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किसान आंदोलन: क्यों ज़रुरी है इसकी कामयाबी?

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किसान आंदोलन: क्यों ज़रुरी है इसकी कामयाबी?

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कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब से शुरू हुआ आंदोलन (farmers protest) अब पूरे उत्तर भारत में फैल चुका है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और अब गुजरात के किसान भी कृषि आंदोलन में शामिल हो गए हैं। पिछले एक हफ्ते में दिल्ली-एनसीआर की सीमाओं पर 8 से 10 लाख किसानों का जमावड़ा हो चुका है। कई दूसरे राज्यों से किसान और अन्य संगठन इस आंदोलन के समर्थन में लगातार दिल्ली पहुंच रहे हैं। अब ये आंदोलन किसी प्रदेश विशेष या मुद्दे से जुड़ा नहीं रह गया है। ये आंदोलन अब सरकार के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करने की एक कोशिश में तब्दील हो चुका है।

आशंकाओं पर टिका विरोध

इस आंदोलन की खासियत ये है कि इसमें विरोध (farmers protest) की तमाम आवाजें इस बात पर टिकी हैं कि नये कानून लागू होने से किसानों के सामने नई समस्याएं खड़ी हो सकती हैं। जबकि इस कानून से जुड़ी कई चीजें पहले से ही कई राज्यों में लागू हैं। उदाहरण के लिए –

MSP का मुद्दा

  • किसानों को आशंका है कि सरकार इस कानून के जरिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की व्यवस्था ही खत्म कर देगी। जबकि सरकार कई बार आश्वासन दे चुकी है कि ऐसा कुछ भी नहीं होने जा रहा।
  • पहले आशंका सच तो होने दीजिए….सरकार जब ऐसा फैसला ले, तब आंदोलन कीजिए…आंदोलन के लिए किसी वक्त की जरुरत तो है नहीं, मुद्दे की जरुरत है। लेकिन किसानों की आशंकाओं को इतना भड़काया गया, कि वो सरकार के किसी फैसले से पहले ही आंदोलन में कूद पड़े।
  • ये बात नीति आयोग से लेकर तमाम रिपोर्ट में आ चुकी है कि देश के 6 फीसदी किसान ही MSP का फायदा उठा पाते हैं। तो इन 6 फीसदी लोगों के लिए इस व्यवस्था का जारी रहना क्यों जरुरी है?
  • क्या आप जानते हैं कि देश में सरकार के बाद दूसरी सबसे ज्यादा अनाज खरीदने वाली कंपनी है, ITC ग्रुप? 75,000 करोड़ नेटवर्थ वाली इस कंपनी ने इस साल देश भर के किसानों से 22 लाख टन गेहूं सीधे ख़रीदा है। इसके अलावा पतंजलि, नेस्ले, गोदरेज और महिंद्रा जैसी निजी कंपनियां भी सालों से कृषि उत्पादों की बड़े पैमाने पर खरीद कर रही हैं। इनमें से कोई भी कंपनी MSP पर उत्पाद नहीं खरीदती।
  • आईटीसी ग्रुप ने साल 2000 में ई-चौपाल योजना शुरु की थी। इसके जरिए वो किसानों से उनके उत्पाद खरीदता है। ये देश के 10 राज्यों के 35,000 गाँवों में फैला है और इससे इससे 40 लाख किसान जुड़े हैं। कंपनी की योजना इस संख्या को 1 करोड़ तक ले जाने की है। इस व्यवस्था से जुड़े किसानों को फायदा ही हुआ है, नुकसान नहीं।

