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#Hathras: चार्जशीट के आगे क्या है?

क्राइम जरुर पढ़ें राज्य

#Hathras: चार्जशीट के आगे क्या है?

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#Hathras

यूपी देश में शायद अकेला राज्य है जहां अगर गाड़ी के ब्रेक फेल होने की स्थिति को अपवाद मानें तो, राज्य पुलिस के आते ही आरोपियों का कानून पर भरोसा जाग जाता है और पीड़ितों का खत्म हो जाता है। इस यूपी में, अगर एक ओर गरीब दलित घास काटने वाला हो और दूसरी ओर दस गांव का सवर्ण समाज, राज्य के सारे थाने और इनमें काम कर रहे समस्त खाकी जन, एस पी, डीएम, एडीजी तब क्या हो सकता है इस काल्पनिक सवाल का वास्तविक जवाब सुनिए।

बीते 14 सितंबर को यूपी के हाथरस (#Hathras ) में ठाकुर जाति के चार आरोपियों ने कथित तौर पर 19 साल की एक दलित लड़की का गैंगरेप किया, वो किसी को अपनी व्यथा न बता पाए इस मकसद से उसकी जीभ काट दी, फिर उसे इस बेरहमी से मारा कि उसकी गर्दन और रीढ़ की हड्डी टूट गई।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कहा गया है

 she suffered a fracture of the “C6 cervical vertebra” and there were “extravasations of blood along the fracture line” and the underlying spinal cord was “contused with ascending edema”.

 इसके बाद जैसा कि हमारे यहां होता है…पुलिस आई…और ठाकुर शासन में ठाकुरों के गांव आई  ठाकुर पुलिस को इस नतीजे पर पहुंचने में ज्यादा वक्त नहीं लगा कि दरअसल लड़की फंसी हुई थी, देर रात तक आशिक से फोन पर बात करती थी और जब उसके घर के लोगों को पता चला तो उसकी मां और भाई ने ही मिल कर उसे मार डाला और अब पुरानी रंजिश की वजह से मासूम ठाकुरों को फंसा रहे हैं।

30 दिसंबर को लड़की की मौत के बाद देर रात 2.30 बजे डीजल पेट्रोल डाल कर ‘परिवार की मंजूरी’ से दाह-संस्कार कर दिया गया। फिर डीएम साहब सामने आए उन्होंने मृतका के पिता को समझाया

ये प्रेस वाले आधे आज चले जाएंगे, आधे कल, आपको तो यही रहना है, सोच लीजिए …अगर बयान बदलना है तो ….

इसके बाद इन्साफ की खातिर पीड़िता के परिवार को नजरबंद कर दिया गया, उनके मोबाइल छीन लिए गए, मीडिया और विरोधी दलों के नेताओं के आने पर पाबंदी लगा दी गई। मामले की गहराई तक पहुंचने के लिए, एसआईटी ने हर रोज पीड़िता के परिजनों से पूछताछ का सिलसिला शुरू किया।

हाईकोर्ट के संज्ञान लेने, विपक्षी पार्टियों के प्रदर्शन और मीडिया कवरेज से राज्य सरकार को पता चला कि यूपी की तरक्की से जलने वाले जातिवाद के नाम पर यूपी में माहौल खराब करने की एक बड़ी अंतर्राष्ट्रीय साजिश रच रहे थे। लिहाजा इस मामले में 19 FIR  दर्ज किए गए। इसमें एक केस हाथरस के चंदपा का है, जहां कुछ लोगों ने लड़की के परिजनों को 50 लाख की रिश्वत का ऑफर दिया ‘ताकि राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति खराब की जाए’।

भारी दबाव में पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार तो कर लिया लेकिन जेल से आरोपियों ने जेलर के जरिए एसपी साहब को अपनी बेगुनाही खत लिखकर बताई और इसके पहले कि एसपी साहब इसे पढ़ पाते,  देश के टीवी न्यूज चैनलों ने इस खत के बारे में सारे देश को बता दिया।

http://sh028.global.temp.domains/~hastagkh/hathras-where-truth-is-stranger-than-fiction/

