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जजों का काम जजों की नियुक्ति करना नहीं है : फली नरीमन

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जजों का काम जजों की नियुक्ति करना नहीं है : फली नरीमन

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प्रख्यात न्यायविद फली नरीमन ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए कानून मंत्री और चीफ जस्टिस को आपस में बात करनी चाहिए. भारत के चुनिंदा कानूनविदों में से एक पद्मविभूषण फली नरीमन ने कहा कि इस समस्या का समाधान एनडीए सरकार के 2003 के संविधान संशोधन विधेयक (NJAC Bill) में निहित है जो कि वेंकटचलैया आयोग की सिफारिशों पर आधारित थी.

94 वर्ष के फली नरीमन ने कहा कि इस बिल में हाई कोर्ट-सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए 5 सदस्यों का एक राष्ट्रीय कमीशन बनाने का प्रस्ताव था. इन 5 सदस्यों में 3 वरिष्ठतम जज शामिल होने थे. उन्होंने कहा कि इस बिल में प्रावधान था कि जजों की नियुक्ति पर फैसला बहुमत के आधार पर लिया जाता.
एक बातचीत में न्यायविद फली नरीमन ने समझाया कि 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने NJAC Bill को क्यों रद्द कर दिया था. नरीमन ने कहा, “NJAC बिल वेंकटचलैया आयोग की सिफारिशों से अलग था. इसमें 2 ऐसे लोगों को शामिल किया गया था जो वकील नहीं थे, गैर न्यायिक सदस्यों को शामिल किया गया था जो कि जजों के सुझाव से इतर अपनी राय चला सकते थे और उनके फैसले पर वीटो लगा सकते थे.

कई दशकों तक न्यायिक सेवा में सक्रिय रहने वाले फली नरीमन ने स्वीकार किया कि जजों की नियुक्ति की मौजूदा प्रणाली कॉलेजियम सिस्टम में दिक्कतें हैं. इसमें सुधार की जरूरत है. उन्होंने कहा कि अगर स्पष्ट रूप से कहा जाए तो जजों का काम दूसरे जजों की नियुक्ति करना नहीं है. वरिष्ठ न्यायविद फली नरीमन कानून मंत्री किरेन रिजिजू के उस प्रस्ताव से भी सहमत दिखे जहां उन्होंने कहा कि जजों की नियुक्ति की मौजूदा प्रणाली में सरकार का भी एक सदस्य होना चाहिए. उन्होंने कहा, ” ‘कानून मंत्री सही थे जब उन्होंने एक पत्र में सुझाव दिया था कि कॉलेजियम में कानून मंत्रालय द्वारा नामिनेट किया गया एक व्यक्ति को क्यों नहीं रखा जाना चाहिए. मुझे इससे कोई समस्या नहीं है. मुझे नहीं लगता कि किसी को होना चाहिए.”

न्यायापालिका और विधायिका के बीच संवाद की पैरवी करते हुए उन्होंने कहा कि अगर ये दोनों नहीं मिलते हैं तो विश्वास खत्म होता है. बार बार चीजें प्रेस में जाती है इससे अच्छा है कि वो आपस में मुलाकात करते. संवाद ही इस समस्या के निराकरण का एक मात्र हल है. उन्होंने जस्टिस एमसी छागला और मोरारजी देसाई का जिक्र करते हुए कहा कि छागला ने लिखा है कि वे देसाई को उतना पसंद नहीं करते थे. बावजूद इसके वे उनसे लगातार मिला करते थे. उन्होंने इस पैरवी की कि पीएम और चीफ जस्टिस को अथवा कानून मंत्री और चीफ जस्टिस को लगातार मिलते रहना चाहिए.

उन्होंने कहा कि कानून मंत्री किरेन रिजिजू द्वारा न्यायपालिका पर लगाए गए आक्षेप “काफी अनावश्यक” थे. बता दें कि रिजिजू ने कहा था कि नेताओं की तरह जजों को चुनाव का सामना नहीं करना पड़ता है. फली नरीमन ने कानून मंत्री के इस बयान की आलोचना की. फली नरीमन ने याद किया कि आपातकाल के दौरान कैसे सरकार और सीजेआई के बीच परामर्श के माध्यम से न्यायिक नियुक्तियों की पिछली प्रणाली खत्म हो गई थी. नरीमन ने कहा, “न्यायाधीशों का तबादला आपातकाल के दौरान जरूरत के आधार पर नहीं किया जाता था… बल्कि केवल इसलिए कि उनका तबादला कर दिया जाता था क्योंकि उनके फैसले तत्कालीन सरकार के हितों के खिलाफ होते थे.

आपातकाल का जिक्र आने पर जब फली नरीमन से पूछा गया कि क्या उन्हें एक बार फिर ऐसा डर सता रहा है कि आपातकाल जैसा माहौल एक बार फिर से पैदा किया जा सकता है. इस पर फली नरीमन ने कहा कि हां उन्हें ऐसा ही लग रहा है. इसलिए वे सुझाव दे रहे हैं. फली नरीमन ने कहा कि कॉलेजियम सिस्टम पर कोई हॉलमार्क नहीं है, ऐसा नहीं है कि यही होना ही चाहिए, और कुछ नहीं. अगर सरकार जजों की नियुक्ति के लिए नेशनल कमीशन की बात करती है तो मैं इसके लिए सहमत हूं. नेशनल कमीशन लाइए, आपकी पार्टी ने स्वयं इसका प्रस्ताव दिया था. आप उस बिल को फिर से पेश करिए. यही तो करना है.

कौन हैं फली नरीमन?
फली नरीमन सुप्रीम कोर्ट के सीनियर मोस्ट वकील देश के नामी-गिरामी न्यायविद हैं. वे 1991 से 2010 तक बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष रहे हैं. वे मई 1972 से लेकर जून 1975 तक देश के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल रहे. न्यायिक सेवाओं में योगदान के लिए उन्हें 1991 में पद्म भूषण, 2007 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया. वे राज्यसभा (1999-2005) के लिए भी नॉमिनेट हुए.

It is not the job of judges to appoint judges: Fali Nariman

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