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क्या इम्यूनिटी बढ़ाने का कोई शॉर्टकट है?

कोरोना जरुर पढ़ें संपादकीय

क्या इम्यूनिटी बढ़ाने का कोई शॉर्टकट है?

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हिन्दुस्तान में बेफिक्री से जीनेवालों की कमी नहीं। बीमारियां हो जाए, तो भी खाने-पीने में कमी नहीं करते। इनका तर्क होता है, जब बीमारी होगी तो दवा खा लेंगे, अभी से क्या सोचना। लेकिन कोरोना ने सारा माहौल खराब कर रखा है। जिन्होंने अपनी आदतों के आगे कभी अपनी सेहत को तवज्जो नहीं दी, उन्हें अब कोरोना का डर सताने लगा है। चिंता इस बात की है कि अगर कोरोना हो गया, तो क्या करेंगे? इसके लिए तो कोई गोली भी नहीं बनी।

डॉक्टर कहते हैं कि इससे बचने का एक ही तरीका है, अपने शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाना। ऐसे में लोगों पर आनन-फानन में अपना इम्यून सिस्टम बढ़ाने की धुन सवार हो गई है। लेकिन सवाल ये है कि क्या ये संभव है? और अगर संभव है, तो इसकी सही तरीका क्या है? चलिए इसे वैज्ञानिक नजरिये से देखें और विशेषज्ञों की राय जानें।

व्यापक रुप से फैलने वाली बीमारियों के दौर में, बाजार ऐसे उत्पादों से भर जाते हैं, जो इनका सटीक इलाज करने का दावा करते हैं। जैसे, सर्दी-खांसी के लिए विक्स, सिरदर्द के लिए डिस्परीन, आंतों के लिए प्रोबायोटिक्स आदि। लेकिन सभी जानते हैं कि इनका बिना सोचे-समझे किया गया इस्तेमाल खतरनाक साबित हो सकता है। जॉनसन बेबी पाउडर का किस्सा तो आपने सुना ही होगा। आज के कोरोना के दौर में भी ऐसे देशी-विदेशी उत्पादों का बाज़ार गर्म है, जो दावा करते हैं कि उनके इस्तेमाल से कोरोना आपके पास फटकेगा भी नहीं। चलिए इनकी सच्चाई जानते हैं।

इम्यूनिटी ‘बूस्ट’ करने की धारणा ही गलत है

दुर्भाग्य से, ये धारणा कि विटामिन की गोलियां, सुपरफूड्स या कुछ आदतें बदलने से आनन-फानन में शरीर की इम्यूनिटी बढ़ जाएगी, सिर्फ एक मिथक है। वैज्ञानिक तौर पर इसका कोई आधार नहीं है। पहले आपको समझाते हैं कि शरीर की इम्यूनिटी की मतलब क्या होता है? दरअसल, मेडिकल की भाषा में, शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को ‘बूस्ट’ करने या अचानक गति देने का कोई अर्थ ही नहीं होता।

इम्यूनोलॉजिस्ट के मुताबिक हमारे शरीर में वायरस के प्रवेश करने के तीन रास्ते हैं और यहां शुरुआत में प्रतिरक्षा के तीन अलग-अलग स्तर या घटक मौजूद होते हैं। ये हैं – त्वचा, नाक और मुंह और श्लेष्मिक  झिल्ली, जो शुरुआती दौर में किसी भी संक्रमण को रोकने का काम करते हैं। जब वायरस इन तीनों बाधाओं को पार कर जाता है, तब जाकर शरीर में मौजूद रसायन और कोशिकाएं, शरीर की आंतरिक प्रतिरक्षात्मक प्रणाली को अलर्ट करती हैं और वायरस से लड़ना शुरु करती हैं। उदाहरण के लिए, जब हम धूल के संपर्क में आते हैं, तो खांसी शुरु हो जाना या मौसम में बदलाव आने पर हल्का बुखार या सर्दी-खांसी का हो जाना।

