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एक ऐतिहासिक भूल!

देश बड़ी खबर संपादकीय

एक ऐतिहासिक भूल!

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Ram janma bhumi pujan in Ayodhya

राम मंदिर के भूमि पूजन के लिए अयोध्या सज-संवर कर तैयार है। लेकिन इस दिन के पीछे कई दशकों का संघर्ष, विवाद और हिंसा का दौर शामिल रहा है। कई बार ऐसा लगता है कि अगर जन्म भूमि का विवाद सुलझ सकता था, तो पहले क्यों नहीं इसका समाधान हुआ? क्यों देश ने इतने दंगे झेले, क्यों सैकड़ों लोगों की जान गई ? क्या इसके समाधान में हुई चूक भी ऐतिहासिक थी? लगता तो ऐसा ही है।

कहां से शुरु हुआ विवाद?

राम जन्म भूमि परिसर, अयोध्या के उत्तर पश्चिम छोर पर रामकोट मोहल्ले में एक ऊँचे टीले पर स्थित है। यहाँ से कुछ ही दूर पर सरयू नदी बहती है। ऐतिहासिक विवरणों के मुताबिक मुग़ल बादशाह बाबर ने पंद्रह सौ ईस्वी में सरयू पार डेरा डाला था। मस्जिद पर लगे शिलालेख और सरकारी दस्तावेज़ों के मुताबिक़ बाबर के आदेश पर उसके गवर्नर मीर बाक़ी ने यह मस्जिद बनवायी थी। लेकिन इसका रिकार्ड नहीं है कि बाबर अथवा मीर बाक़ी ने यह ज़मीन कैसे हासिल की और मस्जिद से पहले वहाँ क्या था ?

मस्जिद के रखरखाव के लिए मुग़ल काल, नवाबी और फिर ब्रिटिश शासन में वक़्फ़ के ज़रिए एक निश्चित रक़म मिलती थी। इसके इतिहास के बारे में क्रमवार जानकारी ब्रिटिश काल में ही मिलती है। कई गजेटियर्स, विदेशी यात्रियों के संस्मरणों और पुस्तकों में उल्लेख है कि हिंदू समुदाय पहले से इस मस्जिद की जगह को राम जन्मस्थान  मानते हुए पूजा और परिक्रमा करता था। मुसलमान इसका विरोध करते थे, जिससे झगड़े फ़साद होते रहते थे। 

कैसे शुरु हुई कानूनी लड़ाई?

1857 में हुए पहले स्वतंत्रता संग्राम के बाद नवाबी शासन समाप्त हो गया और ब्रिटिश न्याय व्यवस्था लागू हुई। इसके साथ ही राम जन्म भूमि परिसर पर अधिकार के लिए कानूनी लड़ाई शुरु हो गई।

  • नवंबर 1858 को बाबरी मस्जिद के एक मुतवल्ली यानि प्रबंधक मौलवी मोहम्मद असग़र  ने लिखित शिकायत दर्ज कराई कि हिंदू बैरागियों ने मस्जिद से सटाकर एक चबूतरा बना लिया है और मस्जिद की दीवारों पर राम- राम लिख दिया है। ब्रिटिश हुकूमत ने शांति व्यवस्था क़ायम करने के लिए  चबूतरे और मस्जिद के बीच दीवार बना दी, लेकिन मुख्य द्वार एक ही रहने दिया।
  • जनवरी 1885 में निर्मोही अखाड़े के महंत रघुबर दास ने चबूतरे को राम जन्मस्थान बताते हुए भारत सरकार और मोहम्मद असग़र के ख़िलाफ़ सिविल कोर्ट में पहला मुक़दमा दायर किया। इसमें चबूतरे को जन्मस्थान बताते हुए यहां मंदिर बनाने की अनुमति माँगी गयी। उन्होंने दावा किया कि वह इस ज़मीन के मालिक हैं और उनका मौक़े पर क़ब्ज़ा है।
  • जज ने यह  कहते हुए चबूतरे पर मंदिर बनाने की अनुमति देने से इंकार कर दिया कि ऐसा करना भविष्य में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच दंगों की बुनियाद डालना होगा। इस तरह निर्मोही अखाड़ा…. मस्जिद के बाहरी कैंपस में मंदिर बनाने का पहला मुक़दमा हार गया।
  • इस फैसले के खिलाफ डिस्ट्रिक्ट जज चैमियर की कोर्ट में अपील दाख़िल हुई। मौक़ा-मुआयना के बाद उन्होंने तीन महीने के अंदर फ़ैसला सुनाते हुए कहा, “ हिन्दुओं द्वारा पवित्र मानी जानी वाली जगह पर मस्जिद बनाना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन चूँकि यह घटना 356 साल पहले की है इसलिए अब इस शिकायत का समाधान करने के लिए बहुत देर हो गयी है।”
  • निर्मोही अखाड़ा ने इसके बाद अवध के जुडिशियल कमिश्नर डब्लू. यंग की अदालत में अपील की। जुडिशियल कमिश्नर यंग ने 1 नवम्बर 1886 को अपने जजमेंट में लिखा कि अत्याचारी बाबर ने साढ़े तीन सौ साल पहले जानबूझकर ऐसे पवित्र स्थान पर मस्जिद बनायी, जिसे हिंदू रामचंद्र का जन्म स्थान मानते हैं। लेकिन फैसले में ये भी कह दिया गया कि रिकार्ड में ऐसा कुछ नहीं है जिससे ज़मीन पर  हिंदू पक्ष का किसी तरह का स्वामित्व दिखे। 