सच क्या है? ये बताने के लिए खुद राज्य के एडीजी प्रशांत कुमार ने प्रेस कान्फ्रेंस किया और फोरेंसिक साइंस जैसे जटिल विज्ञान के रहस्य बेहद आसान शब्दों में जनता के सामने खोले। उन्होंने बताया कि इस मामले में कोर्ट और कानून क्या कहता है ये काफी नहीं है, दरअसल… रेप का होना काफी नहीं है, असल बात है रेप का माना जाना और हम मानते ही नहीं कि रेप हुआ है।

इसे इत्तेफाक ही कहना चाहिए कि लड़की को लेकर यही राय आरोपियों के परिवार वालों और समस्त सवर्ण समाज की थी। अब शक-सुबहा की गुंजाइश ही कहां थी। आरोप से आहत सवर्ण समाज ने महापंचायत बुलाई। इलाहाबाद हाईकोर्ट की कड़ी फटकार के बावजूद मीडिया ने इस खबर को पूरी तरह एकपक्षीय तरीके से पेश किया। देश के इतिहास में पहली बार पीड़िता के परिजनों का नारको टेस्ट करवाने का आदेश दिया गया। हालांकि पीड़ित परिवार की सहमति नहीं होने से ये हो नहीं पाया।

कहानी दुखभरी है, गरीबों की है, लंबी है, शायद पूरी तरह समझ में न आए, लेकिन इस मामले में राज्य सरकार की भूमिका क्या रही है, इसे समझना है तो बस एक मिसाल से समझें

बहुत लोग आए और गए, लेकिन हाथरस के डीएम प्रवीण कुमार लश्कार अब भी बने हुए हैं।  उन्होंने पीड़िता के पिता को कहा था कि बेटी कोरोना से मर जाती तो कुछो नहीं मिलता, योगी जी हैं तो 25 लाख और एक घर मिल रहा है। वैसे कुछ लोगों का कहना है कि डीएम साहब नाराज हैं, उनके ही हाथों से मिलना था एक्स ग्रासिया …अब तक नहीं मिला। इन्हीं के बारे में पीड़िता के छोटे चचेरे भाई ने कहा- घर में सबको धमकी मिल रही है। ताऊ ने मुझे मीडिया से बात करने को कहा। उनको डीएम साहिब ने बहुत मारा। वो बेहोश हो गए। इसी डीएम ने शव को आधी रात में जलाने का आदेश दिया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी इस डीएम को कड़ी फटकार लगाई थी। सवाल है इस डीएम को पद पर बनाए रख कर सरकार क्या संदेश दे रही है? और अगर आपको लगता है कि  एडीजी प्रशांत कुमार ने शायद भूल से प्रेस कान्फ्रेंस कर रेप कानून की गलत व्याख्या की तो जान लीजिए कि  पीएमओ को भेजे अपने जवाब में हाथरस पुलिस अभी भी रेप से इनकार ही कर रही है।

सीबीआई की चार्जशीट से क्या बदलेगा?

69 दिन की जांच के बाद सीबीआई ने चार्जशीट दायर कर दी है। 22 सितंबर को एएमयू ट्रामा सेंटर में पीड़िता के बयान को जांच एजेंसी ने आधार बनाया है। अहमदाबाद में ब्रेन मैपिंग और पालिग्राफ टेस्ट से सीबीआई को नतीजे पर पहुंचने में मदद मिली होगी, लेकिन ये कानूनी सबूत नहीं माना जाता। आरोपियों के कपड़ों की डीएनए रिपोर्ट के बारे में कोई जानकारी अब तक सामने नहीं आई है। सीबीआई ने जिस तरह आरोपियों पर हत्या और गैंगरेप की धाराओं [धारा 302 (हत्या), एससी-एसटी एक्ट, धारा 376 (रेप), धारा 376 डी (गैंगरेप) और धारा 376 ए (रेप के कारण मौत)  के तहत चार्जशीट फाइल की है, उससे लगता है कि यूपी पुलिस के उलट सीबीआई मानती है कि पीड़िता की आनर किलिंग नहीं हुई, बल्कि जैसा कि लड़की के परिवार वालों का कहना था कि  उसका गैंगरेप हुआ और फिर कत्ल। दो हजार पन्नों की चार्जशीट में क्या है ये जानकारी अभी सामने नहीं आई है, लेकिन कुछ बातें जरूर गौर करने वाली हैं। ऐसा लगता है कि सीबीआई को कोई नया सबूत हाथ नहीं लगा है। अगर कोई जानकारी जांच में सामने आई होती तो जांच एजेंसी ने उसके बारे में जरूर बताया होता। मतलब ये कि केस का सारा दारोमदार मृतका के आखिरी बयान पर है। बचाव पक्ष अदालत में ये कह पाएगा कि मृतका का एक नहीं तीन वीडियो मौजूद है, उसमें से एक को ही सही क्यों माना जाए?

