Type to search

लॉकडाउन के पांच सबक

कोरोना जरुर पढ़ें देश राजनीति संपादकीय

लॉकडाउन के पांच सबक

Share

न बाढ़ न सुखाड़, फिर भी आजादी के बाद भूख के सबसे बड़े संकट से गुजर रहा है भारत।

क्या होना चाहिए ?

  1. फूड बैंक – लंगर से आगे की दुनिया यानी फूड बैंक के बारे में सोचें। दुनिया के सबसे अमीर देश अमेरिका में 1967 में फूड बैंक की शुरुआत हुई। ये सरकार ने नहीं, कॉरपोरेट्स ने शुरू किया। 1967 में John van Hengel ने फीनिक्स में St. Mary’s Food Bank के नाम से अमेरिका का पहला फूड बैंक बनाया। धीरे-धीरे लोगों को इसकी अहमियत पता चली और 12 साल बाद 1979 में हेंजेल के Feeding America की शाखाएं सारे अमेरिका में हो गईं। इसके पीछे सोच ये थी कि हम हर किसी को काम तो नहीं दे सकते, लेकिन हर भूखे को रोटी देना इतना भी मुश्किल नहीं, अगर बहुत सारे कॉरपोरेट्स मिल कर ये खर्च उठाएं। शुरूआत में स्थानीय रेस्टोरेंट्स और कैसीनोज ने साथ दिया, बाद में बड़े अमेरिकी बिजनेस घराने भी साथ आ गए। आज अमेरिका में कुल आबादी के लगभग 20 फीसदी यानी 4 करोड़ लोगों को हर रोज दोनों वक्त पका-पकाया खाना उनके घर के एक किमी के दायरे में नसीब हो जाता है। अमेजन के जेफ बेजोस ने फीडिंग अमेरिका को कोरोना संकट के मौके पर 700 करोड़ का निजी दान दिया है। आज अमेरिका में फीडिंग अमेरिका जैसे कई फूड बैंक हैं। तब भी अनुमान है कि इस अकेले चेन को कोरोना से पैदा हए नए हालात से निबटने के लिए तत्काल 12 हजार करोड़ की जरूरत है।  
  2.  फूड स्टैंप – अमेरिका में सरकार तकनीक का इस्तेमाल कर देश की आबादी के सबसे गरीब लोगों की पहचान करती है और उन्हें महीने भर की जरूरत के हिसाब से फूड कूपन देती है। इन फूड कूपन की मदद से लोग मोहल्ले के किराना दुकान से मुफ्त में अनाज हासिल करते हैं और बाद में सरकार किराना दुकानों को रिइम्बर्स करती है। अगर फूड स्टैम्पिंग की व्यवस्था हमारे यहां लागू हो गई, तो देश के गरीब , 5.5 लाख सरकारी राशन की दुकान न जाकर दो करोड़ से ज्यादा मोहल्ले के राशन दुकानों से महीने भर का राशन ले सकेंगे। इससे गरीबों के लिए अनाज की उपलब्धता करीब 40  गुना बढ़ जाएगी।
  3.  राशन दुकान से गरीबों को अनाज – केंद्रीय खाद्य मंत्री रामबिलास पासवान बहुत महत्वाकांक्षी योजना लेकर आए हैं- वन इंडिया, वन राशन कार्ड। अगर इसे लागू किया जाए तो बिहार, झारखंड और यूपी जैसे रिच इन पॉलिटक्स लो इन गवर्नेंस राज्यों से निकल कर महानगरों में दिहाड़ी मजदूरी करने वालों को काम मिलने की जगह पर ही राशन मिल पाएगा।
  4.  नेशनल वर्क्स रजिस्टर – सरकार चाहती है कि वो सबसे जरूरतमंदों की पहचान करे, जो आबादी भुखमरी की स्थिति में पहुंच गई है उनकी मदद करे, लेकिन सरकार के पास इसके अधूरे आंकड़े हैं। जिनकी पहचान किसान के तौर पर दर्ज है, उनमें से सबसे गरीब 12 करोड़ लोग शहरों में कुशल, अकुशल मजदूर हैं और उनमें से एक फीसदी भी मजदूर या कामगार के तौर पर उस शहर में रजिस्टर्ड नहीं हैं। सरकार को चाहिए कि आधार कार्ड की तरह ही एक वर्क्स कार्ड बनाए। देश के हर नागरिक के लिए इस कार्ड में अपना पेशा – मजदूर, किसान, डॉक्टर, इंजीनियर भरना अनिवार्य हो। जो लोग प्राइवेट नौकरी कर रहे हैं, उनके लिए नौकरी छूटने पर इसको अपडेट करने की व्यवस्था हो। सोचने वाली बात ये है कि केंद्रीय श्रम मंत्रालय  को ये ख्याल अब तक क्यों नहीं आया ?  
  5. माइग्रेंट वर्कर को वोटिंग का अधिकार – शहरों में काम करने आए गरीब मजदूर के फीचर फोन को वोटर आईकार्ड से कनेक्ट  कर सरकार सीमलेस वोटिंग सिस्टम इवॉल्व कर सकती है। कोरोना सर्विलांस के जरिए सरकार जिस जीपीएस और ब्लू टूथ तकनीक का इस्तेमाल हॉटस्पॉट और क्लस्टर की पहचान और निगरानी के लिए कर रही है, उसी तकनीक का इस्तेमाल मजदूरों की रूट ट्रेकिंग यानी जिस गांव से वो चला और जिस शहर में अभी मजदूर है, के लिए कर सकती है। बिहार के मजदूर को सूरत, दिल्ली और मुंबई में वोट देने का हक मिल जाए और वो ये वोट अपने फीचर फोन से मैसेज के जरिए दे पाए तो यकीन मानिए पार्टियों और सरकारों का उनके प्रति नजरिया दया भाव से फौरन श्रद्धा भाव में तब्दील हो जाएगा।

 नेताओं, पारिटियों और जनप्रतिनिधियों को ये याद रखना चाहिए कि आज का कोरोना कैरियर, कल का महावोटर होगा जिसके आगे हर पार्टी का नेता नतमस्तक होगा।

Share This :
FacebookTwitterWhatsAppTelegramShare

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *