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क्या कमल हासन का सवाल ग़लत है?

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क्या कमल हासन का सवाल ग़लत है?

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Is it wrong to question about new parliament?

जाने-माने अभिनेता और मक्कल निधी मय्यम (MNM) के संस्थापक कमल हासन (Kamal Haasan) ने रविवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से पूछा कि ऐसे समय में जब देश गंभीर उतार-चढ़ाव का सामना कर रहा है, तो क्या इस समय करोड़ों रुपये खर्च करके नये संसद (New parliament) का निर्माण करना जरूरी है?

कमल हासन ने अपने ट्वीट में लिखा, “कोरोनावायरस के कारण जब देश की आधी आबादी भूखी है, लोग आजीविका खो रहे हैं, 1000 करोड़ रुपये की नई संसद क्यों? जब चीन की महान दीवार का निर्माण किया जा रहा था तो हजारों लोगों की मौत हुई थी, उस समय शासकों ने कहा कि यह लोगों की रक्षा के लिए है। आप किसकी रक्षा के लिए 1,000 करोड़ रुपये की संसद का निर्माण कर रहे हैं? मेरे माननीय निर्वाचित प्रधानमंत्री जवाब दें.”

कमल हासन (फाइल फोटो)

कमल हासन ने अगले साल होने वाले तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के लिए अपनी पार्टी का चुनाव अभियान शुरू करने से कुछ ही घंटे पहले ये सवाल किया। हो सकता है कि ये सवाल राजनीतिक हो, और इसका मकसद सरकार पर निशाना साधना भर हो…. लेकिन क्या ये सवाल ग़लत है?…क्या हजारों भारतीयों के मन में यही सवाल नहीं उठ रहा है?…और क्या सरकार को इसका जवाब नहीं देना चाहिए?

क्या है सरकार की योजना?

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 दिसंबर को भारत की संसद की नई इमारत (New parliament) का शिलान्यास किया है। चलिए आपको इस नये संसद भवन की कुछ खास बातें बता दें –

  • नये संसद भवन का निर्माण क्षेत्र 64,500 वर्ग मीटर होगा, जो मौजूदा संसद भवन से 17,000 वर्ग मीटर अधिक होगा और 100 साल की जरूरतों को पूरा करेगा।
  • 971 करोड़ रुपये की लागत से यह चार मंजिला इमारत बनेगी। नया संसद भवन (New parliament) हाईटेक होगा और इसमें आधुनिक डिजिटल सुविधाएँ होंगी, ताकि ‘पेपरलेस दफ़्तरों’ के लक्ष्य की ओर बढ़ा जा सके।
  • इसमें हर सांसद को 40 वर्ग मीटर का एक अलग कार्यालय मिलेगा। इस दफ्तर में ऐसी तमाम सुविधा होगी, जिससे हर सांसद चाहे तो कमरे से ही संसद की कार्यवाही में हिस्सा ले पाएगा।
  • वहाँ सांसदों के बैठने के लिए बड़ा हॉल, एक लाइब्रेरी, समितियों के लिए कई कमरे, भोजन कक्ष और बहुत सारी पार्किंग की जगह होगी।
  • चीन की संसद के ग्रेट ऑडिटोरियम की तरह यहां एक भव्य कॉन्स्टीच्यूशन हॉल या संविधान हॉल होगा, जिसमें भारत की लोकतांत्रिक विरासत को दर्शाया जाएगा।
  • मौजूदा संसद भवन में कोई फेर-बदल नहीं होगी और इसका इस्तेमाल संसदीय आयोजनों के लिए और बतौर संग्रहालय किया जाएगा।

क्यों जरुरी है नई संसद (New parliament) का बनना?

प्रधानमंत्री ने नई संसद का शिलान्यास भले ही कर लिया हो, लेकिन इसके निर्माण का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और अदालत ने अभी सिर्फ आधारशिला रखने की इजाज़त दी है। दरअसल नई संसद बनाने की योजना के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अब तक 10 याचिकाएँ दायर हो चुकी हैं। भारत सरकार के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में इसे लेकर कई तर्क दिये हैं। –

  • उन्होंने कहा कि मौजूदा संसद की इमारत 1927 में बनी थी और अब यह बहुत पुरानी पड़ चुकी है। लगभग 100 वर्ष (93 वर्ष) पुराने इस संसद भवन में जगह की कमी है।
  • जब लोकसभा और राज्यसभा की संयुक्त सत्र आयोजित होती हैं, तो सदस्य प्लास्टिक की कुर्सियों पर बैठते हैं। इससे सदन की गरिमा कम होती है।
  • सबसे बड़ी समस्या है कि संसद में मंत्रियों के बैठने के लिए तो चैम्बर हैं लेकिन सांसदों के लिए नहीं हैं। साथ ही बिजली सप्लाई का सिस्टम भी पुराना है, जिसके चलते शॉर्ट सर्किट की समस्या होती रहती है।
  • संसद भवन में अब सुरक्षा संबंधी समस्याएँ भी खड़ी हो रही हैं। ये इमारत भूकंपरोधी नहीं है और इसमें आग लगने से बचाव संबंधी सुरक्षा मापदंडों का भी अभाव है।
  • नई संसद का फैसला भविष्य में सांसदों की संख्या में वृद्धि को ध्यान में रखकर किया गया है। जब वर्ष 2026 में संसदीय क्षेत्रों का नए सिरे से परिसीमन होगा, आबादी के साथ संसदीय कार्यक्षेत्रों की संख्या बढ़ेगी, तब तक सुरक्षा, तकनीक और सहूलियत के लिहाज से नया भवन जरूरी होगा। 
  • नये भवन (New parliament) के लोकसभा कक्ष में 888 सदस्यों के बैठने की क्षमता होगी, जबकि राज्यसभा कक्ष में 384 सदस्य बैठ सकेंगे। नए संसद भवन की संयुक्त बैठक के दौरान वहाँ 1272 सदस्य बैठ सकेंगे।
  • तुषार मेहता ने यह भी कहा कि नई संसद (New parliament) होनी चाहिए या नहीं, यह एक नीतिगत निर्णय है, जो सरकार को लेना होता है। इसके लिए एक अलग स्वतंत्र अध्ययन की आवश्यकता नहीं है।

क्यों ग़ैरजरुरी है नई संसद (New parliament) का बनना?

सबसे पहले आपके ये बता दें कि नये संसद भवन (New parliament) की लागत भले ही 1000 करोड़ के आसपास हो, लेकिन दरअसल ये एक बड़े प्रोजेक्ट का हिस्सा भर है, जिसकी लागत है 20,000 करोड़ रुपये। सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट नाम की इस योजना के तहत राष्ट्रपति भवन से इंडिया गेट तक फैले करीब 3 किमी लंबे राजपथ पर पड़ने वाले सरकारी भवनों का पुनर्निर्माण या पुनरुद्धार किया जाना है। सुप्रीम कोर्ट में इस पूरे प्रोजेक्ट के निर्माण और ज़मीन के इस्तेमाल को लेकर आपत्ति दर्ज करते हुए कई याचिकाएं दायर की गई हैं। वहीं पर्यावरण के नुकसान समेत कई अन्य आधारों पर भी आपत्तियां दर्ज की गई हैं। आईये देखते हैं क्या हैं इनके तर्क –

  • जब देश में विकास की दर ऋणात्मक हो, कोरोना से अर्थव्यवस्था बदहाल हो और किसान सड़कों पर हों…तब सरकार का किसी परियोजना पर हजारों करोड़ रुपये खर्च करने का फैसला किस तरह देश हित में हो सकता है?
  • जनता के पैसे ख़र्च करके इस तरह के निर्माण को उचित ठहराने को लेकर सरकार की ओर किसी भी तरह का कोई अध्ययन नहीं हुआ है।
  • इसे किसी तरह से साबित नहीं किया गया है कि मौजूदा संसद की इमारत के साथ ऐसी क्या समस्या है जिससे कि इसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता?
  • एक नए संसद भवन (New parliament) के निर्माण के पक्ष में सरकार इसकी आयु और इसकी संरचनात्मक और भूकंपीय अस्थिरता को महत्वपूर्ण कारण बता रही है। लेकिन इससे जुड़ा कोई भी ठोस डाटा या रिपोर्ट उनके पास नहीं है।
  • अमेरिकी संसद यूनाइटेड स्टेट कैपिटल लगभग 200 साल पुराना है। ब्रिटिश संसद पैलेस ऑफ वेस्टमिंस्टर एक हजार साल से भी ज्यादा पुरानी है। फिर भी इनमें कामकाज चल रहा है। हमारी संसद तो सिर्फ 100 साल पुरानी है।
  • दुनिया भर में ऐतिहासिक इमारतों और विरासत के संरक्षण के लिए तमाम संसाधन और तकनीक मौजूद हैं। कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, फ़िनलैंड, जर्मनी और कई अन्य प्रगतिशील देशों ने अपनी संसद की ऐतिहासिक इमारतों का जीर्णोद्धार करके दोबारा इस्तेमाल किया है। फिर हम क्यों नहीं ऐसा कर सकते?
  • इसी इलाके में इसी के समान आयु, इसी तरह और तकनीक से बनी हुई कई ऐतिहासिक इमारतें हैं, जिनमें राष्ट्रपति भवन भी शामिल है। तो क्या ये सभी असुरक्षित हैं? क्या इनमें रहनेवालों या जानेवाले टूरिस्टों की जान को खतरा नहीं है?
  • रिपोर्ट्स के अनुसार, वर्ष 2061 तक देश की जनसंख्या के स्थिर होने और उसके बाद गिरावट का अनुमान लगाया गया है। इसका मतलब यह होगा कि सांसदों की संख्या अगर बढ़ती भी है, तो ऐसा केवल 40 वर्षों के लिए होगा। इस छोटी अवधि के लिए एक नया संसद भवन पूरी तरह अनावश्यक है।
  • मौजूदा संसद भवन में सिर्फ आंतरिक व्यवस्था के बदलने से आराम से कम से कम 800 सदस्यों को बैठाया जा सकता है। इसी तरह राज्यसभा वर्तमान लोकसभा हॉल में लाई जा सकती है। सेंट्रल हॉल में संसद के संयुक्त या विशेष सत्र आयोजित किए जा सकते हैं।
  • नया संसद भवन (New parliament) जहां प्रस्तावित किया गया है, वहां पार्क है और कई बड़े छायादार पेड़ लगे हुए हैं। किसी सार्वजनिक स्थान पर, पेड़ों को काटकर निर्माण करना न केवल गलत है बल्कि दिल्ली मास्टर प्लान का उल्लंघन भी है।
  • इस प्रस्ताव को विभिन्न सांविधिक निकायों और एजेंसियों द्वारा जिस तरह फटाफट मंज़ूरी मिलती जा रही है, उससे ऐसा लगता है कि जैसे किसी ने ठान लिया है कि हर कीमत पर इस योजना को आकार देना ही है।

