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nitish:बिहार में शराबबंदी क्यों लागू हुई ?

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nitish:बिहार में शराबबंदी क्यों लागू हुई ?

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1952 में सी राजगोपालाचारी ने मद्रास में शराबबंदी लागू की थी, 1994 में एनटी रामाराव ने आंध्रप्रदेश में इसे लागू  किया। दो साल बाद 1996 में बंसी लाल ने हरियाणा में शराबबंदी लागू किया। बिहार में अप्रैल 2016 में शराबबंदी का कानून आया। बिहार सरकार का दावा है और ये काफी हद तक सही भी है कि शराबबंदी कानून के बाद राज्य में घरेलू हिंसा की घटनाओं में कमी आई है। महिलाओं के लिए सड़कें ज्यादा महफूज हो गई हैं।   पहले बड़ी तादाद में गरीब मांओं के पास न बच्चों की किताबें खरीदने के लिए हाथ में पैसे रहते थे, न अनाज य दवा खरीदने के लिए। बच्चे, अपनी मां को शऱाबी पिता के हाथों पिटते देख कर बड़े हो रहे थे। अब कई घरों में सारा परिवार साथ में खाना खाने लगा है। बाप बच्चों से पढ़ाई के बारे में पूछने लगे हैं। ये बड़ा बदलाव है जो शराबबंदी लेकर आया है। लेकिन क्या इन्हीं वजहों से बिहार में शराबबंदी लाई गई थी?

इसके पीछे एक कहानी है, जो करीब-करीब इमरजेंसी के साथ शुरू होती है।

इमरजेंसी के बाद जब जनता पार्ट की सरकार आई, तब प्रधानमंत्री के आह्वान पर जिन राज्यों ने ऐच्छिक तौर पर अपने यहां शराबबंदी लागू की, उनमें बिहार भी शामिल था। शराब तब बिहार में बड़ा कारोबार था। एक समुदाय विशेष के कुछ घरानों का इस कारोबार में पूरा नियंत्रण था। दो साल बाद केंद्र में कांग्रेस की सरकार आते ही शराबबंदी बिहार में खत्म हो गई। जायसवाल और साहू परिवारों का एक बार फिर वर्चस्व कायम हो गया। ये बड़ी कमाई और बड़े रसूख का कारोबार था, जिस पर नियंत्रण की ख्वाहिश हर सरकार रखती थी, लेकिन इन परिवारों के सियासी कनेक्शन की वजह से इन पर लगाम लगा पाना किसी सरकार के लिए मुमकिन नहीं हुआ। लेकिन 1989 के बाद लालू प्रसाद के उदय के साथ अगले दस सालों में ये कारोबार पूरी तरह से बदल गया। नेताओं को इस कारोबार में बड़ी कमाई की गंध लग चुकी थी। अब खुरचन से उन्हें तसल्ली न थी, उन्हें मलाई चाहिए थी। धीरे-धीरे एक बिल्कुल नया तबका सामने आया, जिसका शराब के कारोबार से पहले कोई रिश्ता नहीं रहा था, लेकिन जिनका बड़ा सियासी रसूख था। इस तरह शराब का कारोबार परंपरागत कारोबारियों के हाथ से निकल कर धीरे-धीरे सियासी रसूख वाले दबंगों के हाथ में आने लगा। 1995आते-आते नए कारोबारियों ने कमोबेश पूरी तरह से पुराने कारोबारियों को इस कारोबार से बाहर कर दिया। 2000 में झारखंड बनने के बाद ये हुआ कि झारखंड का कारोबार तो पुराने कारोबारियों के पास रह गया, लेकिन शेष बिहार का शराब कारोबार पूरी तरह से नए कारोबारियों के हाथ आ गया। या आप यूं भी कह सकते हैं कि बिहार में शराब का कारोबार आरजेडी के पास था जबकि झारखंड में कांग्रेस के पास।

 इस कारोबार का एक बहुत बड़ा हिस्सा अवैध शराब के कारोबार का था, जिसके बारे में कम ही लोग जानते हैं। दरअसल बिहार अवैध  शराब का बहुत बड़ा कंज्यूमर तो था ही साथ ही बंगाल और नार्थ ईस्ट में डिस्टीलरी न होने की वजह से वहां अवैध शराब भेजने का ट्रांजिट प्वाइंट भी था। एक्साइज, पुलिस और स्थानीय दबंगों का नेटवर्क बड़ी सफाई से यूपी की डिस्टीलरी से डिनेचर्ड स्पिरिट यानी इंडस्ट्री में काम आने वाले अल्कोहल के नाम पर ईथाइल अल्कोहल यानी असली शराब को टैंकर में भरता था और बंगाल जाने के बजाय इसे बिहार में ही उतार लिया जाता था, जहां इससे अवैध देसी शराब बनाई जाती थी। कई बार एक्साइड डिपार्टमेंट की दबिश के डर से डीनेचर्ड ईथाइल या मिथाइल अल्कोहल ही टैंकर से उतार लिया जाता था। इस अल्कोहल में क्रोटोनल डिहाइड या एसीटोन मिला कर इसे जहरीला बनाया गया होता था। ये इनसान के इस्तेमाल के लिए नहीं था, ये बताने के लिए इसे मिथाइल औरेंज या मिथीलीन ब्लू से रंगीन बनाया जाता था। अवैध शराब के तस्कर इसे रिफाइन नहीं कर पाते थे, नतीजा इसे पीने वालों की मौत हो जाती थी। एक्साइज के दिखावटी छापे, पुलिस की नकली कार्रवाइयां, साल दर साल कई गरीबों की जहरीली शराब पीने से हुई मौत के बीच कई हजार करोड़ सालाना का ये कारोबार फलता-फूलता रहा।

ये कारोबार दो नजरिए से सरकार और सत्ताधारी पार्टी के लिए बेहद अहम था

  1. इलेक्शन फन्डिंग के लिए ये सबसे आसान और शायद सबसे बड़ा जरिया था
  2. इस कारोबार में लगे लोग कारोबारी अब बने थे, मूलत: वो दबंग थे, लिहाजा चुनाव में वोट मैनेज करने की इनकी ताकत की किसी तरह अनदेखी नहीं की जा सकती थी

 कहते हैं आरजेडी की इलेक्शन फन्डिंग का बहुत बड़ा हिस्सा इसी कारोबार से आता था। 2005 में जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने तो उनकी नजर इस कारोबार पर पड़ी। 2006 में नीतीश सरकार ने हर पंचायत में शराब दुकान खोलने की नीति लागू की । उम्मीद थी कि कारोबार को बढ़ावा मिलेगा तो हर किसी को फायदा होगा। लेकिन बीते कई सालों में बना ये नेटवर्क इतना मजबूत था कि इसे किसी नए आका की न जरूरत थी, न इसे किसी का डर था। तो हुआ ये कि  न उम्मीद के मुताबिक सरकार और सत्ताधारी पार्टी को फन्डिंग मिल रही थी, न इनकी दबंगई खत्म हो रही थी। राजनीति, रसूख और रिश्वत की ये अंतर्कथा, महिलाओं के सम्मान के महान मकसद की बड़ी गाथा के साथ खत्म  हुई।

नवंबर 2015 में नीतीश कुमार ने शराबबंदी का ऐलान किया। ये कानून अप्रैल 2016 में लागू हुआ।

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