इस मामले में यूपी पुलिस के निष्कर्ष और सीबीआई के नतीजों में विरोधाभास है। जब ट्रायल शुरू होगा तब प्राइमरी इन्वेस्टिगेटिग एजेंसी होने की वजह से कई स्टेज में पुलिस की रिपोर्ट या उनके बयान की जरूरत होगी। अगर पुलिस की रिपोर्ट सीबीआई से मेल नहीं खाएगी तो आरोपियों को इसका फायदा होना लाजिमी है।

इस मामले में लोकल थाना से लेकर डाक्टर तक कई जगह लापरवाही दर्ज की गई, लेकिन इनमें से किसी को सीबीआई ने आरोपी नहीं बनाया। जैसे-

  1. अलीगढ़ अस्पताल ने पाया कि पीड़िता के कपड़े फटे हुए थे और उसके अंडरगारमेंट पर खून था, लेकिन उन्होंने लड़की का vaginal swab नहीं लिया, न ही उसके कपड़ों को सबूत के तौर पर बचा कर रखा।
  2. पुलिस विभाग शुरू से आखिर तक रेप नहीं होने के प्रमाण इकट्ठे करता रहा, जबकि उसका काम रेप की आशंका पर गौर करना, तफ्तीश करना और इस वास्ते सबूत जुटाना था।
  3. परिवार वालों की मरजी के खिलाफ जिस तरह आधी रात में शव को जलाया गया उससे लगता है कि पुलिस की दिलचस्पी क्राइम की जांच करने से ज्यादा उसे दबाने में थी।

इन्हीं मुद्दों को आधार बनाकर चेतन जनार्दन कांबले ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की और सबूत मिटाने के इल्जाम में यूपी के पुलिस अफसरों और डाक्टरों पर मुकदमा दर्ज करने की अपील की। 15 अक्टूबर से जस्टिस बोबडे की अदालत में इस पर फैसला लंबित है।

चंदपा में पचास लाख की कथित रिश्वत मामले में सीबीआई पीड़िता के बड़े भाई को फोरेंसिक साइकोलॉजिकल टेस्ट के लिए गुजरात लेकर जाएगी।  अगर साइकोलॉजिकल असेसमेंट भाई के खिलाफ जाती है तो राज्य सरकार की ओर से  चंदपा मामले में दर्ज एफआईआर को मजबूती मिलेगी लेकिन हाथरस गैंग रेप केस कमजोर होगा, क्योंकि इसकी एफआईआर पीड़िता के इसी भाई ने दर्ज कराई थी। तब बचाव पक्ष ये कह सकेगा कि जब इस केस को दर्ज कराने वाला शख्स ही संदिग्ध मानसिक स्थिति का है तब उसके दर्ज कराए केस की क्या अहमियत है?

कई लोगों को लगता है कि सीबीआई की चार्जशीट से मामले में दूध का दूध और पानी का पानी हो गया है। लेकिन जो लोग ये मानते हैं, वो शायद यूपी प्रशासन की ताकत को कम कर आंक रहे हैं।

http://sh028.global.temp.domains/~hastagkh/hathras-why-hathras-will-prove-waterloo-for-the-bjp/
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