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#Kisan andolan: सरकार और किसान के गतिरोध को तीन बातों से समझिए

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#Kisan andolan: सरकार और किसान के गतिरोध को तीन बातों से समझिए

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#Kisan andolan

सरकार और किसान के गतिरोध (#Kisan andolan) को तीन बातों से समझिए

  1. MSP खत्म होगी?

सरकार- MSP जारी है जारी रहेगा

  किसान – हमें पता है PDS की वजह से MSP जारी रहेगा। हमें ये गारंटी चाहिए कि आपकी लाई नई मंडी में MSP से कम पर खरीद गैरकानूनी माना जाएगा।

2.APMC मंडियां बंद हो जाएंगी?

सरकार -APMC मंडियां बंद नहीं होंगी।

किसान- हम ये देख रहे हैं कि जिस तरह जिओ की मुफ्त 4जी के आने के बाद मुनाफे में चल रहे BSNL के पास कर्मचारियों की सैलरी देने के पैसे नहीं हैं, वही हाल निजी मंडियों के सामने APMC का हो जाएगा।

3.किसानों की जमीन खतरे में

सरकार – एग्रीमेंट फसलों के लिए होगा, जमीन के लिए नहीं; किसानों की जमीन नहीं छिनेगी

किसान – फिर Section 9 of Contract Act में ये क्यों लिखा है कि कंपनी के इनपुट की वापसी के लिए किसान दूसरे

 ‘debt instruments’ से कर्ज ले सकता है as separate and parallel deals.

साफ है कि सरकार जब किसान से बात किए बगैर किसानों की भलाई के लिए कानून लाती है तो वो कानून जैसा होता है, वैसे ही हैं ये तीन कानून। अब ये सोचिए कि अगर किसान अपने लिए कानून बनाते तो वो कैसा होता ?

किसानों का बनाया किसानों के लिए कानून

  1. किसान को सस्ता डीजल मिले इस वास्ते कानून

बीजेपी देश की पहली सरकार है जिसने डीजल को पेट्रोल से महंगा कर दिया है। सरकार को ये बात समझनी होगी कि दुनिया में सबसे छोटी जोत का किसान दुनिया में सबसे ज्यादा डीजल पर टैक्स ( करीब ₹50, कीमत का 65% ) देने की स्थिति में नहीं है।

2. बीज, खाद, कीटनाशक और फार्म इक्विपमेंट को रेगुलेट करने के लिए कानून

सरकार जरूरी दवाइयों की कीमत रेगुलेट करती है, इससे दुनिया में सबसे सस्ती दवा भारत में बिकती है। खाद,बीज की निजी कंपनियां हर साल अपने मशहूर ब्रांड की कीमत बढ़ा देती है, और किसान को महंगा बीज, मंहगी खाद और महंगा कीटनाशक कई बार कर्ज लेकर खरीदना पड़ता है। जब सारे बाजार रेगुलेट हो रहे हैं तो यही बाजार क्यों रेगुलेशन से बाहर हो, एक वजह तो बताइए?

3.एमएसपी पर कानून बने

एक देश, एक अनाज, एक कीमत.. अगर बाकी चीजों के लिए सही है तो कृषि में भी ये मुमकिन है। अगर आप अमेजन या फ्लिपकार्ट पर देश में कहीं भी एक कीमत पर एक ब्रांड की नई सीरीज वाली मोबाइल खरीद सकते हैं, जिसका फायदा ज्यादातर चीनी कंपनियों के खाते में जाता है तो अनाज, फल या सब्जियों के लिए क्वालिटी के हिसाब से देश भर में एक कीमत तय क्यों नहीं हो सकती।  

4. गांव और किसान के करीब हो मंडी

 मार्च 2017 तक देश भर में 6630 मंडियां थीं ( स्रोत- लोकसभा फरवरी 2019)। विशेषज्ञों की सलाह है और करीब 40 हजार नई मंडियों की। इससे अभी APMC के दायरे में 496 वर्ग किमी इलाका आता है, अगर ये नई मंडियां बन गईं तो हर 80किमी पर एक APMC की मंडी होगी। आप निजी क्षेत्र को ये मंडियां बनाने दीजिए। लेकिन यहां भी बाकी के APMC की तरह 8.5 फीसदी टैक्स हो। इससे राज्य को राजस्व मिलेगा तो सरकार कृषि की बेहतरी के लिए और निवेश कर पाएगी।

