Type to search

#farm ordinance 2020: कृषि कानूनों का इंटरनेशनल कनेक्शन

जरुर पढ़ें देश

#farm ordinance 2020: कृषि कानूनों का इंटरनेशनल कनेक्शन

#farm ordinance 2020
Share on:

भारत बंद के एक दिन पहले हरियाणा से किसानों का एक समूह कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर से मिला और कृषि कानूनों के प्रति अपने समर्थन का इजहार किया। सवा लाख किसानों का प्रतिनिधित्व करने वाला ये समूह FPO – farmer producer organisations है। FPO एक तरह से 300 के करीब छोटे किसानों की एक कंपनी होती है जो कृषि उत्पादों का कारोबार करती है। 2020 से 23 तक के लिए सरकार ने इनके लिए 4,496  करोड़ के बजटीय समर्थन देने का ऐलान किया है। सरकार को उम्मीद है कि देश में दस हजार FPO बन गए तो किसानी को कारोबार बनाने में मदद मिलेगी। सवाल है सरकार क्यों ऐसा चाहती है? दरअसल WTO के मेंबर के तौर पर हम हमेशा कृषि को दूसरे देशों से अलग नहीं रख सकते। WTO सदस्य देशों से कृषि को लेकर तीन मांगें रखता है।

  1. अपना बाजार खोलें ताकि दूसरे देशों के कृषि उत्पाद आपके यहां बिक सकें
  2. अपने देश के कृषि उत्पाद को दूसरे देशों से आने वाले उत्पादों का मुकाबला करने दें, उन्हें तय शर्तों के अलावा किसी दूसरे तरह की मदद न दें, जिससे वो दूसरे देशों के मुकाबले अपने बाजार में सस्ता बिके
  3. कृषि उत्पादों पर सबसिडी न दें  

बीते 26 सालों में धीरे-धीरे QRsयानी quantitative restrictions हटाने से ये हुआ है कि भारतीय बाजार में विदेशी दूध पावडर, खाने का तेल, चीनी, चाय, फल, ड्राई फ्रूट की बाढ़ आ गई है।  2015 में WTO ने कृषि पर हर तरह की एक्सपोर्ट सबसिडी हटाने का फैसला किया और farm export support के लिए नए कानून बनाए।  इसके तहत सबसिडी को चार रंग में बांटा गया।

 Green box – non trade distorting

Blue box – production limiting

Amber box – market distorting

Red box – prohibited

नतीजा ये हुआ है कि भारत जैसे विकासशील देश अपने यहां किसानों के लिए जो भी कदम उठाते हैं, उन्हें विकसित देश पीला-भूरा यानी Amber केटेगरी में करार देते हैं।दो महीने पहले, 22-23 सितंबर को WTO  के  COA- कमेटी ऑन एग्रीकल्चर- की बैठक हुई तो अमेरिका, कनाडा और ईयू ने भारत में कई तरह की सबसिडी दिए जाने का मुद्दा उठाया और उन्हें अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के खिलाफ बताया।

यूरोपीय देशों के संगठन ईयू को हमारे यहां जिस तरह कई राज्यों ने कृषि कर्ज माफ किए उस पर आपत्ति है। इसके अलावा ईयू ने एमएसपी पर अनाज खरीदने, अनाज का बफर स्टॉक रखने और राशन दुकानों के जरिए गरीबों को अनाज देने के नाम पर 18 बिलियन $ खर्च करने पर एतराज जताया। ईयू को कृषि सेक्टर को सिंचाई, खाद, बिजली और डीजल के लिए  $24.18 बिलियन की सबसिडी पर भी एतराज है।

कनाडा को पीएम किसान योजना और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना पर आपत्ति है।

अमेरिका को भारत में अनाज का बफर स्टॉक रखने पर आपत्ति है. मई 2018 में अमेरिका ने MSP को खत्म करने की मांग की थी। क्योंकि ये कथित तौर पर WTO के 10% MPS- market price support सीमा से ज्यादा है। अमेरिका का दावा है कि भारत MSP के नाम पर उत्पादन कीमत का 77% सबसिडी चावल पर और 65% गेहूं पर दे रहा है।

ऑस्ट्रेलिया को सुगर मिलों को कर्ज देने और चीनी पर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाने पर ऐतराज है।

तीन कृषि कानूनों में कांट्रैक्ट फार्मिंग, नई मंडियां बनाने और निजी क्षेत्र के लिए राज्यवार बाधाएं हटाने की जगह केंद्र सरकार के एक कानून के जरिए वन नेशन वन मार्केट की अवधारणा को WTO में भारत पर लगातार पड़ रहे दबाव के संदर्भ में भी देखने और समझने की जरूरत है।

RCEP से भारत के अलग होने की एक बड़ी वजह ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलेंड की उन्नत डेयरी बिजनेस है, जिसका मुकाबला करने में हमारा डेयरी उद्योग अभी सक्षम नहीं है।

 हम चाहें या न चाहें, एक बार फिर देश 1991 मोमेंट के करीब है।

Shailendra

Share on:
Tags:

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *