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क्या भारत पर हमला करनेवाला है चीन?

जरुर पढ़ें दुनिया संपादकीय

क्या भारत पर हमला करनेवाला है चीन?

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is china looking for a war

एक बार एक ऐसे राजनयिक से मुलाकात का मौका मिला था, जो भारत के परमाणु परीक्षणों के वक्त काफी ऊंचे ओहदे पर थे..। उन्होंने बताया था कि परीक्षण के बाद उन्हें बीजिंग भेजा गया, ये समझाने के लिए कि भारत के परमाणु बमों से चीन को फिक्र करने की ज़रूरत नहीं है (हालांकि आप रणनीतिक हलकों से पूछें तो परीक्षण के लिए पाकिस्तान नहीं, बल्कि चीन ही असल वजह थी..)। उन राजनयिक ने बताया कि वो जब बीजिंग उतरे तो इस बात की तैयारी के साथ कि चीनी राजनयिक सवालों की बौछार करेंगे, सफाइयां और आश्वासन मांगेंगे..। लेकिन उनकी हैरानी का ठिकाना नहीं रहा, ये जानकर कि बीजिंग के अधिकारी और नेताओं को इस बात की पड़ी ही नहीं थी..। कुल मिलाकर चीन के कूटनीतिक हलकों में उन्हें भारत के परमाणु बम को लेकर चिंता या असुरक्षा जैसा कुछ भी नज़र नहीं आया..।

ये केवल परीक्षणों की ही बात नहीं थी..। शायद बतौर सभ्यता ही आत्ममुग्धता का शिकार हैं हम..। लेकिन ज़रा सा आंख खोलकर देखें तो इबारत साफ लिखी है कि चीन अपने आपको अमेरिका के साथ रेस में पाता है..। आप तो रेस के गोले में उस झुंड के धावक हैं, जो सबसे आगे के 2-3 धावकों से इतने फासले पर होते हैं कि कैमरा भी उन्हें सिर्फ लॉन्ग शॉट में ही पकड़ पाता है..। और आपकी सरहद पर जो हो रहा है, उसका सीधा ताल्लुक भी चीन के सुपरपावर बनने की महत्वाकांक्षा से है..।अभी कुछ साल पहले तक पश्चिमी खेमे के मुल्कों को लगता था कि चीन विश्व व्यवस्था के गोरखधंधे में इतना रम गया है कि अब उसे पलटने के चक्कर में नहीं पड़ेगा..। हद से हद अपने इलाके यानी पश्चिमी प्रशांत महासागर (जिसमें पूर्वी एशियाई देशों और ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, फिजी, ब्रुनई जैसे मुल्कों के अलावा कई छोटे द्वीप राष्ट्र आते हैं) में अपनी चलाएगा और बाकी जगह अमेरिका की चलती रहेगी..।

लेकिन चीन की सत्ता में शी जिनपिंग, माओ के बाद सबसे ताकतवर नेता बनकर उभरे..। उन्होंने चीन के इरादों को नए पंख दिए..। साल 2017 में वो इस ऐलान के साथ दूसरी बार राष्ट्रपति बने कि चीन अब एक “नए युग” में प्रवेश कर चुका है और “दुनिया का नेतृत्त्व” करने की उसकी बारी अब आ गई है..। पिछले साल ट्रंप के व्यापार युद्ध से परेशान होकर जिनपिंग ने समझौते के लिए जुगाड़ नहीं भिड़ाए, बल्कि अपने लोगों को लाल सेना के महान सामरिक कारनामे “लॉन्ग मार्च” की याद दिलाई..। जिनपिंग की ज़ुबान से ज़्यादा उनके कारनामे बोलते हैं..। साल 2014 से लेकर 2018 के बीच चीनी नौसेना ने जितने युद्धपोत समुद्र में उतारे उतने भारत, जर्मनी, स्पेन और ब्रिटेन की नौसेनाओं में मिलाकर भी नहीं हैं..!