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से ऐतराज

  • किसानों को आशंका है कि बड़े-बड़े कॉरपोरेट हाउस उनकी जमीन पर कब्जा कर लेंगे और उन्हें बंधुआ मजदूर बना लेंगे। आंदोलन में पहुंचे कुछ किसानों को डर है कि खेती-बाड़ी के निजीकरण से उनकी पहचान ही मिट जाएगी।
  • कुछ किसानों को आशंका है कि ये क़ानून हमारी नस्ल को ख़त्म करने की नीयत से बनाए गए हैं। इससे केवल उद्योगपतियों को फ़ायदा होगा।
  • लेकिन भारत में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कोई नई बात नहीं है। APMC Act, 2003 के तहत ही कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को अनुमति मिल गई थी और APMC को ही इन कॉन्ट्रैक्ट्स को रिकॉर्ड करने की जिम्मेदारी दी गई थी।  
  • देश में लगभग 66 फीसदी मुर्गी उत्पादन (poultry production) कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के तहत ही होता है। इसमें ये जरुर है कि अंडों की कीमत National Egg Coordination Committee तय करती है।
  • देश में गन्ना और पॉल्ट्री उत्पादन के क्षेत्र, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की सफलता के सबसे बड़े उदाहरण हैं।

कॉन्ट्रैक्ट से शोषण का खतरा?

  • ये आशंका जताई जा रही है कि बड़े कॉरपोरेट घराने, जो कॉन्ट्रैक्ट करेंगे उसे किसान पढ़ेंगे कैसे और शोषण से कैसे बचेंगे?
  • लेकिन नये कानून के मुताबिक हर राज्य में एक रजिस्ट्रेशन अथॉरिटी होगी, जो इलेक्ट्रॉनिकली कॉन्ट्रैक्ट्स को रजिस्टर करेगी। राज्य सरकारें इन कॉन्ट्रैक्ट को लेकर अपनी सुविधा और किसानों के हितों के मुताबिक नये नियम भी जोड़ सकती हैं।
  • नये कानून के मुताबिक उपज की कीमत में बदलाव भी एग्रीमेंट का हिस्सा होगा। अगर कीमत कम लगे, तो APMC या इलेक्ट्रॉनिक पोर्टल की कीमतें ही बेंचमार्क होंगी।
  • ये एग्रीमेंट एक से 5 साल तक का हो सकता है। अगर भरोसा नहीं है तो केवल 1 साल का एग्रीमेंट कीजिए और फिर अगले साल, अपनी शर्तों पर किसी और के साथ एग्रीमेंट कीजिए…। इसमें बंधुआ मजदूरी या जमीन छिनने जैसी बात कहां से आती है?
  • अप्रैल 2013 में पंजाब में अकाली दल की सरकार ने भी पंजाब कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग एक्ट पास किया था। इसमें किसानों को सुरक्षा देने के लिए कई प्रावधान थे। जैसे – बकाये की वसूली के लिए किसान की जमीन की बिक्री या गिरवी नहीं रखा जा सकता। इसमें भी ये प्रावधान नहीं था कि उत्पाद की बिक्री MSP से नीचे नहीं हो सकती। वैसे राजनीतिक एवं अन्य संगठनों के विरोध के कारण इसे कभी लागू नहीं किया गया।
  • कानून बने या ना बने, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग तो हो ही रही है। देश के 19 राज्यों में कांट्रैक्ट फार्मिंग को कानूनी वैधता पहले से ही हासिल है।
  • पश्चिम बंगाल में कई छोटे और सीमांत किसान कॉन्ट्रैक्ट पर चिप्स के लिए आलू उगाते हैं, लेकिन उनके बीच कोई लिखित एग्रीमेंट नहीं होता। कंपनियां समय-समय पर खेतों का दौरा करती हैं और आलू की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए कई तरह सुविधाएं मुहैया कराती हैं।
  • वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग पर हुए ज्यादातर रिसर्च में यही नतीजा निकला है कि दुनिया भर में इस तरीके से फसल उगाने वाले किसानों की आय, बाकी किसानों की तुलना में 25 से 75 फीसदी तक ज्यादा है।

क्या है नुकसान?

मौजूदा व्यवस्था में कुछ ऐसी कमजोरियां है, जो सरकार और किसान, दोनों के लिए परेशानी का सबब हैं। इनमें जो सबसे अहम हैं –

  • FCI (फ़ूड कार्पोरेशन ऑफ़ इंडिया) के गोदामों में इस साल जून तक 832 लाख टन अनाज था। विशेषज्ञों के मुताबिक,सरकार को पीडीएस के लिए केवल 400 लाख टन के स्टॉक की ज़रूरत है। यानी सरकार ज़रुरत न होते हुए भी सियासी मजबूरियों की वजह से MSP पर अनाज खरीदती जाती है।
  • किसानों की आत्महत्या या कर्जे में डूबने का सबसे बड़ा कारण होता है मौसम की मार जैसे – ओला, कम या ज्यादा बारिश, ठंड या तूफान आदि। लोन लेकर खेती करनेवाले ज्यादा किसान इस वजह से कर्ज के दुश्चक्र में फंस जाते हैं।
  • नये कानून से किसानों को फसल लगाने के पहले ही तय कीमत मिलना सुनिश्चित हो जाएगा और फसल के नुकसान की भरपाई अपनी जेब से नहीं करनी होगी। इससे एक तरफ सरकार का बोझ कम होगा, तो दूसरी तरफ किसान को कर्जे से मुक्ति मिलेगी। इसमें ये जरुर है कि, ये कीमत आम तौर पर उनकी अच्छी फसल के मुनाफे से कम होगी।

जरूरी है सरकार को झुकाना

तो क्या आंदोलन (farmers protest) की कोई जरुरत नहीं है? किसानों को भड़काया जा रहा है? नहीं….ये आंदोलन जरुरी है। इसलिए नहीं कि किसानों की सभी मांगें सही हैं, या नये कानून पूरी तरह गलत हैं….बल्कि इसलिए कि ये आंदोलन लोकतंत्र के लिए जरुरी है। पहली बात…आंदोलन जनता का हक है और सरकार को उन्हें रोकने की कोशिश नहीं करनी चाहिए थी। दूसरी बात…किसानों के हित में कानून बनाने से पहले सरकार को किसानों से बात जरुर करनी चाहिए थी। ये सरकार जनता द्वारा चुनी गई है, और उसे मनमानी करने का कोई हक़ नहीं है। इसलिए सरकार चाहे कानून में संशोधन करे या नया बिल लाए, लेकिन उसे किसानों की आशंकाएं दूर करनी ही होंगी।

वैसे भी बीजेपी सरकार अपने मनमाने फैसले के लिए अक्सर आलोचना के केन्द्र में रही है। देश में ऐसा माहौल बनता जा रहा है जिसमें विरोध करने की गुंजाइश कम होती दिख रही है। CAA-NRC जैसे कई मुद्दों पर सरकार ने जताया कि वो बातचीत के बजाए अपनी ताकत पर ज्यादा भरोसा करती है। ये आंदोलन उन तमाम मुद्दों की प्रतिक्रिया है…जिनकी वजह से जनता का सरकार से भरोसा उठता जा रहा है…।

यही वजह है कि इसमें ऐसे लोग भी शामिल हैं, जो नये कानून की बारीकियां नहीं समझते, लेकिन सरकार की मंशा पर संदेह जरुर करते हैं। करीब 10 लाख लोगों की इस भीड़ में कई ऐसे लोग भी शामिल हैं जिनके लिए राजधानी के किसी विरोध-प्रदर्शन का हिस्सा बनना, सरकार के खिलाफ अपनी मौजूदगी दर्ज कराने जैसा है। किसी तानाशाही फैसले के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने वाला ये प्रदर्शन, एक क़ौम के ज़िंदा होने का सबूत है। यकीन जानिए…ये सरकार झुकेगी…और जरुर झुकेगी….उसे मानना ही पड़ेगा कि जनतंत्र में जनता सर्वोपरि है….सरकार नहीं।

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