क्या थी ऐतिहासिक चूक?

इन तीनों अदालतों ने अपने फ़ैसले में विवादित स्थल के बारे में हिन्दुओं की आस्था, मान्यता और जनश्रुति का उल्लेख किया। लेकिन फ़ैसला देते वक्त रिकार्ड में उपलब्ध सबूतों को आधार माना। तीनों जजों ने मामले को सुलझाने के बजाए फिलहाल शांति व्यवस्था बनाए रखने पर ज़्यादा जोर दिया। और इस वजह से मंदिर बनाने की अनुमति नहीं दी।

अगर उसी समय चबूतरे पर राम मंदिर बनाने की अनुमति दे दी गई होती, तो हो सकता है तात्कालिक अशांति और दंगे-फसाद होते, लेकिन इससे आनेवाले सैकड़ों दंगों और विवादों से मुक्ति मिल गई होती। उस वक्त अगर ब्रिटिश अधिकारियों ने थोड़ी दूरदर्शिता दिखाई होती, तो शायद आज़ादी के बाद नए सिरे से विवाद नहीं पैदा होता… न लोगों को राजनीति करने का मौक़ा मिलता, न दंगा-फ़साद होता और ना ही सांप्रदायिक वैमनस्य फैलता।

शांति, अशांति और राजनीति

आनेवाले वक्त में भी तमाम अदालतों ने तात्कालिक शांति और यथास्थिति बनाये बनाये रखने पर ही जोर दिया… समाधान पर नहीं। लेकिन इतिहास गवाह है, ना तो ये मुद्दा कभी थमा, ना ही कभी शांति हुई…। अदालत में कानूनी लड़ाई चलती रही और बाहर इस मुद्दे को लेकर राजनीति और हिंसा होती रही।

दरअसल इस मुद्दे का हल अदालत के पास था ही नहीं, क्योंकि उन्हें फैसले के लिए कागज़ात चाहिए थे, सबूत चाहिए थे….जो थे ही नहीं। अगर मंदिर को तोड़कर उसकी बुनियाद पर ही मस्जिद खड़ी की गई हो, तो मंदिर की मौजूदगी की पता लगाने के लिए मस्जिद की खुदाई करना पड़ती। इसके बावजूद पक्के सबूतों का मिलना मुश्किल था। ऐसे में आस्था और इतिहास की इस लड़ाई का समाधान आपसी भाई-चारे से ही संभव था, लेकिन राजनीति के खिलाड़ियों ने ऐसा होने ही नहीं दिया।

भविष्य में क्या होगा ?

हिन्दु समुदाय इस बात को कभी नहीं भूला कि राम जन्मभूमि पर मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई…और मुस्लिम समुदाय भी शायद ये कभी नहीं भूलेगा कि मस्जिद गिराकर मंदिर बनाया जा रहा है। दो समुदायों के बीच सदियों से चले आ रहे भाई-चारे के बीच ये फांस हमेशा रहेगी, जो कड़वाहट बनाये रखेगी।

उम्मीद कीजिए कि समय के साथ दूसरा पक्ष भी इसे ऐतिहासिक भूल मानते हुए माफ कर दे और बदला लेने के बजाए आगे बढ़ने पर यकीन करे। लेकिन, अपने आसपास और दुनिया भर में बढ़ती धार्मिक कट्टरता को देखते हुए फिलहाल ये बहुत ही आशावादी सोच लगती है।

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