हालांकि अधिनायकवादी मुल्कों में अनहोनी का खतरा हमेशा रहता है लेकिन अगर चीन की सियासत स्थिर रहती है तो चीन, सुपरपावर के मुकाम तक दो रास्तों से पहुंच सकता है..। पहला रास्ता वही है जिसे अमेरिका ने चुना था..। एक मुल्क बनने के बाद से ही पहले अमेरिकियों ने उत्तरी अमेरिका पर पकड़ मज़बूत की और दक्षिणी गोलार्ध से धीरे-धीरे यूरोपियनों के पैर उखाड़े..और इसके लिए अच्छे-बुरे सभी तरीके अपनाए..। आज भी अमेरिकी नेता ये कहते हुए सुने जा सकते हैं कि दुनिया में उनके देश की पूछ तभी तक है जब तक उनकी सरहदों को कोई खतरा नहीं है..। चीन अगर यही रास्ता चुनता है तो उसे सबसे पहले पश्चिमी प्रशांत महासागर के इलाके में एकछत्र राज कायम करना होगा..। इसका मतलब ये नहीं कि वो देशों पर कब्जा करने निकल पड़ेगा (ताईवान के मामले में ऐसी आशंका को छोड़कर)..। लेकिन इसका मतलब ये ज़रूर है कि चीन के सभी पड़ोसी अपने आर्थिक और रणनीतिक फैसले लेते वक्त बीजिंग की मर्ज़ी को दरकिनार ना कर पाएं और अमेरिका को जितना हो सके, चीनी सरहद से दूर धकेला जा सके..। अगर चीन ऐसा नहीं कर पाता है तो उसे हमेशा पहले अपने घर के दरवाज़े का पहरा करना होगा, उसके बाद ही वो दुनिया में धौंस जमाने की सोच पाएगा..।

जब तक उसके आसपास अमेरिका मौजूद है, वियतनाम, ऑस्ट्रेलिया, जापान, दक्षिण कोरिया, और भारत जैसे देश भी उसकी पूरी तरह चलने नहीं देंगे..। दूसरे शब्दों में जब तक चीन अमेरिका के सहयोगियों और सैनिक अड्डों से घिरा है, वो सुपरपावर नहीं कहलाएगा..। जिस हिसाब से चीन अपनी सेना के तीनों अंगों में निवेश कर रहा है, ऐसा लगता है कि चीन को इस बात का अंदाज़ा है कि महाशक्ति बनने का आगाज़ अपने पड़ोस से ही करना होगा..। ये ऐसा ही है जैसा अमेरिका ने अपने उदय काल में स्पेन सरीखे प्रतिद्वंद्वंदी मुल्कों कैरेबियन इलाके से धकेलकर किया था..। चीनी विदेशमंत्री ने अमेरिकी थिंक टैंक ब्रुकिंग्स को दिए भाषण में ये साफ-साफ कहा था कि अमेरिका और चीन दोस्त बनकर रह सकते हैं, अगर वो प्रशांत महासागर में अपनी-अपनी ओर रहने का फैसला कर लें..। हॉन्गकॉन्ग की शासन व्यवस्था पर शिकंजा कसने और ताईवान में नई राष्ट्रपति के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत पर ही आंख दिखाने को आप इसी रोशनी में देख सकते हैं..। भारत ने अगर सरहद पर एक जगह सड़क बना ली तो बदले में सात-आठ जगह घुस जाना भी इसी धौंसपट्टी की रणनीति का हिस्सा लगता है..।

लेकिन फिर दूसरी हकीकतें भी हैं जिनके मद्देनज़र ये ज़रूरी नहीं कि चीन सुपरपावर बनने के लिए अमेरिकी मॉडल को ही चुने..। अमेरिका को कभी भी इतने सारे मतभेद रखने वाले पड़ोसियों का सामना एक साथ नहीं करना पड़ा..। भारत, जापान, वियतनाम, इंडोनेशिया..। जब अमेरिका उभर रहा था तो उसे टक्कर देने के लिए कोई दूसरी महाशक्ति भी नहीं थी..। ब्रिटेन समेत यूरोप के लिए उस वक्त का अमेरिका एक छोटा-मोटा रकीब था जिसका साथ कई दूसरे बड़े खतरों से निपटने के लिए ज़रूरी था..। वैसे भी अमेरिका को तकनीकी दमख़म में टक्कर देना अब भी इतना आसान नहीं है..। लिहाज़ा चीन के सामने सुपरपावर का तमगा पाने का एक दूसरा रास्ता है जो पहले से शॉर्टकट था और अब इस महामारी के बाद और भी छोटा लग रहा है..। क्यों ना इलाके का दादा बनने के बाद फिर दुनिया का दरोगा बनने का झंझट उठाने के बजाए, पहले दुनिया को ही वश में कर लें और फिर पड़ोस की दिक्कतें खुद-ब-खुद ठीक हो जाएंगी..। इसके लिए वो रणनीति चाहिए जो एक ओर अमेरिका की रणनीतिक संधियों को छिन्न-भिन्न करे और दूसरी तरफ़ सभी महाद्वीपों में चीन की आर्थिक, राजनयिक और राजनीतिक ताकत को बढ़ाए..। अगर बीजिंग की रणनीति ये है तो उसका ध्यान पश्चिमी प्रशांत महासागर से ज़्यादा पूरब की ओर यानी यूरेशिया और हिंद महासागर की ओर ज़्यादा होगा..। साथ ही उसे दुनिया चलाने वाली संस्थाओं में ज़्यादा मुखर होने की ज़रूरत होगी..।