जब ये भी काम ना कर पाएं, तब शरीर का एडाप्टिव इम्यून सिस्टम (आंतरिक प्रतिरक्षा प्रणाली) सक्रिय होता है। इसमें एंटीबॉडीज की मुख्य भूमिका होती है। याद रखें, इनके विकसित होने में कुछ दिनों से लेकर कुछ हफ्ते तक लग सकते हैं। इससे भी अहम बात ये है कि ये किसी खास वायरस या पैथोजेन को ही निशाना बनाती हैं। किसी अन्य वायरस के खिलाफ ये बेअसर होती हैं। जैसे – पोलियो का टीका (मृत कोशिकाएं) लगाने से, उसके खिलाफ शरीर में एंडीबॉडीज बनने लगती हैं और ये पोलियो के वायरस को पहचान कर उसे खत्म कर देती हैं। लेकिन ये इंफ्लूएंजा या किसी अन्य वायरस की पहचान नहीं कर सकते और उन्हें नष्ट नहीं कर सकते। इसलिए हर नये वायरस के लिए, उसे रोकनेवाली दवाएं या शरीर में एंटीबॉडीज विकसित करने लिए, उसके टीके की जरुरत पड़ती है।  

आम तौर पर संक्रमण के मामले में, शरीर धीरे-धीरे एंटीबॉडीज विकसित कर ही लेता है, और विषाणुओं को खत्म कर लेता है। लेकिन अगर किसी वायरस को जल्द रोकना हो, तो इसका सबसे अच्छा तरीका है, टीका ।  इस प्रक्रिया में मृत या जिंदा वायरस, या उसके कुछ हिस्से शरीर में इंजेक्ट किये जाते हैं, ताकि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली उन्हें पहचान सके और उनके खिलाफ एंटीबॉडीज तैयार कर सके।   

इसलिए जब हम इम्यून सिस्टम को बूस्ट करने की बात करते हैं, तो दरअसल शरीर की इसी प्रक्रिया को मजबूत करने या तेज करने की बात करते हैं। लेकिन सच मानिये, आप ऐसा बिल्कुल नहीं चाहेंगे, कि एडाप्टिव इम्यून सिस्टम ज्यादा सक्रिय हो। उदाहरण के लिए सर्दी-खांसी, बुखार को ही ले लीजिए। ज्यादातर मामलों में ये वायरस की वजह से नहीं होता, बल्कि आपका शरीर ही इन्हें शुरु करता है, जैसे- धूल, प्रदूषण, बदलता मौसम आदि। दरअसल किसी भी तरह के पैथोजन या वायरस के श्वसन-मार्ग में पहुंचने पर प्रतिरोधक प्रणाली सक्रिय हो जाती है। म्यूकस या बलगम आपके शरीर में मौजूद पैथोजेन को बाहर निकालता है, बुखार आपके शरीर को ज्यादा गर्म कर देता है, ताकि पैथोजेन अपनी संख्या ना बढ़ा सकें। बदन-दर्द और थकान, शरीर को इस बात का संकेत देते हैं कि अभी आराम की जरुरत है, ताकि बाहरी तत्वों से मुकाबला किया जा सके।

ऐसे में अगर किसी विटामिन या गोली में आपके इम्यून सिस्टम को बूस्ट करने की क्षमता है, तो इससे आपको आराम नहीं मिलेगा, बल्कि आपकी नाक और तेजी से बहने लगेगी। वहीं अगर एडाप्टिव इन्यून सिस्टम (आंतरिक प्रतिरक्षा प्रणाली) ज्याद सक्रिय हुआ, तो आपकी परेशानी और बढ़ जाएगी। आम तौर पर एलर्जी इसी वजह से होती है। किसी फूल, पराग या हवा में उड़ते कणों को शरीर दुश्मन समझने लगता है और उनके संपर्क में आते ही बुरी तरह प्रतिक्रिया करता है, जैसे आंखों में जलन, बार-बार छींक, नाक का बहना, थकान आदि। जाहिर है, आप नहीं चाहेंगे कि आपका इम्यून सिस्टम ज्यादा सक्रिय हो और शरीर हर बार ऐसी प्रतिक्रिया शुरु करे।

कितनी फायदेमंद हैं गोलियां?

अब बात मार्केट में उपलब्ध इम्यूनिटी बूस्टर्स की। चलिए, फिलहाल मान लेते हैं कि ये उत्पाद सकारात्मक तौर पर इम्यूनिटी को बढ़ाते हैं, या सही अर्थों में उसे मजबूत करते हैं। लेकिन समस्या ये है कि इनमें से ज्यादातर उत्पादों के दावे की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है। आईये इनके बारे में थोड़ा विस्तार से बात करते हैं।

मल्टीविटामिन्स –  ज्यादातर मल्टीविटामिन कंपनियां दावा करती हैं कि उनकी गोलियां प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने में मदद करती हैं। लेकिन वैज्ञानिक शोधों से पता चलता है कि विटामिन की ऐसी गोलियां स्वस्थ लोगों को किसी तरह का फायदा नहीं पहुंचातीं, बल्कि कई मामलों में नुकसान करती हैं।

