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आज़ादी मुबारक, मगर याद रखें…

जरुर पढ़ें संपादकीय सोशल अड्डा

आज़ादी मुबारक, मगर याद रखें…

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Indepence and its challanges

आज़ादी की सालगिरह हम सबको मुबारक हो, लेकिन यह याद रखें कि हम एक ऐसे दौर में यह सालगिरह मना रहे हैं… जब हमारे आज़ाद लोकतंत्र के तमाम पहरुए… आम नागरिक की आज़ादी, उसके बुनियादी अधिकारों की रक्षा करने के बजाय, उन पर अंकुश लगाने और उनकी निरंतर अवमानना करने में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सक्रिय हैं।

जिन्हें लोकतंत्र का स्तंभ कहा गया, वे सभी संस्थाएँ आज दरअसल अपनी-अपनी सत्ता के अहंकार, उसके नशे में चूर हैं। विशेषकर न्यायपालिका और मीडिया का वर्तमान आचरण निराशा ही नहीं, जुगुप्सा जगाता है। गांधी के दरिद्रनारायण की सेवा का लक्ष्य कहीं पीछे छूट गया है। आज़ादी की लड़ाई के नायकों ने आज़ाद देश में बनने वाले समाज और उसकी व्यवस्थाओं के लिए जो सपने देखे थे, वे अधूरे हैं, बिसरा दिए गये हैं। उन महान बलिदानों , उनसे जुड़े आदर्शों की पवित्रता को क्षुद्र स्वार्थोंवाली राजनीति ने कलंकित कर दिया है। हाँ, लुभावने नारों और वादों की भरमार है।

इस स्वतंत्रता दिवस पर एक ख़ास बात यह भी है कि कोरोना की महामारी की वजह से पहले से ही डांवाडोल अर्थव्यवस्था चौपट हो चुकी है। सरकार के समर्थक अर्थशास्त्री और उद्योगपति भी अब यह कहने लगे हैं कि जीडीपी 1947 के दौर में वापस लुढ़क सकती है। सरकार लोगों को आत्मनिर्भर बनने का झुनझुना थमाकर अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ चुकी है। मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सच दिखाने के बजाय सरकार की ख़ुशामद में लगा है। आज़ादी के बाद कोई भौतिक तरक़्क़ी नहीं हुई है, यह नहीं कहा जा सकता लेकिन आधी रात में मिली आज़ादी पर शायर ने जो बहुत पहले कहा था, वह विकास की इन तमाम मंज़िलों और तामझाम के बावजूद आज भी कड़वा सच है- इंतज़ार था जिसका, ये वो सुबह तो नहीं।

हम यह भी न भूलें कि हमारी आज़ादी देश के बँटवारे के साथ आई थी, जिसने ज़मीनों को ही नहीं, दिलों को भी बाँट दिया था। 1947 में हुआ वो बँटवारा थमा नहीं है, आज भी जारी है। बल्कि पिछले कुछ बरसों में हमने देखा है कि समाज में विभाजन बढ़ानेवाली सियासत तेज़ और तीखी हुई है। बात-बात पर पाकिस्तान चले जाने के ताने दिये जाने लगे हैं। सुकून की बात यह है कि नफ़रत फैलाने की कोशिशों के बीच देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा ज़रूरत पड़ने पर इस सबके खिलाफ भी खड़ा हो जाता है। हमें इस वक़्त ऐसी आवाज़ों को ताक़त देने की ज़रूरत है।

यह भी ध्यान रखना है कि जिसका विकल्प बनना है, उसकी नक़ल न करें, अपनी स्वतंत्र शैली विकसित करें। यह समय देश के नागरिक समाज से, संस्थाओं से भाईचारे को, प्यार को, अमन को बढ़ाने की लगातार अथक कोशिशों की माँग करता है। इन कोशिशों के दरम्यान उम्मीद और हौसला बनाये रखने में ऐसे शब्द मददगार हो सकते हैं –

“दिल नाउम्मीद नहीं…. नाकाम ही तो है,

लंबी है ग़म की शाम मगर… शाम ही तो है।”

जय हिंद।

अमिताभ श्रीवास्तव, वरिष्ठ पत्रकार

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