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farm ordinance :आवश्यक वस्तु (संशोधन) अध्यादेश, 2020 से क्यों नाराज हैं किसान ?

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farm ordinance :आवश्यक वस्तु (संशोधन) अध्यादेश, 2020 से क्यों नाराज हैं किसान ?

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farm ordinance :lok sabha

किसानों के इस देश में किसानी पर सरकार farm ordinance ले कर आती है और देश भर के किसान इसके विरोध में नजर आते  हैं। ऐसा क्यों है? अगर सरकार की नीति सही है, नीयत सही है तो फिर ऐसा क्यों है कि हरियाणा, तेलंगाना, महाराष्ट्र, पंजाब, उत्तर प्रदेश और राजस्थान  में किसान 65 साल पुराने कानून में संशोधन के खिलाफ धरना-प्रदर्शन करने पर मजबूर हो गए हैं।

 मॉनसून सत्र के तीसरे दिन लोकसभा में आवश्यक वस्तु (संशोधन) अध्यादेश, 2020 पारित हो गया। इसके तहत अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल, प्‍याज और आलू को आवश्‍यक वस्‍तुओं की सूची से हटाने का प्रावधान किया गया है। सरकार का दावा है कि इस कानून से एग्रीकल्चर में रेगुलेशन कम होगा, सप्लाई चेन मजबूत होगा, प्रोडक्शन, डिस्ट्रीब्यूशन और ट्रेडिंग बेहतर होगा, निजी निवेश और विदेशी निवेश बढ़ेगा। कृषि क्षेत्र में कारोबार के अनुकूल माहौल बनेगा। ‘‘ वोकल फार लोकल’’  से किसान मजबूत होंगे,आत्मनिर्भर होंगे, उनकी आय में इजाफा होगा। ‘मूल्य आश्वासन और कृषि सेवाओं पर किसान (सशक्तिकरण और सुरक्षा) समझौता अध्यादेश-2020’ से  किसानों को पहले से तय कीमत पर उपज को बेचने के लिए लिखित करार करने की इजाजत दी गयी है। केंद्र सरकार इसके लिए गाइडलाइन्स जारी करेगी । इससे बिचौलियों की भूमिका खत्म होगी और किसानों को अपनी फसल की बेहतर कीमत मिलेगी । 

farm ordinance: के कानून बनने से क्या होगा ?

 केंद्र सरकार को हक हासिल होगा कि वो किसी अनाज, खाद या पेट्रोलियम पदार्थ को आवश्यक वस्तु घोषित करे और उसके प्रोडक्शन, सप्लाई, डिस्ट्रीब्यूशन और ट्रेडिंग को रेगुलेट करे। अगर किसी कृषि उत्पाद की कीमत में 100%का इजाफा हो जाता है तो सरकार स्टॉक लिमिट तय कर सकती है

farm ordinance: का विरोध क्यों हो रहा है

farm ordinance protest in delhi

अब तक जमाखोरी गैरकानूनी था। विधेयक के कानून बनने के बाद स्टॉकिस्ट्स के लिए जमाखोरी उनका कानूनी हक बन जाएगा। जाहिर है इससे फायदा किसानों को नहीं मल्टीनेशनल कंपनीज और बड़े कारपोरेट्स को होगा जो किसानों से कम कीमत पर उनके उत्पाद खरीदेंगे और जब उनकी कीमत बढ़ जाएगी तब वो उन्हें बाजार में बेचेंगे।

सरकार इस कानून से निर्यातकों को बाहर रख रही है। मतलब ये कि किसान तय सीमा से ज्यादा, अपनी ही उपज को अपने पास नहीं रख सकते, लेकिन निर्यातक जितना चाहें उतना अनाज अपने पास रख सकते हैं।

सरकार किसान को स्थानीय मंडी से आजाद करने की बात कह रही है, उसके लिए सारा देश अब मंडी होगा, लेकिन हमारे देश में दस मे से नौ किसान सीमांत कृषक है, अनाज बेचने के लिए वो अपने गांव या जिले के दायरे से बाहर नहीं जा पाता, क्या वो दूसरे राज्य जाकर अपनी छोटी उपज बेचने के बारे में सोच भी सकता है? सरकार अगले तीन साल में दस हजार FPO-Farmer Producer Organisations के जरिए छोटे किसानों को मजबूत करने का इरादा रखती है। लेकिन बीते 6 साल में बने पांच हजार से ज्यादा FPO कामयाब नहीं रहे हैं। अब तक सिर्फ 640 FPO को EGS-  Equity Grant Scheme के तहत और 113 FPO को CGS- Credit Guarantee Scheme के तहत फंडिंग मिली है।