विटामिन सी – इसे दुनिया भर में लोकप्रिय बनाया, दो बार के नोबेल पुरस्कार विजेता लिनस पॉलिंग ने, जो सर्दी-खांसी से मुकाबले के लिए इसका प्रयोग करने लगे। इन्होंने कई सालों तक इस पर रिसर्च किया और बाद में रोजाना 18 हजार मिलीग्राम तक का डोज लेना शुरु कर दिया, जबकि डॉक्टर्स सिर्फ 300 मिलीग्राम रोजाना की डोज का सुझाव देते हैं।

2013 के एक शोध के मुताबिक चिकित्सीय परीक्षण के दौरान वयस्कों में विटामिन सी के हाई डोज का, सर्दी से राहत या उसके जल्द ठीक होने का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला। विशेषज्ञ विटामिन सी के प्रचार के पीछे मल्टी-नेशनल कंपनियों के रैकेट को जिम्मेदार ठहराते हैं। फिलहाल डॉक्टरों का मानना है कि विटामिन सी की खुराक आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए तब तक फायदेमंद नहीं है, जब तक आपके शरीर में इसकी कमी ना हो। वहीं इसके ज्यादा सेवन से किडनी में पथरी की समस्या भी हो सकती है।

एंटीऑक्सीडेंन्ट्स – पहले आपको बता दें कि ये क्या हैं? बाहरी तत्वों या वायरस से मुकाबले के लिए श्वेत रक्त कोशिकाएं (White blood cells)  जहरीले किस्म के ऑक्सीजन यौगिक छोड़ती हैं। ये भी बैक्टीरिया या वायरस की तरह तेजी से अपनी क़ॉपी या डुप्लीकेट बनाते हैं, और वायरस को खत्म करते हैं। लेकिन ये दुधारी तलवार की तरह होते हैं। एक तरफ ये वायरस को मारते हैं तो दूसरी तरफ अपने संपर्क में आनेवाली स्वस्थ कोशिकाओं को भी हानि पहुंचाते हैं। इस वजह से शरीर में कैंसर और बुढ़ापे के लक्षण पैदा होते हैं और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। इसे रोकने के लिए शरीर में एंटीऑक्सीडेंट्स की जरुरत पड़ती है। ये रक्त में बचे ऑक्सीजन यौगिकों को खत्म करते हैं और शऱीर की स्वस्थ कोशिकाओं को बचाये रखते हैं।

अब आप समझ गये होंगे कि एंटीऑक्सीडेंन्ट्स की जरुरत बीमारियों के वक्त ही पड़ती है और पहले से लेने का कोई खास फायदा नहीं होता। दूसरी बात ये है कि हमारे भोजन में कई ऐसी चीजें शामिल होती हैं, जो एंटी-ऑक्सीडेंट से भरपूर होती हैं। ज्यादातर चटकीले रंगों वाले फल, सब्जियों और मसाले जैसे सेब, अनार, स्ट्रॉबेरी, हल्दी, गाजर, चुकंदर आदि में इनकी प्रचुर मात्रा होती है।

वैसे कोविड-19 के मरीजों पर इसे लेकर ट्रायल चल रहे हैं, लेकिन अभी तक बीमारी से लड़ने में इसकी भूमिका की पुख्ता जानकारी नहीं मिली है।  

फिर करना क्या चाहिए?

अगर आपका शरीर स्वस्थ है, तो इसका मतलब आपकी प्रतिरोधक क्षमता भी अच्छी है। इसलिए इसे बूस्ट करने के लिए गोलियां ना खाएं। हां, अपनी दिनचर्या में हेल्दी हैबिट्स जरुर शामिल करें। जितना संभव हो सके, ताजे फल और सब्जियां खाएं, व्यायाम करें और गैर-जरुरी दवाओं-गोलियों से बचें। वैसे, आयुर्वेदिक और प्राकृतिक चीजें आप ले सकते हैं, जैसे – तुलसी का काढ़ा, हल्दीयुक्त दूध, नीम के पत्ते आदि। क्योंकि इनकी ज्यादा मात्रा लेने से भी शरीर को नुकसान नहीं पहुंचता और इनके साइड-इफेक्ट्स नहीं होते।

वैसे कोरोना जैसी बीमारी का सबसे अच्छा इलाज है, इससे दूर रहना। इसलिए घर में रहिए, सुरक्षित रहिए।

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