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किसान आंदोलन का अंबानी-अदानी कनेक्शन!

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किसान आंदोलन का अंबानी-अदानी कनेक्शन!

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farmers protest and ambani-adani connection

पिछले कई दिनों से जारी किसान आंदाेलन (Farmers protest) अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां से शांतिपूर्ण समाधान की गुंजाइश कम ही दिख रही है। किसान तीनों नये कृषि कानूनों को वापस लेने से कम पर बात करने को तैयार नहीं और सरकार इन कानूनों में संशोधन से ज्यादा कुछ भी मानने को तैयार नहीं। दोनों अपनी-अपनी जिद पर अड़े हैं। शायद दोनों के लिए अब ये मुद्दे का कम, प्रतिष्ठा का सवाल ज्यादा बन गया है।

सवाल ये है कि जब सरकार सभी जरुरी संशोधनों के लिए तैयार है, तो किसान इन कानूनों को वापस लिए जाने की मांग पर क्यों अड़े हैं? इसकी बड़ी वजह किसानों की ये धारणा है कि ये कानून किसानों के लिए नहीं, बल्कि अंबानी-अदानी के हितों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। विपक्ष का भी आरोप है कि सरकार ने ये कानून अंबानी-अडानी को फायदा पहुंचाने के लिए ही बनाया है। रवीश कुमार जैसे वरिष्ठ पत्रकारों का सवाल है कि कानून बन जाने के बाद छोटे किसान अंबानी-अदानी का मुकाबला कैसे कर पाएंगे?

अंबानी का क्या है फायदा?

इसमें कोई दो राय नहीं कि मुकेश अंबानी और गौतम अडानी, दोनों की नजरें भारत के कृषि क्षेत्र पर हैं। 2006 में शुरु हुए रिलायंस फ्रेश के आज 620 से ज्यादा स्टोर्स हैं, जिनमें 200 मेट्रिक टन फलों और 300 मेट्रिक टन सब्जियों की रोजाना बिक्री होती है। कंपनी का खुद भी कहना है कि वह अपने 77% फल सीधे किसानों से खरीदती है। साल 2017 में अंबानी ने इस क्षेत्र में निवेश की इच्‍छा जताई थी। जियो प्‍लेटफॉर्म पर जियो कृषि नाम का एक ऐप भी है जो किसान के खेत से आपकी प्‍लेट तक सप्‍लाई चेन तैयार करेगी। इसके अलावा रिटेल सेक्टर में रिलायंस लगातार अपने पांव जमाने की कोशिश कर रहा है। रिलायंस रिटेल ने फ्यूचर ग्रुप (बिग बाज़ार) को खरीद लिया है और वॉलमार्ट से भी उनकी बातचीत चल रही है। उधर, अमेजन जैसी कंपनियां भी भारत के रिटेल मार्केट में जगह बनाने की कोशिश में जुट गई हैं।

खेती में अदानी कनेक्शन

अगर अंबानी रिटेल क्षेत्र में रुचि दिखा रहे हैं, तो अडानी भंडारण के क्षेत्र में। अडानी एग्री लॉजिस्टिक्स खाद्यान्न के लिए एक एकीकृत थोक हैंडलिंग, भंडारण और रसद प्रणाली है, जो फिलहाल भारतीय खाद्य निगम (FCI) को एंड-टू-एंड थोक आपूर्ति श्रृंखला प्रदान करती है। ये 2007 से ही भारतीय खाद्य निगम (FCI) के साथ मिलकर काम कर रही है। कंपनी की ओर से पंजाब के मोगा और हरियाणा के कैथल में अनाज भंडारण केंद्रों की स्थापना की गई है। अडानी ने इन दोनों भंडारण और पांच फील्ड भंडारण (चेन्नई, कोयंबटूर, बेंगलुरु, नवी मुंबई और हुगली) के लिए 650 करोड़ रुपये निवेश किये हैं। FCI के मुताबिक अडानी एग्रो लॉजिस्टिक्स का काम खाद्य सामग्री को सुरक्षित रखना और उसे मोगा बेस डिपो से अलग-अलग फील्ड डिपो तक पहुंचाने का ही है। मोगा स्थित साइलो(भंडारगृह) में कंपनी अपने फोर्च्यून ब्रांड के आटे के लिए करीब 20 लाख बोरी गेहूं का स्टॉक भी रखती है।

सरकार ने 2017 में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मोड के तहत 100 लाख टन क्षमता के स्टील साइलो के निर्माण का लक्ष्य रखा था, लेकिन 31 मई 2019 तक सरकार PPP के तहत 6.75 लाख टन क्षमता के स्टील साइलो का ही निर्माण कर पाई है, जिसमें मध्य प्रदेश में 4.5 लाख टन और पंजाब-हरियाणा में 2.25 लाख टन क्षमता वाले स्टील साइलो बन पाए हैं। ये सभी अडानी के हैं। फिलहाल, इस कंपनी के पास 13 अत्याधुनिक साइलो हैं और इसके अलावा प्रमुख शहरों में इसके अपने रेल रेक और टर्मिनल भी हैं।

क्या होता है साइलो?

अडानी ने अनाज भंडारण के लिए बड़े बड़े स्टील के टैंक बनाए हैं जिसे साइलो स्टोरेज कहते हैं। साइलो स्टोरेज एक विशाल स्टील ढाँचा होता है जिसमें थोक सामग्री भंडारित की जा सकती है। नमी और तापमान से अप्रभावित रहने के कारण इनमें अनाज लंबे समय तक भंडारित किया जा सकता है। साइलो के नवीनतम रूप में रेलवे साइडिंग के जरिये बड़ी मात्रा में अनाज की लोडिंग/अनलोडिंग की जा सकती है। इससे भंडारण और परिवहन के दौरान होने वाले अनाज के नुकसान में काफी कमी आती है।

FCI के अधिकारियों के मुताबिक कैथल जिला में स्थित साइलोज में दो लाख टन गेहूं के भंडारण की क्षमता है। अधिकारियों का कहना है कि इस क्षेत्र के किसानों को इस साइलो की सुविधा मिली हुई है, जो भारतीय खाद्य निगम के माध्यम से अपनी फसल को यहां बिक्री करते हैं। मंडियों में लाकर बेचने वाले किसान उनसे अपने आढ़ती के नाम का गेट पास लेकर अपनी गेहूं को बिना मंडी में ढेर किए सीधा अपने वाहन पर लाद कर यहां ला सकेंगे। यहां आए अनाज की, किसान की उपस्थिति में ही गुणवत्ता व इसमे मिट्टी व टूटे दानों की आधुनिक प्रयोगशाला में जांच होगी। भंडार योग्य पाए गए अनाज को मशीन की सहायता से भंडार गृह में पहुंचाया जाएगा। इस प्रक्रिया में करीब दस मिनट का समय लगेगा और सामान्य परिस्थितियों में प्रति घंटा 150 टन अनाज इस स्टोर किया जा सकेगा। आमतौर पर किसान फसल को मंडियों में लेकर जाते हैं, जहां मौसम का डर तो रहता ही है, वहीं कई दिनों तक फसल बेचने का इंतजार भी करना पड़ता है।

दरअसल स्टील साइलो ही अनाज भंडारण का भविष्य है। सबसे पहले दुनिया में कनाडा में साइलो स्टोरेज बनाए गए थे। कनाडा और भारत सरकारों के बीच हुए समझौते के तहत पंजाब, गुजरात व पश्चिम बंगाल में साइलो स्टोरेज बनाए जा रहे हैं। ये और बात है कि इस फील्ड में अभी अडानी ही अकेला प्लेयर बन कर उभरा है। लेकिन कानून जारी रहा तो जल्द ही कई देशी-विदेशी कंपनियां मार्केट में उतर जाएंगी।

क्यों जरुरी है भंडारण की बेहतर व्यवस्था?

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन की 2011 की एक स्टडी के मुताबिक विश्व भर में उगने वाले अनाज का एक तिहाई यूं ही बर्बाद हो जाता है। यानी हर साल करीब 1.3 अरब टन फसल की बर्बादी। भारत में खेती के दौरान खेत में प्रति क्विंटल धान पर 3.82 किलो का नुकसान होता है जबकि गेहूं के मामले में यह 3.28 किलो है। इसके बाद अनाज की थ्रेसिंग या मड़ाई के दौरान प्रति क्विंटल लगभग पांच सौ ग्राम का नुकसान होता है। मंडी पहुंचने पर भंडारण के दौरान भी विभिन्न कारणों (गोदामों की कमी, खराब आधारभूत ढांचा, चूहों की समस्या और कोल्ड स्टोरेज में नमी) की वजह से चावल के मामले में 1.2 किलो प्रति क्विंटल और गेहूं के मामले में 0.95 किलो प्रति क्विंटल का नुकसान होता है।

खाद्य विशेषज्ञों के मुताबिक अनाज के खेत-खलिहान से लेकर बाजार तक के सफर में कुल फसल का लगभग 40 फीसदी बर्बाद हो जाता है। भारत में सप्लाई चेन की तस्वीर भी काफी उलझी हुई है। इसका 95 फीसदी हिस्सा असंगठित क्षेत्र के हाथों में है। एक उत्पाद के ग्राहक तक पहुंचने से पहले औसतन छह से सात बिचौलियों के हाथों से होकर गुजरता है। और अनाज जितने हाथ बदलेगा, उसका नुकसान (ट्रांजिट लॉस) भी उतना ही ज्यादा होगा।

फल-सब्जी पैदा करने वाला दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश होने के बावजूद निर्यात में भारत की हिस्सेदारी फलों में महज 0.5 फीसदी और सब्जियों में 1.7 फीसदी है. केंद्र सरकार के मुताबिक कुल पैदावार की अनुमानित कीमत 10 खरब रुपये है। लेकिन इसमें से 57 फीसदी बर्बाद हो जाता है क्योंकि इसके संरक्षण के लिए पर्याप्त बुनियादी ढांचा नहीं है। यहां सालाना पैदा होने वाले 20 करोड़ टन फल-सब्जी में से सिर्फ 2.36 करोड़ टन को ही कोल्ड स्टोरेज में जगह मिल पाती है। इनमें भी 80 फीसदी हिस्सा सिर्फ आलू का है।

Farmers protest: मुनाफे का सौदा नहीं है खेती?

किसी भी कानून पर राय देने से पहले ये याद रखना चाहिए कि आज सबसे बड़ी जरुरत इस बात कि है खेती को मुनाफे का सौदा बनाया जाए। लाखों किसान आज इसलिए पलायन को मजबूर हैं क्योंकि कृषि अब मुनाफे का रोजगार नहीं रह गया है। ये बात पंजाब-हरियाणा के किसानों के लिए भले सही ना हो, लेकिन देश के आधे से अधिक राज्यों के लिए बिलकुल सही है। आप यह जानते हैं कि बिहार का एक औसत किसान महीने भर में जितना कमाता है, उससे पांच गुना ज्यादा आमदनी पंजाब के औसत किसान की है?

पंजाब के किसानों की औसत मासिक आमदनी 18,059 रुपये है, जबकि बिहार के किसानों की औसत मासिक आमदनी महज 3,358 रुपये ही है। हरियाणा के किसानों की भी आमदनी भी दूसरे नंबर पर है। और ये कमाई इसलिए है कि पंजाब के बड़े-बड़े खेतों में बिहार के किसान मजदूरी के लिए जाते हैं। पंजाब जाना उनकी मजबूरी है क्योंकि उनके राज्य में खेती करना अब मुनाफे का सौदा नहीं रह गया है। यही हाल उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों का है। जिस देश की 53 फीसदी आबादी का रोजगार खेती हो, उसके लिए इस क्षेत्र का फायदेमंद नहीं होना वाकई घातक है।

किसानों को हो सकता है फायदा

बड़ी कंपनियों से किसानों को किस तरह का फायदा हो सकता है, इसका उदाहरण देखिये। हिमाचल प्रदेश सरकार ने ल़ॉकडाउन के दौरान कई बड़ी कंपनियों को तैयार फसलें गांवों में ही खरीदने को राजी कर लिया है। बागवानों से मौके पर ही फसलें खरीदकर रेफ्रिजरेटेड वैनों से दूसरे राज्यों में ले जाया जाएगा। फसल का भुगतान भी तत्काल कर दिया जाएगा। पहले चरण में बिग बास्केट कंपनी कोटगढ़ क्षेत्र में चेरी खरीदेगी। इस बेल्ट के आसपास हर साल करीब तीन हजार मीट्रिक टन फलों की पैदावार होती है। इनमें बादाम, आड़ू, प्लम, खुमानी और चेरी शामिल है। गो फॉर फ्रेश कंपनी से भी बातचीत चल रही है। यह कंपनी सोलन में खरीद केंद्र खोलेगी और यहां पर किसानों से मटर, टमाटर सहित अन्य फसलें खरीदेगी। अन्य कंपनियां जैसे, रिलायंस फ्रेश और सफल भी किसानों की फसलें और फल खरीदने आ रही हैं।

