपीय संघ का प्रतिबंध दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल उपभोक्ता भारत को भी प्रभावित कर सकता है। भारत अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल खरीदार है। वही, यूरोपीय यूनियन रूसी ऊर्जा का सबसे बड़ा खरीदार है। बीते वर्ष रूस ने अपने कुल निर्यात का 27 फीसदी हिस्सा यूरोपीय यूनियन को दिया। ऐसे में जब प्रतिबंध लागू होता है तो यूरोपीय देश अपने ऊर्जा जरूरतों की पूर्ति के लिए उन देशों का रूख करेंगे जो पहले से ही अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया को तेल बेच रहे हैं। जाहिर है इन देशों से भारत भी तेल खरीदता है। ऐसे में मांग अधिक होने की सूरत में तेल की कीमतें बढ़ेंगी जिसका असर भारत में भी देखने को मिलेगा।

भारत अपना 85 फीसदी तेल लगभग 40 देशों से आयात करता है। जिनमें से अधिकांश मिडिल ईस्ट और अमेरिका से आता है। रूस से भारत महज 2 फीसदी तेल का आयात करता है। यूक्रेन पर आक्रमण के बाद से भारत पहले ही रूस से अधिक छूट के कारण दोगुना तेल खरीद चुका है। लेकिन निकट भविष्य में रूस से तेल के आयात को और बढ़ाना आसान नहीं होने जा रहा है। इसकी वजह समुद्री बीमा जैसे क्षेत्रों में अंतराष्ट्रीय प्रतिबंधों का कड़ा होना है। इसके अलावा पश्चिमी देश भारत पर रूस के साथ संबंधों को कम करने के लिए पहले से ही दबाव बनाते रहे हैं।

अगर ये यूरोपीय देश रूस से तेल आयात करना बंद कर देते हैं तो इनके पास सऊदी अरब का विकल्प है। सऊदी अरब, 23 तेल निर्यातक देश ओपेक प्लस का प्रमुख सदस्य है। वहीं रूस भी ओपेक प्लस का मुख्य साझीदार है। अमेरिका और ब्रिटेन द्वारा बार-बार तेल उत्पादन में वृद्धि की अपील के बावजूद सऊदी उनकी अनदेखी कर रहा है। अन्य गैर रूसी-तेल स्रोतों की बात करें तो स्वंय अमेरिका, लैटिन अमेरिका और अफ्रीका वे देश हैं जहां यूरोपीय देश विकल्प तलाश सकते हैं। इसके लिए अमेरिका ने वेनेजुएला पर प्रतिबंधों में ढ़ील देने के अलावा अपने महत्वपूर्ण तेल भंडारों को रिलीज करने के आदेश दिए हैं।

हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इन देशों के साथ यदि ईरान को भी शामिल कर लिया जाए तो भी रूसी तेल की भरपाई नहीं कर सकते। मध्य तथा पूर्वी यूरोप में कई रिफाइनरियां सोवियत काल की पाइपलाइनों का उपयोग कर रही हैं। ऐसे में तेल के नियार्त में बड़े पैमाने पर बदलाव आसान नहीं होगा।

वर्तमान में लगातार तेल की वैश्विक कीमतों में तेजी देखने को मिल रही है। इसका मतलब रूस तेल की कम मांग होने के बावजूद अधिक पैसा कमा रहा है। लेकिन यूरोपीय प्रतिबंध के बाद रूस को तेल के उत्पादन और निर्यात में कमी लानी पड़ सकती है क्योंकि वह संभवतः अपनी आपूर्ति यूरोप से एशिया की तरफ मोड़ नहीं सकता। इसके साथ ही रूस के लिए तेल भंडायण सुविधाएं भी सीमित हैं ऐसे में उसे तेल के कम उत्पादन का फैसला लेना होगा।

Expensive petrol and diesel will not get rid of in India

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