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बदले का फॉर्मूला: हिट था, हिट रहेगा…!

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बदले का फॉर्मूला: हिट था, हिट रहेगा…!

mirzapur: the story of revenge
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क्या आप किसी ऐसी सीरीज़ का नाम बता सकते हैं, जिसके दूसरे सीज़न को पहले के मुकाबले ज़्यादा सराहा गया हो..? क्या पहली नज़र वाला प्यार- फर्स्ट इंप्रेशन की अमिटता इसकी वजह है..? या फिर ये मनोविज्ञान में ह्रासमान प्रतिफल- Law of Diminishing Returns जैसे किसी सिद्धांत के चलते हैं..? क्या हो गया अगर आपको मिर्ज़ापुर (Mirzapur) का ये सीज़न देखते हुए गॉडफादर की याद आई…?

इलाकाई समीकरण जैसे हैं, वैसे नहीं दिखाए गए…तो भी क्या फ़र्क पड़ता है..? प्लॉट का अंदाज़ा आपने पहले ही लगा लिया, इसका मतलब ये भी तो हो सकता है कि आपने ही ज़रूरत से ज़्यादा बदले की थीम वाला सिनेमा चाट डाला हो..। क्या ये सच नहीं कि हिंदी के दर्शकों को इतनी ऑरिजिनेलिटी भी दुर्लभ ही नसीब होती है..? वैसे दुनिया का कोई भी सिनेमा सौ फीसदी मौलिक होने का दावा कर सकता है..? क्या हर सिनेमा, बल्कि गल्प की हर विधा, बार-बार सिर्फ प्यार और बदले की ही कहानियां नहीं परोसती आई है..? तो दोहराव क्यों ना हो..? और अभी से ही क्यों..?

रामायण और महाभारत से लेकर ग्रीक दुखांत कहानियों तक…ट्रॉय की जंग और होमर की इलियाड से लेकर शेक्सपीयर के हेमलेट और अमिताभ बच्चन की फिल्मों तक…इंतकाम की कहानियों से इंसानियत का मन ही नहीं भरता..। मिर्ज़ापुर (Mirzapur) के इस सीज़न में भी दोनों दुश्मनों की गर्दन एक साथ दाबने का मौका मिलने के बाद चेहरे पर जिस मसर्रत के साथ नायक कहता है- “कसम से, मज़ा बड़ा आया…!” आखिरी एपिसोड में नायक घर बसाने के रास्ते तक को छोड़कर बदला लेने चल पड़ता है…।

सवाल ये है कि प्रतिशोध में ऐसा क्या सुख है…? ऐसा सुख, जिसके बारे में कहा जाता है कि जितनी देर से मिले, उतना ही मीठा..। Revenge is the dish best served cold..! स्विस वैज्ञानिकों की एक रिसर्च में पाया गया कि जब हम किसी से प्रतिशोध की कल्पना भी कर रहे होते हैं तो उस वक्त दिमाग का वही हिस्सा सक्रिय होता है जो हमें इनाम मिलते वक्त होता है…। यानी साफ है कि कुदरत भी बदले जैसे विध्वसंक बर्ताव को प्रोत्साहित करती है..। भला ऐसा क्यों..?

मानव क्रम-विकास के जानकार मानते हैं कि प्रतिकार का भय लोगों को एक दूसरे के विनाश से रोके रखने में मदद करता है और इसके चलते बतौर प्रजाति हमारे बने रहने की संभावना बढ़ती है..। अगर लोग जानते हैं कि आप पलटवार कर सकते हैं तो आपको नुकसान पहुंचने की आशंका भी कम होगी…। लियोनार्डो डि केपरियो की ऑस्कर-विजेता फिल्म रेवनेंट में नायक को बदले की भावना ही ज़िंदा रखती है..।

एक चांटे के बदले दूसरा गाल भी आगे कर देना, सुनने में अच्छा लगे, लेकिन आदिम समाज में आपके लिए ज़िंदा रहना मुश्किल बना देगा..। बौद्धिक समाज में ऐसा करना एक दूसरी तरह का बदला होगा, जो मारने वाले को नीचा दिखाएगा, इसलिए वहां ये चल जाएगा…लेकिन एक बदले की ही तरह..। बौद्ध और जैन, इस्लाम के सूफी और हिंदुओं के कुछ फ़लसफ़ों के अलावा ज़्यादातर धर्मों ने भी प्रतिशोध की वकालत ही की है..।

लोकतंत्रों में सत्ता संतुलन भी बदले की सियासत पर टिके होते हैं..। आप एक सोच से बदला लेने के लिए दूसरी को चुनते हैं..। क्रांतियां शोषण से बदला लेने के लिए होती हैं..। मैं इसे दुर्भाग्य ही समझता हूं लेकिन तरक्की के तमाम लबादों के भीतर भी हम अभी इतने बर्बर हैं कि बग़ैर बदला लिए ना तो हमारी सियासत चल सकती है, ना हमारे कानून…। क्या ये हैरान करने वाली सच्चाई नहीं कि दुनिया में ज़्यादातर अपराध जिस मनोभाव पर टिके हैं, आपकी व्यवस्था को टिकाए रखने वाला भी वही भाव है..?

लेकिन कोई चीज़ ज़रूरी है, इसका मतलब ये नहीं कि वांछनीय भी है…। बदले का ज़ज़्बात भी है तो अपने घावों को कुरेद-कुरेद कर हरा रखने की हिंसा ही..। ऐसी हिंसा जो इंसान को कभी उसकी संभावना हासिल करने ही नहीं देती..। मेरी राय में हम ऐसे समाज की कल्पना कर सकते हैं जिसमें बदले की जगह ना हो..। इसके लिए दो नामुमकिन सी लगने वाली परिस्थितियां चाहिएं- निजी संपत्ति की अवधारणा को जड़ से ख़त्म किया जाए और पैसे जैसी कोई चीज़ दुनिया में ना रहे..। लेकिन अगर आप मार्क्सवादी हैं तो ऐसी परिस्थितियां भी बुर्जुआ तबके से हिसाब चुकता किए बिना नहीं आने वालीं..।

कुल मिलाकर बदले की कहानियां अगर सही अंदाज़ में कही जाएंगी तो बिकती रहेंगी..। आखिर में फ्रेंक सिनात्रा की एक सलाह – “अगली बार जब बदले की भावना के काले तंतु आपकी आत्मा को जकड़ने लगें, तो आप उनकी शिद्दत को काबू में करें और अपनी ताकत कामयाब होने में लगाएं…। सफलता से बड़ा प्रतिशोध कोई नहीं..!

साभार: अवर्ण दीपक, युवा पत्रकार एवं लेखक

Shailendra

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