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आज जेपी होते, तो बिहार में नहीं तिहाड़ में होते

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आज जेपी होते, तो बिहार में नहीं तिहाड़ में होते

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‘झंझा सोई, तूफान रुका

 प्लावन जा रहा कगारों में

 जीवित है सबका तेज

किंतु अब भी तेरे हुंकारों में

 है जयप्रकाश वह जो न कभी सीमित रह सकता घेरे में,

 अपनी मशाल जो जला बांटता फिरता ज्योति अंधेरे में..

5 जून को जब दुनिया पर्यावरण बचाने के बारे में सोचती है, जेपी ने व्यवस्था परिवर्तन के जरिए भारत बचाने की पहल की थी।

5 जून 1974 को छात्रों का एक जुलूस पटना के बेलीरोड से चल कर गांधी मैदान आया…यहां पहुंचने के बाद ये जुलूस सभा में तब्दील हो गया। लाखों की तादाद में छात्र , एक मामूली धक्का-मुक्की पर लाठी चार्ज चार्ज के लिए बेताब बिहार पुलिस और 72 साल का एक शांत युवा..चिमनभाई पटेल के गुजरात की तरह बिहार ने अब्दुल गफूर का बेरहम शासन देखा था…लाखों  की भीड़ का ऐसा अनुशासन नहीं देखा था।  

जेपी ने ऐलान किया –

“भ्रष्टाचार मिटाना, बेरोजगारी दूर करना, शिक्षा में क्रांति लाना,  ऐसी चीजें हैं जो आज की व्यवस्था से पूरी नहीं हो सकतीं; क्योंकि ये  इसी व्यवस्था की उपज हैं। ये तभी पूरी होंगी, जब सम्पूर्ण व्यवस्था बदल दी जाए…  सम्पूर्ण व्यवस्था के परिवर्तन के लिए  ’सम्पूर्ण क्रान्ति’ जरूरी है

संपूर्ण क्रांति मतलब एक नहीं सात क्रान्तियां…

सात क्रांतियाँ  है— राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक और आध्यात्मिक क्रांति

जेपी का लोकतंत्र आयातित नहीं था..इसमें अपनी माटी की खुशबू थी, उनके लोकतंत्र में लिच्छवी की छवि थी

संपूर्ण क्रांति का मतलब था समाज के सबसे कमजोर शख्स का सबसे ज्यादा मजबूत होना…सत्ता के शिखर पर होना

उन्होंने आह्वान किया

जात-पात तोड़ दो

 तिलक-दहेज छोड़ दो

कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी से सोशियोलॉजी मे ग्रेजुएशन करने वाले जेपी ने 1929 में पटना में  ‘मौलाना अबुल कलाम आजाद’ की तकरीर सुनी, जिसमें उन्होंने कहा था – ‘नौजवानों अंग्रेजी शिक्षा का त्याग करो और मैदान में आकर ब्रिटिश हुकूमत की ढहती दीवारों को धराशाही करो और ऐसे हिन्दुस्तान का निर्माण करो जो सारे आलम में खुशबू पैदा करें।’

जेपी ने अपनी जिंदगी देश के नाम लिख दी। आजादी की जंग में उनका नाम पहली पंक्ति के नेताओं में शुमार होता है। लेकिन देश आजाद हुआ तो बगैर किसी शोर-शराबे के जेपी नेपथ्य में चले गए। सर्वोदय और भूदान नाकाम रहा था, इससे जेपी आहत थे। लेकिन 18 मार्च को जब पटना में छात्र युवा संघर्ष वाहिनी ने राज्यपाल को सदन में भाषण के लिए जाने देने से रोकने की कोशिश की और पुलिस ने उन पर लाठी चार्ज किया तब जेपी का सब्र टूट गया। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी उनके लिए दोस्त की बेटी थीं… इंदू थी…

वह सुनो, भविष्य पुकार रहा,
“वह दलित देश का त्राता है,
स्वप्नों का दृष्टा “जयप्रकाश”
भारत का भाग्य-विधाता है।”

जेपी ने सांसदों को एक खत लिखा। इस खत में उन्होंने देश में भ्रष्टाचार मिटाने के लिए लोकपाल और लोकायुक्त का गठन करने की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए बनी कमेटी की आवाज दबा रही हैं। इंदिरा गांधी के खिलाफ देश में पहली बार किसी ने सीधे आवाज उठाई थी। और ये वो आवाज थी जिसे सरकार अनसुना कर सकती थी जनता नहीं।

लौटे तुम रूपक बन स्वदेश की
आग भरी कुरबानी का,
अब “जयप्रकाश” है नाम देश की
आतुर, हठी जवानी का।

जेपी के सामने कांग्रेस और इमरजेंसी ताश के पत्तों की तरह ढह गए। उनमें कुरसी की चाहत नहीं थी, न वो मसीहा के तौर पर मशहूर होना चाहते थे। उन्होंने बस अपना फर्ज पूरा किया था। जनता पार्टी की सरकार आई और जेपी एक बार फिर नेपथ्य में चले गए।

आज अगर जेपी जिंदा होते तो…

आज जेपी होते तो बेहद आहत होते…अमित मालवीय की टीम उन पर मीम्स बनाती,  बूढ़े होने को लेकर…अमेरिका रिटर्न को लेकर…सूट से खादी की ओर लौटने को लेकर… उनकी याद्दाश्त पर मीम्स बनते। वो शायद UAPA में कैद होते। एनआईए उनकी गतिविधियों की जांच कर रही होती, सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में उनका बेल मैटर अरनब गोस्वामी के बाद आता।

1974 का बिहार जेपी के लिए तैयार था, 2020 का हिन्दुस्तान नहीं है।

बिहार में जेपी न सत्ता पक्ष को रास आते न विपक्ष को। बस भाड़े के लिए चिरौरी करते बेकस मजदूरों पर लाठिया बरसाने वाली राज्य सरकार शायद रोज दुआ करती…बुड्ढा जल्द मर जाए तो… इसकी तस्वीर पर माला चढ़ा के छुट्टी मनाएं… इसको कोर्स में डाल कर ..इसका सोर्स ही खत्म कर दो ।

सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी और सामाजिक न्याय के नाम पर जातिवाद की राजनीति करने वाली आरजेडी के लिए जात-पांत के कट्टर विरोधी जेपी अछूत होते।

जेपी को छात्रों से बहुत उम्मीद थी, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने दुनिया की सबसे बड़ी ताकत को इस ताकत के सामने बार-बार लाचार होते देखा था। जेएनयू से जामिया तक छात्रों पर लाठियां बरसाने वाली राजनीति के पीछे सत्ता का यही डर है। आज जेपी होते तो वो शायद एक बार फिर छात्रों का नेतृत्व कर रहे होते।

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