अब यहां के किसानों को दिल्ली या बाहरी मंडियों में अपने उत्पाद ले जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। हो सकता है कंपनियां बाजार से कम कीमत तय करें , लेकिन किसानों को ना तो परिवहन की चिंता होगी ना मंडियों के दलालों को कमीशन देने की फिक्र। साथ ही परिवहन के दौरान और बिक्री में होने वाली देरी की वजह से फसलों को होनेवाले नुकसान की भी भरपाई नहीं करनी पड़ेगी। फलों-सब्जियों के मामले में दो-तीन दिनों की देरी भी उत्पाद का भाव गिरा सकती हैं और उनके खराब होने का खतरा बढ़ जाता है। इसके बावजूद अगर उन्हें बाहर बेचने में ही फायदा नज़र आए तो वो अपने उत्पाद, मंडियों में ले जाकर बेचने के लिए भी स्वतंत्र हैं।

एक और उदाहरण, अडानी एग्रीफ्रेश इस साल हिमाचल प्रदेश में 30 हजार टन सेब खरीदेगी। पिछले साल कंपनी ने 25 हजार टन सेब खरीदे थे। ये सेब 38-40 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से खरीदे गए थे। शिमला के रामपुर, सैंज और रोहरू में अडानी के तीन भंडारगृह हैं। इनमें से प्रत्येक की क्षमता 6,000 टन है। रोहरू स्टोर की क्षमता बढ़ाकर 8,400 टन की जाएगी। यानी इनकी स्टोरेज क्षमता है करीब 25000 टन। आपको बता दें कि गत वर्ष 3.22 करोड़ टन पेटी सेब का उत्पादन हुआ था। अडानी के अलावा कॉनकॉर्स फ्रेश एंड हेल्दी, महिंद्रा एंड महिंद्रा मदर डेयरी और देव भूमि भी यहां के सेब खरीदारों में शामिल है।

क्या है भविष्य?

कुल मिलाकर सच तो यही है कि किसानों का माल आढ़तिये ही खरीदेंगे। फर्क सिर्फ ये होगा कि अब छोटे आढ़तियों के बजाए अदानी-अंबानी जैसे कॉरपोरेट आढ़तिये होंगे। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि छोटे आढ़तिये खत्म हो जाएंगे। आपको ऐसा लगता है कि बड़े खिलाड़ी के आने पर छोटे खिलाड़ी खत्म हो जाएंगे? क्या रिलायंस या बिग बाजार के स्टोर खोलने से छोटे किराना दुकान बंद हो गये? क्या रिलायंस मार्ट के कपड़े बेचने से कपड़ों की दुकानें बंद हो गईं, या मोबाइल या इलेक्ट्रॉनिक सामानों के दुकानदार दिवालिया हो गये?

कोई होगा बड़ा कारोबारी अंबानी-अदानी जैसा, लेकिन देश के छोटे कारोबारी भी कुछ कम नहीं। ये अपने बिजनेस को बचाने और बढ़ाने का हुनर जानते हैं, क्योंकि अंबानी और अदानी भी इन्हीं में से निकले हैं। दूसरी बात, भारत का बाजार इतना बड़ा है कि एक-दो अंबानी-अदानी या एमेजन-वॉलमार्ट की कूव्वत नहीं कि सारे बाजार पर कब्जा कर सके।

ये सही है कि अन्नदाता खुशहाल रहेगा, तभी हमारा पेट भरेगा…लेकिन ये भी समझना होगा कि व्यापारी बढ़ेगा, तभी देश बचेगा। आज से 50-60 साल पहले जीडीपी में कृषि का योगदान 55 फीसदी था, और हम गरीब देशों में गिने जाते थे। आज जीडीपी में कृषि का योगदान 17 फीसदी है, जबकि उद्योग-व्यापार आदि क्षेत्रों का 55 फीसदी…और हम दुनिया की 5 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हैं। इसलिए सरकार पर दबाव बनाइये, ताकि किसानों के हित सुरक्षित रह सकें और किसी एक कंपनी को सारे फायदे ना मिल सके, लेकिन ऐसे कानूनों को ना रोकें जो देश के विकास को गति देनेवाले हों।

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