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किसने गिराया मेवालाल का विकेट?

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किसने गिराया मेवालाल का विकेट?

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who is responsible for resignation of Mevalal?

डॉ. मेवालाल चौधरी (Mevalal Chaudhary) बिहार में नई सरकार बनते ही सुर्खियों में आ गये थे। विपक्ष ने पहले दिन से ही उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया और ट्विवर पर धड़ाधड़ पोस्ट आने लगे। दबाव इतना बढ़ा कि मेवालाल चौधरी ने गुरुवार को शिक्षा मंत्री का पदभार ग्रहण करने के दो घंटे बाद ही इस्तीफा दे दिया। उनके इस त्यागपत्र को जहां विपक्ष अपनी जीत बता रहा है, वहीं बीजेपी भी इसका क्रेडिट ले रही है। दूसरी तरफ जदयू के नेता भी इसे सुशासन बाबू की भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रतिबद्धता के तौर पर पेश कर रहे हैं। उधर डॉ. मेवालाल (Mevalal Chaudhary) का कहना है कि उन्होंने किसी दबाव ने नहीं, बल्कि अपने सीएम की छवि बचाने के लिए खुद इस्तीफा दे दिया। तो आखिर किसने गिराया मेवालाल का विकेट? आखिर किसका था ये फैसला?

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तेजस्वी यादव की वजह से हटाये गये मेवालाल?

आरजेडी ने शपथ ग्रहण समारोह के बाद से ही मेवावाल चौधरी (Mevalal Chaudhary) के जरिए नीतीश कुमार पर निशाना साधना शुरु कर दिया था और उनके हमले तेज होते जा रहे थे। तेजस्वी यादव ने एक ट्वीट में लिखा था, “सत्ता अपराधियों को बचा रही है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मेवालाल चौधरी को नियुक्त करके लूट और डकैती की छूट दी है. मुख्यमंत्री अपनी कुर्सी बचाने के लिए अपराध, भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता पर अपना प्रवचन जारी रखेंगे।”

डॉ. मेवालाल चौधरी के इस्तीफे के बाद इस पर आरजेडी नेता तेज प्रताप यादव (Tej Pratap Yadav) का एक रिएक्शन सामने आया है।

यानी आरजेडी मानती है कि उनके तेवर की वजह से नीतीश को मजबूरन अपने शिक्षा मंत्री की कुर्बानी देनी पड़ी। लेकिन क्या सच में ऐसा है? क्या नीतीश कुमार तेजस्वी यादव के डर से अपने चुने गये एक मंत्री को हटा देंगे? ऐसा मंत्री जिसकी सारी पोल-पट्टी उन्हें मालूम हो, जिसकी जांच खुद ठंडे बस्ते में डलवाई हो और जिसे पार्टी ने टिकट देकर विधायक बनाया हो? अगर नीतीश कुमार को राजनीतिक शुचिता की इतनी परवाह होती, तो मंत्रिमंडल में आधे से अधिक आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोग नहीं होते।

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नीतीश जैसे धुरंधर राजनीतिज्ञ के लिए विपक्ष के ऐसे आरोप कोई मायने नहीं रखते। वो लालू प्रसाद की पीढ़ी के नेता हैं और विचारधारा से लेकर सुशासन तक के मामलों में कई बार समझौते कर चुके हैं। विपक्ष के कुछ नेता तो उन्हें इसी काबिलियत की वजह से पल्टूराम तक कहते हैं। बिहार में लालू प्रसाद से लेकर नीतीश कुमार तक…..भ्रष्टाचार और केस-मुकदमे नेताओं के आभूषण माने जाते रहे हैं। इससे ना तो चुनाव में कोई फर्क पड़ता है और ना उनकी जीत में। फिर मंत्रालय देने में क्या हर्ज है? कोई ज्यादा सवाल करे, तो सीधा जवाब है – कानून को अपना काम करने दीजिए। जब तक दोष साबित नहीं हो जाता, जब तक सज़ा नहीं मिलती, तब तक उसे निर्दोष माना जाना चाहिए।

यानी नीतीश जैसे पुराने और घुटे हुए नेता, लालू प्रसाद के बेटे से नैतिकता की शिक्षा लेंगे….और उनकी बातों से दबाव में आ जाएंगे, ये संभव नहीं दिखता। तो मेवालाल के विकेट का क्रेडिट इन्हें भी नहीं दिया जा सकता।

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नीतीश ने लिया हटाने का फैसला?