इस रास्ते पर चलकर चीन अपने इर्द-गिर्द निकट भविष्य के लिए अमेरिका की मौजूदगी भले ही स्वीकार कर ले लेकिन वो वैश्विक अर्थव्यवस्था के नियमों, नई तकनीकों के नियंत्रण और दुनिया के राजनीतिक संगठनों पर दबदबा बढ़ाना चाहेगा..। डब्ल्यूएचओ से लेकर 5जी तक के मामले में कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है..। अब चीन की नज़र डॉलर को ग्लोबल करेंसी के रुतबे से हटाने पर भी है..। दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने भी कुछ ऐसा ही किया था..। उसने अपनी आर्थिक ताकत को राजनीतिक रसूख में बदला, तकनीक के मामले में सबसे आगे बना रहा और दुनिया में अहमियत रखने वाली संस्थाओं को चलाने की ताकत अपने पास रखी..। कहीं यही वजह तो नहीं कि वन बेल्ट, वन रोड परियोजना को चीन ने तमाम दिक्कतों के बावजूद नाक का सवाल बनाया है..? 2017 में तो चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने ‘डिजिटल सिल्क रोड’ बनाने का लक्ष्य भी तय किया है..। पिछले 3-4 दशकों से चीन ने अपने शिक्षा ढांचे में जो पैसा लगाया है, उसके बाद कृत्रिम बुद्धि (एआई), क्वांटम तकनीक और अंतरिक्ष विज्ञान जैसी मूलभूत टेक्नॉलॉजी में वो दुनिया में सबसे अगली कतार में है ही..।

आपने अभी तक ‘सॉफ्ट पावर’ के बारे में सुना होगा, ‘हार्ड पावर’ के बारे में सुना होगा..। लेकिन पिछले कुछ वक्त से चीन के राजनयिकों ने जिस आक्रामकता के साथ लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को अपने सिस्टम के मुकाबले नीचा दिखाना शुरू किया है उसके लिए ‘शार्प पावर’ नाम की तीसरी परिभाषा ईजाद करनी पड़ी है..। कोरोनावायरस से निपट चुकने के बाद ये ‘शार्प पावर’ पूरे शबाब पर है..। इस सब के बीच हम अभी चीन की ‘हार्ड पावर’ को ही टक्कर देने की हालत में नहीं हैं..। ‘सॉफ्ट पावर’ का आलम ये है कि धुर-वफादार पड़ोसी भी छिटककर चीन के पास जा रहे हैं..और ‘शार्प पावर’ के बारे में तो हमने अभी सुना तक नहीं है..। ऐसे में मैं फिर इससे पिछले लेख में कही सुन ज़ू की बात याद दिलाऊंगा कि रणनीति में जीत के लिए सबसे पहले ज़रूरी ये जानना होता है कि हम कितने पानी में हैं..। ये जोकर टीवी एंकरों की तरह छाती पीटकर नहीं, बल्कि ठंडे दिमाग से सोचकर होगा..। समझदारी इसी में है कि अल्पावधि में चीन को मैनेज करें.. और दीर्घावधि में खुद को इतना मज़बूत करें कि हम भी उसी के समकक्ष खड़ा कर सकें..। मगर फिलहाल जो देश में चल रहा है वो हमें इस मकसद से नज़दीक नहीं बल्कि दूर ही लेकर जा रहा है..।

साभार : नीतिदीप, युवा पत्रकार एवं लेखक

(तस्वीर राइज़िंग पावर्स प्रोजेक्ट से साभार)

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