5.अनाज खरीद की एक व्यवस्था

हमारे यहां ये व्यवस्था है कि कोयंबटूर की फैक्ट्री में बना रेडिमेड ब्रांडेड शर्ट महाराष्ट्र के शोलापुर में बिके या बिहार के समस्तीपुर में, उसकी MRP एक होगी। यहां तक कि चीन में बना आईफोन भी गया से गोवा तक एक ही कीमत पर मिलता है। लेकिन अनाज, फल या सब्जी की दर सारे देश में हर किलोमीटर पर बदल जाती है। और इसकी वजह किसान नहीं है। अब जरूरी ये है कि बाकी की वस्तुओं की तरह कृषि उत्पादों की कीमत से किसान का रिश्ता बन पाए। एक आसान तरीका तमिलनाडु का है।  ‘Uzhavar Santhai’ में खरीदार सीधे किसान से अनाज और सब्जियां, फल वगैरह खरीदते हैं, लेकिन किसानों का शोषण न हो, इस वास्ते उन्हें मिलने वाले मूल्य की गारंटर राज्य सरकार होती है।

6.अमूल जैसी और सहकारी समितियां बने

19 राज्यों में पहले से कांट्रैक्ट फार्मिंग है। कानून बनने मात्र से हालात नहीं सुधर जाते। ज्यादा सही मिसाल अमूल की है। जहां लाखों किसान अमूल को दूध देते हैं, सहकारी समिति के तौर पर अमूल उन्हें इसकी वाजिब कीमत देती है और फिर दूध की प्रोसेसिंग कर बहुत तरह  के उत्पाद बनाती है। जो काम दूध में हो सकता है, वो अनाज, फल या सब्जियों के लिए मुमकिन है। ये किसान के बूते की बात नहीं है। अमूल सरकार की ही देन है, उसे ही आगे आकर अनाज, सब्जियों और फलों के लिए छोटे किसानो का को आपरेटिव बनाना चाहिए।

7. FPO का सच-

अभी तक देश में महज 640 FPO हैं जिन्हें Equity Grant Scheme और 113 FPO को CGS- Credit Guarantee Scheme के तहत फंडिंग मिली है। किसानों के समूह को एक्सपोर्टर में तब्दील होने में अभी वक्त लगेगा। पहले उसे अपने गांव और शहर के बाजार में जगह बनाने दीजिए।

8. जमाखोरी पर कानून बने

 होर्डिंग को वैध बनाने वाला कानून वापस हो। बीते दो महीने से आलू की कीमत देश में पचास के पार थी, शायद आपको इसकी वजह पता न हो, ये इसलिए महंगा था,क्योंकि अभी आलू की बोआई का सीजन था, बोआई सीजन खत्म होते ही आलू 20 से 30 के भाव पर आ गया है। जमाखोरी से सिर्फ दो को सबसे ज्यादा नुकसान होता है, एक जो देश में सबसे गरीब है और दूसरा उसे जिसे फसल बोनी है, तैयार करनी है। किसान को बीज खरीदते वक्त महंगा मिलता है और बिकवाली के समय उसे कम कीमत मिलती है। दिसंबर 2010 में  Competition Commission ने एशिया की सबसे बड़ी प्याज मंडी लासलगांव APMC की जांच की तो पता चला कि उस महीने में बिका 20% प्याज नासिक के एक ही फर्म का था। जमाखोरी रॉकेट साइंस नहीं है। किसानों से सस्ता खरीद कर, कुछ महीने फसल को गोदाम में बंद रखने भर से लाखों करोड़ों के मुनाफे का पुराना कारोबार है, जिसे अब सरकार ने वैध घोषित कर दिया है।

सरकार एग्रीकल्चर सप्लाई चेन में बड़े बिजनेस घरानों की मोनोपोली तैयार कर रही है। किसान ये लड़ाई देश के गरीबों के लिए लड़ रहे हैं, क्योंकि उन्हें लग रहा है कि इन नए कानूनों से देश की फूड सिक्योरिटी खतरे में आ गई है, और गरीबों के लिए जिंदा रहने भर के लिए अनाज, फल या सब्जी खरीदना भी मुश्किल होने वाला है।

http://sh028.global.temp.domains/~hastagkh/msp-why-the-government-does-not-want-statutory-provision-for-it/
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