किसानों को डर है कि अब निजी कंपनियां खेती करेंगी और हम अपने ही खेत मे मजदूर हो कर रह जाएंगे। कंपनियों को सरकार किसान के साथ उपज की कीमत के लिए लिखित करार का हक दे रही है, लेकिन किसानों को हक मिले, इस वास्ते न्यूनतम समर्थन मूल्य का जिक्र तक नहीं कर रही।

कॉन्ट्रैक्ट खेती के नाम पर कंपनी खेत में एक रुपया निवेश करेगी और किसान को चार रुपया बताएगी तो करार से बंधा किसान क्या कंपनी का कर्जदार नहीं हो जाएगा? जमीन पर मालिकाना हक किसान का कायम रहते हुए भी कर्ज के जाल में उसके फंसने की आशंका से इनकार नहीं किया जा  सकता।

एक मुद्दा जीएसटी को लेकर केंद्र-राज्य रिश्ते में आई खटास के बाद राज्य सूची के विषय को केंद्र सूची में शामिल किए जाने को लेकर राज्य सरकारों की आशंका को लेकर भी है। कृषि स्टेट सब्जेक्ट है, लिहाजा अनाज, सब्जी या खाने के तेल की  जमाखोरी पर लगाम लगाने का अधिकार अब तक राज्यों के पास था, अब ये अधिकार केंद्र सरकार के पास होगा। तृणमूल कांग्रेस के सौगत राय इसे coercive federalism करार दे रहे हैं।

सरकार को इस मुद्दे पर सियासी दलों का समर्थन भी हासिल नहीं है। विरोधी पार्टियां तो जाहिर है विरोध में हैं ही, किसानों के राज्य पंजाब में शिरोमणि अकाली दल जैसी सहयोगी पार्टियां भी इस विधेयक की मुखालफत कर रही हैं।

एनसीपी को अनाज की रिटेल प्राइस पर एतराज है। सुप्रिया सुले ने राव साहिब पाटील दान्वे से पछा कि स्टॉक लिमिट के लिए 100%मूल्य वृद्धि के फार्मूले तक सरकार कैसे पहुंची, क्योंकि राज्य सरकारों से इस बारे में कोई बात तो हुई नहीं।

बीएसपी के कुंवर दानिश अली का कहना है कि इस कानून का हस्र भी डिमॉनिटाइजेशन की तरह होगा। ब्लैकमार्केटिंग रोकने के नाम पर इस कानून से एक बार फिर गरीबों को परेशानी होगी।

आप सांसद भगवंत मान का कहना है कि ये दरअसल कृषि क्षेत्र के निजीकरण की दिशा में एक कदम है

सरकार चाहती है कि किसानों की आय बढ़े, रेगुलेशन कम होगा तो खेती में निवेश बढ़ेगा, सप्लाई चेन बेहतर होगा तो कंज्यूमर्स को फायदा होगा, लेकिन इस विधेयक की सबसे बड़ी खामी ये है कि किसान और खेती के मुद्दे पर कानून से पहले किसानों से मशविरा होना चाहिए था, उन्हें पूरी तरह भरोसे में लेना चाहिए था, जो सरकार ने नहीं किया। अब किसानों को लग रहा है कि ये कानून उनके खिलाफ है और… कांट्रैक्ट फार्मिंग करने वाली कंपनियों के हित में है, अनाज के स्टॉकिस्ट्स के हक में है, बिचौलियों के हक में है अभी बाजार में सब्जियों के बाद दालें भी महंगी हो गई हैं, वहीं प्याज निर्यात के खिलाफ महाराष्ट्र के किसान प्रदर्शन कर रहे हैं … साफ है कि सरकार बुनियादी जरूरतों वाले काम को सही तौर पर नहीं कर पा रही, ऐसे में किसानों को जिस क्रांति का सपना दिखाया जा रहा है, उसको लेकर अगर किसान आश्वस्त नहीं हो पा रहा तो आप उसे कसूरवार करार नहीं दे सकते।

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