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कैसे होती है कोरोना मरीजों की कांटैक्ट ट्रेसिंग ?

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कैसे होती है कोरोना मरीजों की कांटैक्ट ट्रेसिंग ?

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ये एक तरह की छानबीन है…जासूसी का काम है जो लोगों की जान बचाने के मकसद से किया जाता है। ये प्रक्रिया कोरोना मरीज का पता लगते ही शुरू कर दी जाती है। इसका एक नाम है – Ex 6-10-14

संपर्क में आए उन लोगों की पहचान जरूरी है जो बीते 14 दिन में कम से कम एक बार इस मरीज के 6 फीट करीब लगभग 10 मिनट तक आए थे। अगर मरीज अस्पताल से जुड़ा व्यक्ति जैसे डॉक्टर, नर्स या पारामेडिक है तो एक्सपोजर टाइम को 10 मिनट से भी कम यानी 5 मिनट कर दिया जाता है।

Ex यानी एक्सपोजर टू कोरोना पेशेंट। अब संपर्क में आए उन लोगों की पहचान जरूरी है जो बीते 14 दिन में कम से कम एक बार इस मरीज के 6 फीट करीब लगभग 10 मिनट तक आए थे। अगर मरीज अस्पताल से जुड़ा व्यक्ति जैसे डॉक्टर, नर्स या पारामेडिक है तो एक्सपोजर टाइम को 10 मिनट से भी कम यानी 5 मिनट कर दिया जाता है।

मरीज से सवाल

  1. क्या आप बीते 14 दिन में विदेश गए थे? 25 मार्च को लॉकडाउन शुरू होने के बाद आए नए मरीजों के लिए ये सवाल नहीं है।
  2. क्या आपके परिवार में, घर में या पड़ोस में किसी को कोरोना हुआ है?

अगर इन दोनों सवाल का जवाब नहीं है तब ये माना जाता है कि किसी सार्वजनिक जगह पर इस व्यक्ति को संक्रमण हुआ है।

संपर्क में आए लोगों के साथ क्या होता है ?

 अब शुरू होती है उन लोगों की पहचान जो हाल के दो हफ्ते में किसी वजह से इस मरीज के संपर्क में आए थे। सबसे पहले और सबसे ज्यादा उन लोगों को खतरा होता है जो मरीज के साथ उसके घर में रहते हैं। लिहाजा घर में रहने वाले तमाम लोगों की लिस्ट तैयार की जाती है और जांच के जरिए ये पता  लगाया जाता है कि इनमें से किसी और को संक्रमण हुआ है या नहीं ? इसके बाद मुलाकातियों की लिस्ट तैयार की जाती है, जिससे ये मरीज बीते दो हफ्ते में मिला है। इसमें दफ्तर में काम करने वाले सभी लोग, पड़ोसी, मेहमान, पेपरवाला, दूधवाला, सब्जीवाला, मोहल्ले का किराना दुकानदार, काम करने वाली बाई से लेकर एक-एक व्यक्ति का पता लगाया जाता है। सबसे पहले उन्हें ये बताया जाता है कि आप एक कोरोना मरीज के संपर्क में आए थे। फिर उनकी जांच की जाती है और अगर उनमें कोरोना के लक्षण अभी नहीं हैं तो उन्हें 14 दिन के सेल्फ आइसोलेशन में रहने की सलाह दी जाती है। इसके साथ ही उन्हें कोरोना की पहचान कैसे करें, किस स्थिति में फौरन अस्पताल से संपर्क करें, क्वारंटीन में रहते वक्त किस तरह की सावधानियां बरतें इन सब चीजों की ट्रेनिंग दी जाती है।

क्या कोविड 19 से पहले भी होती थी कांटैक्ट ट्रेसिंग ?

एक वक्त टीबी सबसे  संक्रामक बीमारी थी। तब परिवार, पड़ोसी, जान पहचान वाले और दफ्तर के साथियों को बचाने के लिए कांटैक्ट ट्रेसिंग की शुरूआत हुई। इसी तरह कुछ STD यानी sexually transmitted disease के मामलों में भी इसका सहारा लिया गया। 2003 में SARS और 2014 में Ebola के लिए कांटैक्ट ट्रेसिंग को बड़े पैमाने पर लागू किया गया। इबोला के संक्रमण का पता लगाने के लिए लाइबेरिया में हुई कांटैक्ट ट्रेसिंग को तब दुनिया की सबसे बड़ी कांटैक्ट ट्रेसिंग का नाम दिया गया था। हालांकि लोगों में हेल्थ वर्कर्स को लेकर भरोसे की कमी की वजह से ये ज्यादा कामयाब नहीं रहा।

कोरोना के मामले में जिन तीन देशों ने सबसे तेज, सबसे कामयाब और सबसे आधुनिक टेक बेस्ड कांटैक्ट ट्रेसिंग की वो हैं साउथ कोरिया, न्यूजीलैंड और ताइवान। नतीजा ये कि इन देशों ने जल्द कोरोना पर काबू पा लिया। ताइवान में तो बीते करीब 50 दिन से कोरोना का एक भी मामला सामने नहीं आया है।

कांटैक्ट ट्रेसिंग कब काम नहीं करता ?

