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कोरोना वैक्सीन की रेस में क्या सबसे आगे है चीन ?

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कोरोना वैक्सीन की रेस में क्या सबसे आगे है चीन ?

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चीन में एक नई वैक्सीन पर काम चल रहा है।  बताया जा रहा है कि बंदरों को जब ये वैक्सीन दी गई तब उनके शरीर में कोरोना से लड़ने की ताकत आ गई। स्वस्थ इनसानों पर आजमाने से पहले वैक्सीन को पशुओं जैसे चूहों और बंदरों पर आजमाया जाता है, जिनमें ACE2- human receptor for virus- पाया जाता है। इसे प्री क्लिनिकल टेस्ट कहते हैं।

इस नई वैक्सीन का क्लिनिकल ट्रायल यानी स्वस्थ लोगों पर इसके असर के अध्यय़न का काम शुरू हो गया है। इस नई वैक्सीन को बनाया है बीजिंग की कंपनी Sinovac Biotech ने।

इस वैक्सीन में क्या है?

साइनोवैक वैक्सीन में SARS-CoV-2 का निष्क्रिय वायरस है। इस निष्क्रिय वायरस को शरीर में डालने से SARS-CoV-2 की निशानदेही करने और उससे लड़ने वाली antibodies तैयार हो जाती है। ये सब इस तरह होता है कि वायरस डालने के बाद भी उस व्यक्ति को कोरोना का संक्रमण नहीं होता।

क्लिनिकल ट्रायल में क्या होगा ?

 स्टेज 1-  ये वैक्सीन 144 लोगों को दी जाएगी। इसके जरिए ये समझने की कोशिश होगी कि इस वैक्सीन का कोई घातक साइड इफेक्ट तो नहीं।

स्टेज2 – efficacy trial- ये वैक्सीन 1000  नए लोगों पर आजमाया जाएगा। अब ये जांच होगी, कि वैक्सीन देने पर शरीर में जरूरी इम्यूनिटी आती है या नहीं?

किस तरह होती है जानवरों पर वैक्सीन की टेस्टिंग?

ये पता करने के लिए कि वैक्सीन देने के बाद शरीर में बने एंटीबडीज से SARS-CoV-2 का खात्मा होगा कि नहीं, रिसर्च टीम ने चूहों के एंटीबडीज सैंपल लिए और इन एंटीबडीज को टेस्ट ट्यूब में लेकर इन पर  SARS-CoV-2 के दस अलग अलग वायरस स्ट्रेन डाले गए जो चीन, इटली, स्पेन, स्विटजरलैंड और यूके के मरीजों से लिए गए थे। ये परीक्षण कामयाब रहा। इससे ये भी पता चला कि अलग-अलग देश में पहुंच कर ये वायरस म्यूटेट नहीं कर रहा, यानी अलग रूप नहीं ले रहा। मतलब ये कि एक देश में बना वैक्सीन दूसरे देश में भी कारगर होगा। टेस्ट ट्यूब के बाद 12 बंदरों पर इस वैक्सीन का प्रयोग हुआ। दो हफ्ते में इन बंदरों को इंजेक्शन से  तीन डोज दिए गए। पहला डोज प्लासीबो यानी जिसमें वैक्सीन नहीं था, दूसरा डोज वैक्सीन का मीडियम डोज था और तीसरा हाई डोज।

आखिरी डोज देने के 8 दिन बाद इन बंदरों के लंग्स में एक ट्यूब से SARS-CoV-2 का वायरस डाला गया। जांच से पता चला कि जिन बंदरों को वैक्सीन नहीं दी गई थी, उनके फेफड़ों में वायरस तेजी से फैला और न्यूमोनिया जैसी हालत हो गई, जबकि जिन्हें वैक्सीन दी  गई थी वो पूरी तरह महफूज रहे। जिन चार बंदरों में वैक्सीन की हाई डोज दी गई थी , उनकी हालत सबसे बेहतर थी। एक हफ्ते बाद भी हाई डोज ग्रुप में वायरस का कोई लक्षण नहीं था  जबकि मीडियम ग्रुप में वायरस का संक्रमण था लेकिन ये संक्रमण पूरी तरह नियंत्रण में था। खास बात ये रही कि बंदरों में इस वैक्सीन का कोई साइड इफेक्ट जैसे फीवर, वेट लॉस या ADE-antibody dependent enhancement नहीं नजर आया।

वैक्सीन से ADE का नहीं होना क्यों अहम है?

इससे पहले दुनिया में जहां कहीं भी कोरोना का वैक्सीन पशुओं पर टेस्ट किया गया उनमें ADE की स्थिति आ जाती थी  यानी वैक्सीन देने पर शरीर में एंटीबडी तो बनती थी लेकिन वायरस से मुकाबला होते ही वो एंटीबडी जंग का मैदान छोड़ कर भाग जाता था यानी पशु की हालत फौरन बिगड़नी शुरू हो जाती थी।

अमेरिका के कुछ साइंटिस्ट इस पूरी प्रक्रिया से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि-

  1. सिर्फ 12 बंदरों पर प्रयोग हुआ है जो आंकड़ों के लिहाज से बहुत छोटा सैम्पल है। इसे कई बार और ज्यादा बड़े समूहों पर किए जाने की जरूरत है।
  2.  साइनोवैक ने इस्तेमाल के लिए वायरस के दस स्ट्रेन लैब में तैयार किए होंगे, ऐसा करने से वायरस की प्रकृति बदल जाती है। ये कई बार इनसान को संक्रमित करने वाले वायरस की तरह व्यवहार नहीं करता।
  3.  इतने कम वक्त में हुए प्रयोगों के चलते ये बता पाना भी मुमकिन नहीं होगा कि अगर ये वैक्सीन कोरोना के खिलाफ कारगर साबित होता भी है तो ये कितने दिनों, हफ्तों या महीनों  तक कारगर रहेगा।
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