और भी हैं कई सवाल

नई संसद भवन (New parliament) के निर्माण के पक्ष में सबसे बड़ी दलील ये दी जा रही है कि मौजूदा संसद भवन में जगह की कमी है और सभी सांसदों को दफ्तर के लिए कमरे नहीं मिले हैं। लेकिन ये बात हजम करना मुश्किल है कि इतने विशाल संसद भवन में कुछ आंतरिक फेर-बदल और थोड़े-बहुत निर्माण के साथ 800 सदस्यों के बैठने की व्यवस्था नहीं हो सकती। आपको बता दें कि इसके तीन ओर तीन कक्ष (लोक सभा, राज्य सभा और पूर्ववर्ती ग्रंथालय कक्ष) हैं और इनके मध्य उद्यान प्रांगण है। इन तीनों कक्षों के चारों ओर एक चार मंजिला वृत्ताकार भवन है, जिसमें मंत्रियों, संसदीय समितियों के सभापतियों के कक्ष, दलों के कार्यालय, लोक सभा तथा राज्य सभा सचिवालयों के महत्वपूर्ण कार्यालय और साथ ही संसदीय कार्य मंत्रालय के कार्यालय हैं। इस संसद भवन में 340 से ज्यादा कमरे हैं, 1,067 व्यक्तियों की क्षमता वाला प्रेक्षागृह है, और कई समिति और सम्मेलन कक्ष हैं।

दूसरी कमी ये बताई जा रही है कि सभी सांसदों को दफ्तर नहीं मिल पा रहा है। लेकिन सवाल ये है कि सांसदों को अलग दफ्तर की जरुरत क्या है? भारतीय संसद के सालाना तीन सत्र होते हैं, जिनमें लगभग 100 दिन कार्य होता है, वो भी करीब छह घंटे यानी सालाना 600 घंटे। संसदीय आंकड़ों के मुताबिक दिसम्बर 2016 के शीतकालीन सत्र के दौरान लगभग 92 घंटे व्यवधान की भेंट चढ़ गए। यानी तीनों सत्रों को मिलाकर करीब 300 घंटे बर्बाद हो जाते हैं। अब सांसद बाकी के 300 घंटे भी सदन के बजाए दफ्तर में बिताएंगे, तो फिर सदन में उनकी जरुरत क्या रह जाएगी? आपको बता दें कि सदन की प्रतिदिन की कार्यवाही पर लगभग रुपए 6 करोड़ खर्च होते हैं। क्या उनकी इस जरुरत के लिए 1000 करोड़ का नया भवन बनाया जाना चाहिए?

The Father of Loksabha

सबसे बड़ी बात, किसी देश का संसद भवन उसके लोकतांत्रिक इतिहास का…जनता के संघर्ष का…उसके गौरव का हिस्सा होता है। मौजूदा संसद भवन भी हमारा आजादी की लड़ाई का, हमारे लोकतंत्र का गवाह है। अंग्रेजों ने इसी जगह भारतीयों को उनकी सत्ता सौंपी थी… भारतीय संविधान का प्रारूप भी यहीं तैयार हुआ था…यहां हमारे नेताओं ने लोकतंत्र की नींव रखी थी। इसमें बैठना गौरव की बात है और इसे छोड़ देना अपने इतिहास और महापुरुषों के अपमान जैसा है।

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