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हिन्दी सिनेमा में प्यार के गीत(lovesong)

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हिन्दी सिनेमा में प्यार के गीत(lovesong)

lovesong
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प्यार का शायद ऐसा कोई कोना नहीं, जिसे हिन्दी सिनेमा ने छुआ नहीं है, फिर भी कुछ गीत ऐसे हैं जिन्हें उतनी सराहना नहीं मिली, जितनी मिलनी चाहिए थी।  ये वो गाने हैं, जो टॉप 10 या टॉ25 सांग्स की लिस्ट में शायद शुमार नहीं होंगे, लेकिन इनके बारे में बहुत कुछ ऐसा है जो शायद आपको जानना चाहिए। इस सीरिज में सबसे पहले बात गुरुदत्त के फिल्म प्यासा के गाने की…

आज सजन मोहे अंग लगा लो(lovesong)

1957 सिनेमा के इतिहास का सबसे सुनहरा साल.. .मदर इंडिया, नया दौर, दो आंखें बारह हाथ का साल, हॉलीवुड में  David Leanलेकर आते हैं The Bridge on the River Kwai और गुरुदत्त ले कर आते हैं प्यासा। इस गाने के बोल सुनिए….यकीन करना मुश्किल है कि उस जमाने में जब सारे डायलॉग उर्दू में होते थे, तब इतनी शुद्ध हिन्दी में ये गाना लिखा साहिर लुधियानवी ने।

आज सजन मोहे…प्यार के पहले एहसास का गाना है …जब गुलाबो को एहसास होता है कि उसे विजय से प्यार हो गया है। वो विजय… जो ये जानते हुए भी कि गुलाबो एक तवायफ है, उससे इज्जत से पेश आता है, और उसे पुलिसवाले से ये कह कर बचाता है कि ये मेरी पत्नी है। एक तवायफ को शायर से इश्क हो गया है। ये इश्क कैसा है? ये प्रेम का सर्वोच्च शिखर है, जहां प्रेम…जिस्मानी न रह कर रूहानी हो जाता है,  अब हसरत हासिल करने की नहीं.. अपना सब कुछ खो देने की है, सर्वस्व न्योछावर करने की है। प्रेम भक्ति में तब्दील हो गया है…ये बताने के लिए गुरुदत्त बंगाल के भक्ति गीत बाऊल की परंपरा से जुड़ते हैं और गीत शुरू होता है   

सखी री बिरहा के दुखड़े सह सह कर जब राधे बेसुध हो ली

तो इक दिन अपने मनमोहन से जा कर यूँ बोली

आज सजन मोहे अंग लगा लो

आज सजन मोहे अंग लगालो

जनम सफ़ल हो जाये

हृदय की पीड़ा देह की अग्नि

सब शीतल हो जाये

हिन्दी सिनेमा में प्रतीकों के  सबसे बड़े जादूगर गुरुदत्त इस गाने के लिए सीढ़ी का इस्तेमाल करते हैं। एक तवायफ जिसके पास अपना कहने को कुछ नहीं है, शरीर भी नहीं…ये प्रेम उसे हासिल हो गया तो उसे समाज में इज्जत हासिल होगी…ये दिखाने के लिए गुरुदत्त गुलाबो को सीढ़ी पर ऊपर की ओर जाते हुए दिखाते हैं

कई जुग से हैं जागे

मोरे नैन अभागे) \२

कहीं जिया नहीं लागे बिन तोरे

सुख देखे नहीं आगे \२

दुःख पीछे पीछे भागे

जग सूना सूना लागे बिन तोरे

प्रेम सुधा, मोरे साँवरिया, साँवरिया

प्रेम सुधा इतनी बरसा दो जग जल थल हो जाये

छत पर पहुंच कर गुलाबो विजय को देखती है …ये भाव कुछ ऐसा है जैसे मानो भक्त को भगवान मिल गए हैं… बाऊल गीत में राधा और कृष्ण का अमर प्रेम … और बंद आंखों से प्रेम का साक्षात्कार करती गुलाबो

मोहे अपना बनालो मेरी बाँह पकड़

मैं हूँ जनम जनम की दासी

मेरी प्यास बुझा दो मनहर गिरिधर, प्यास बुझा दो

मैं हूँ अन्तर्घट तक प्यासी

अब तक ये माना जाता रहा है कि प्रेम का सर्वोच्च है अपना अस्तित्व खो देना, उसमें लीन हो जाना…गुरूदत्त प्रेम की तलाश इसके आगे जा कर करते हैं। खुद को खोकर गुलाबो जब विजय के करीब पहुंच जाती है, और अपना चेहरा विजय के पीठ के करीब ले जाती है, तब एकाएक उसे एहसास होता है कि वो इस प्यार के काबिल नहीं है, उसे अपने हीन होने का एहसास होता है..और वो थम जाती है, रुक जाती है। गुरु ये कहना चाहते थे कि प्रेम में जितनी ज्यादा गहराई होगी, उसके सामने अपनी हीनता का एहसास उतना ही ज्यादा होगा।

इस सीरीज में आगे जिन दो गानों की चर्चा होगी वे हैं

  1. काली घोड़ी द्वार खड़ी – चश्मेबद्दूर
  2. झुकी-झुकी सी नजर – अर्थ

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