नीतीश कुमार वही शख्स हैं जिन्होंने 2017 में भ्रष्टाचार का आरोप लगने पर डॉ. मेवालाल चौधरी से मिलने से भी इंकार कर दिया है। उनकी ही मर्जी से मेवालाल (Mevalal Chaudhary) को पार्टी से निलंबित किया गया था। और संभव है उन्हीं के आदेश की वजह से अब तक चार्जशीट दाखिल नहीं हुई हो। ऐसे में ये हजम करना मुश्किल है कि मुख्यमंत्री को अपने कैबिनेट के मंत्रियों के नाम तय करते वक्त ये सब याद ना रहा हो। जेडीयू से चुने गये सभी 5 मंत्री उनके करीबी और विश्वासपात्र हैं, योग्य भले ना हों। ऐसे में ये यकीन करना मुश्किल है कि तीन दिनों के बाद अचानक उनके ज्ञान चक्षु खुल गये और उन्होंने फौरन मेवालाल को हटाने का फैसला कर लिया!

इसलिए मान कर चलिये कि ये फैसला नीतीश कुमार का नहीं है, किसी और का है। कोई ऐसा…जिसके दबाव में उन्हें मजबूरन अपने कदम पीछे खींचने पड़े और मेवालाल से इस्तीफा लेना पड़ा।

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डॉ. मेवालाल (Mevalal Chaudhary) ने खुद दिया इस्तीफा?

डॉ. मेवालाल चौधरी (Mevalal Chaudhary) ने दावा किया है कि अपने मुख्यमंत्री की छवि खराब होते देख, उन्होंने खुद ही इस्तीफा देने का फैसला कर लिया। वैसे शपथ ग्रहण के बाद से ही उन्होंने न्यूज चैनलों के सवालों का जवाब देना शुरु कर दिया था और सभी में एक ही बात दुहराई थी – जब तक चार्जशीट दाखिल नहीं होती, कोर्ट सज़ा नहीं सुनाती, उन्हें दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए। अब अगर उन्हें नीतीश की इतनी ही परवाह थी तो तीन दिनों तक इंतज़ार करने की क्या जरुरत थी?

मीडिया के सूत्रों के मुताबिक डॉ. मेवालाल चौधरी (Mevalal Chaudhary) का इस्तीफा देने का कोई इरादा नहीं था। बुधवार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी कैबिनेट के इस सबसे अमीर मंत्री को तलब किया। शाम को शिक्षामंत्री का नया-नया बोर्ड लगाये एक सफेद टोयोटा एसयूवी एक अणे मार्ग में तेजी से घुसी। डॉ. मेवालाल की सीएम से करीब आधे घंटे बातचीत हुई। अंदर क्या बातचीत हुई ये तो नहीं पता, लेकिन आप अंदाजा लगा सकते हैं…क्योंकि अगले ही दिन मेवालाल (Mevalal Chaudhary) ने अपना इस्तीफा सौंप दिया। अब किसी नेता को अचानक नैतिकता का बोध हो, और वो मुख्यमंत्री की छवि बचाने के लिए अपना स्वार्थ भूल जाए, ये मुमकिन नहीं लगता। यानी क्रेडिट इन्हें भी नहीं मिलना चाहिए।

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बीजेपी ने डाला मुख्यमंत्री पर दबाव?

बिहार की राजनीति के जानकार लोगों के मुताबिक इसके पीछे बीजेपी आलाकमान का हाथ है। इसकी कई वजहें हैं। पहली तो ये कि जिसकी जितनी सीट भारी…उसकी उतनी हिस्सेदारी और उसकी उतनी ही जिम्मेदारी। इस चुनाव में बीजेपी के कई विधायकों को जनता के इस सवाल का सामना करना पड़ा था कि अगर आप सत्ता में थे, तो आपने हमारे हित में काम क्यों नहीं किया? यानी ऐसा नहीं हो सकता कि सत्ता की मलाई आप के हिस्से और जिम्मेदारी नीतीश कुमार के मत्थे।

दूसरी ये कि इस बार के नतीजों के बाद से बीजेपी ने जदयू के पीछे चलने की मानसिकता छोड़ दी है। अब बीजेपी की नजर 2025 के चुनाव पर है और वो अपने दम पर सरकार बनाने की तैयारी में है। ऐसे में नीतीश का कोई भी कदम जो उनकी छवि के खिलाफ जाए…या विपक्ष को मुद्दा बनाने का मौका दे…वो बर्दाश्त नहीं कर सकती।

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तीसरी और सबसे अहम वजह….आज बिहार की राजनीति में भला किसमें इतना दम है कि चौथी बार सीएम पद संभाल रहे नीतीश कुमार की बांह मरोड़े और उन्हें 72 घंटों के भीतर अपना फैसला बदलने पर मजबूर कर सके? नीतीश को खुद भी अपना फैसला बदलना होता, तो वो थोड़ा वक्त लेते और सही मौका देखकर… सलीके से मेवालाल (Mevalal Chaudhary) को बाहर का रास्ता दिखाते। लेकिन इस कदम से जाहिर है कि बीजेपी को अपना दम भी दिखाना है और सीएम को उनकी हद भी समझाना है।

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