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आधी आबादी, फिर भी विधानसभा में आधी से भी कम

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आधी आबादी, फिर भी विधानसभा में आधी से भी कम

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आधी आबादी यानि महिला वोटर्स जो किसी भी पार्टी के लिए उसकी जीत का रास्ता तय करती है। राजनीति में साइलेंट वोटर और जीत -हार का निर्णायक फैसला देने में सक्षम महिलाओं को फिर भी विधान सभा में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलता। या यूं कहें कि राजनीतिक दल उन्हें उम्मीदवारों की सूची में भी यथोचित हिस्सेदारी नहीं देते।

एनडीए की बहुप्रचारित बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ की चर्चा खूब हुई । महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए नीतीश सरकार ने पंचायतों और नगरपालिकाओं में 50 प्रतिशत आरक्षण भी प्रदान किया गया। महागठबंधन ने भी महिलाओं के विकास की बातें अपने रैलियों में खूब की। इन सबके बावजूद बिहार की राजनीति में किसी भी पार्टी के द्वारा उन्हें बराबरी की हिस्सेदारी नहीं दी गई।आइए एक नजर डालते हैं 2020 विधानसभा चुनाव में महिला प्रत्याशियों की संख्या पर..

2020 विधानसभा चुनाव में महिला प्रत्याशी

पार्टी कुल सीटें महिला प्रत्याशी  विजयी हुई
बीजेपी108 13  06
जेडीयू115 22 08
एलजेपी134 2300
आरजेडी1441607
वाम दल290100
कॉंग्रेस700702  

 2015 के विधानसभा चुनाव में महिला प्रत्याशी

पार्टी कुल सीटें महिला प्रत्याशी  विजयी हुई
बीजेपी15714  04
जेडीयू1011009
एलजेपी420400
आरजेडी1011010
वाम दल2391200
कॉंग्रेस380404  

ये आंकड़े परेशान करने वाले हैं। जबकि राज्य में लगभग 3.5 करोड़ की आबादी वाली महिला वोटरों का वोटिंग प्रतिशत हमेशा पुरुषों की तुलना में अधिक रहा है।  2010 में महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत 54.49 था, वहीं पुरुषों का 51.12 रहा। इसी तरह 2015 में 60 फीसदी से ज्यादा महिलाओं ने वोटिंग में भाग लिया जबकि पुरुषों का मतदान प्रतिशत सिर्फ 53 रहा।

वहीं महिला प्रत्याशियों को मिले वोट का आकड़ें भी सकारात्मक नहीं है। इस बार चुनाव लड़ रही 350 से अधिक महिला प्रत्याशी कई जगह हजार का आंकड़ा भी नहीं छू सकी। कई विधानसभा में 500 के अंदर ही ये प्रत्याशी सिमट गई। खुद को सीएम का दावेदार बताया रही ‘द प्लूरल्स पार्टी’ की पुष्पम प्रिया को मात्र 1877 वोट मिले।  मुजफ्फरपुर विधानसभा से धनवंती देवी को महज 202 वोट मिले। द प्लूरल्स की पल्लवी सिन्हा को 3513 वोट मिले। मीनापुर में भारती देवी को 432, ललिता कुमारी को 2204 वोट मिले। साहेबगंज में डा. मीरा कौमुदी को 1599, वीणा कुमारी को 818 वोट मिले। पारू में मानालिसा को 433 वोट ही मिले।

अब सवाल उठता है कि आखिर जनता और पार्टियां दोनों ही महिला नेतृत्व को बहुधा क्यों नकार देती हैं। अक्सर देखा गया है कि पार्टियां प्राय: ऐसी महिला प्रत्याशी को चुनती हैं, जिसकी जीत की प्रबल संभावनाएं हों, या फिर किसी राजनीतिक घराने से ताल्लुक रखती हों, या फिर किसी बाहुबली की पत्नी हों।  उदाहरण के तौर पर बीजेपी ने जमुई से पूर्व केंद्रीय मंत्री दिग्विजय सिंह की पुत्री व मशहूर निशानेबाज श्रेयसी सिंह, बेतिया से रेणु देवी व नरकटियागंज से रश्मि वर्मा को टिकट दिया है, वहीं आरजेडी  ने सीतामढ़ी के परिहार से सिंहवाहिनी पंचायत की चर्चित मुखिया रीतू जायसवाल, सहरसा से पूर्व सांसद लवली आनंद, जबकि जेडीयू ने गया के अतरी से मनोरमा देवी, खगड़िया से पूनम यादव व कांग्रेस ने मधेपुरा जिले के बिहारीगंज से दिग्गज नेता शरद यादव की पुत्री सुभाषिणी यादव को चुनाव मैदान में उतारा है। जाहिर है इन सबों की जीत की संभावना प्रबल है। जबकि आम महिलाओं को टिकट न देने के पीछे जो सबसे महत्वपूर्ण कारक सामने आते हैं, जिनमें भारतीय राजनीति का पुरुषवादी होना, संसद व विधानसभा में महिलाओं के लिए सीटें निश्चित न होना, फैमिली सपोर्ट का अभाव और पार्टियों का महिलाओं की काबिलियत को कम आंकना प्रमुख है।

जबकि जनता का इन्हें नकारने के पीछे का कारण पार्टियों द्वारा इनके चयन और कम लोकप्रियता है। फिर भी रिपोर्ट बताते हैं कि कई महिला विधायकों को मौका मिला है तो उन्होंने अपने क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन किया है।

मंजुल मंजरी, पटना ।

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