कांटैक्ट ट्रेसिंग तभी कारगर है अगर कोरोना स्टेज 1 या स्टेज 2 में है। जब तक एक इलाके में कम लोग संक्रमित रहते हैं, तब ये कारगर होता है, लेकिन जैसे ही एक इलाके में संक्रमण  फैल जाता है उसके बाद मरीजों की तादाद इतनी तेजी से बढ़ जाती है कि सभी मामलों में कांटैक्ट ट्रेसिंग कर पाना मुमकिन नहीं रह जाता। जैसे अगर मरीज बस, ट्रेन या प्लेन से सफर कर चुका हो तो उसके साथ बैठे तमाम मुसाफिरों का पता लगाना और उन्हें आइसोलेट कर पाना मुश्किल हो जाता है। कई बार लोगों की डिटेल जैसे फोन नंबर या एड्रेस अपडेटेड नहीं होता, ऐसे में ट्रेसिंग और भी मुश्किल हो जाती है। कभी-कभी मरीज इतना ज्यादा बीमार होता है कि वो सब कुछ याद नहीं रख पाता। एक बार लॉकडाउन लागू हो गया तो कांटैक्ट ट्रेसिंग से ज्यादा मदद नहीं मिलती..क्योंकि ज्यादातर लोग तो पहले ही आइसोलेटेड हैं। अब  होता ये है कि नए मरीज एक के बाद एक अस्पतालों में आने लगते हैं। इनकी तादाद तेजी से बढ़ती चली जाती है और कांटैक्ट ट्रेसिंग करना मुमकिन नहीं रह जाता। अब आगे सिर्फ उपाय यही रह जाता है कि ज्यादा से ज्यादा टेस्टिंग कर नए मरीजों का पता लगाया जाए और उनको आइसोलेट या क्वारंटीन किया जाए।

कौन देश किस तरह कर रहा है कांटैक्ट ट्रेसिंग?

साउथ कोरिया को पांच साल पहले 2015 में MERS का सामना करना पड़ा था। तभी वहां कांटैक्ट ट्रेसिंग का प्रोटोकॉल तैयार हुआ। इस बार जब वहां कोरोना का कहर टूटा तो सरकार इसके लिए तैयार थी। वहां नागरिकों के मोबाइल से जीपीएस और ब्लू टूथ डाटा, क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड डिटेल और सीसीटीवी कैमरों के फुटेज का सहारा लिया गया। इसके अलावा साउथ कोरिया ने AI यानी आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के जरिए हॉटस्पॉट और क्लस्टर की मैपिंग और मॉनिटरिंग की। आबादी के औसत के लिहाज से साउथ कोरिया में दुनिया में सबसे ज्यादा स्मार्टफोन यूजर्स हैं, लिहाजा मोबाइल सर्विलांस यहां बेहद कारगर रहा। इसकी देखादेखी दुनिया के कई देशों ने मोबाइल एप लांच किए।

कांटैक्ट ट्रेसिंग को लेकर चीन में सबसे ज्यादा वर्क फोर्स लगाया गया। अकेले वुहान में 9 हजार कांटैक्ट ट्रेसर्स को काम पर लगाया गया। कनाडा में सरकार ने देशव्यापी कांटैक्ट ट्रेसिंग प्रोगाम चलाया है जिसमें  27 हजार वालंटियर्स की मदद ली जा रही है।

एक  अनुमान के मुताबिक अमेरिका को कम से कम एक लाख कांटेक्ट ट्रेसर्स की जरूरत है। सैन फ्रांसिस्को में कोरोना कांटैक्ट ट्रेसिंग की ट्रेनिंग के लिए 250 लोगों के साथ एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया है। मेसाचुसेट्स में सरकार  एक हजार कांटैक्ट ट्रेसर्स तैयार कर रही है। कांटैक्ट ट्रेसिंग की अहमियत को कम आंकने और इसमें देरी करने की कीमत अमेरिका 50 हजार से ज्यादा जान गंवा कर चुका रहा है।

कांटैक्ट ट्रेसिंग के लिए दुनिया की दो सबसे बड़ी टेक कंपनियां एप्पल और अल्फाबेट ने हाथ मिलाया है। मकसद है स्मार्टफोन को कांटैक्ट ट्रेसिंग की ऐसी डिवाइस बनाना जिससे कांटैक्ट ट्रेसर्स की जरूरत ही न रहे।

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