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Nitish: अद्भुत से हेतु-हेतुमदभूत!

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Nitish: अद्भुत से हेतु-हेतुमदभूत!

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बीजेपी की वजह से आपकी (Nitish) सीटें 40 पार गई हैं

यदि चिराग न होते तो भी आपकी सीट कम ही आनी थी

यदि काम किया होता तो जनता ने हराया न होता

जिसे राजनीति में हार की वजह तलाशना कहते हैं, वो व्याकरण में हेतु-हेतुमदभूत काल कहलाता है।

सातवीं बार मुख्यमंत्री बने नीतीश कुमार को  इत्मीनान है कि अंत भला तो सब भला.. चाहे जितनी घनघोर बेइज्जती हो… मुख्यमंत्री  की कुरसी पाना उनका लक्ष्य था …जो बीजेपी की मेहरबानी से पूरा हो गया …बीजेपी नहीं मानती तो वो तेजस्वी के पैरों पर गिर जाते ….

भगवान राम के बनवास जाने पर बिलखते भरत को सांत्वना देते वशिष्ठ जी कहते हैं

सुनहु भरत भावी प्रबल

बिलखि कहेहुं मुनिनाथ  

हानि, लाभ, जीवन-मरण

यश अपयश विधि हाथ

( अयोध्या कांड -रामचरितमानस)

‘आखिरी चुनाव’ के बाद  नीतीश को ब्रह्मज्ञान हो गया है.. अब वो हानि-लाभ, यश-अपयश के बारे में नहीं सोचते …पार्टी की सीटों की संख्या कम हो गई… कोई बात नहीं, मुख्यमंत्री पद पर वो रबर स्टांप की तरह रहेंगे, कोई फर्क नहीं पड़ता, उनकी राजनीति में कुरसी भावना है, आत्मसम्मान संभावना …भावना है तो जिंदगी है… संभावना की तलाश की जाती है।

लेकिन एक दर्द है नीतीश कुमार का, जो वो किसी को बता भी नहीं सकते। दर्द ये नहीं कि-   

  1. उनकी पार्टी जेडीयू विधायकों की तादाद के मामले में बिहार की तीसरे नंबर की पार्टी हो गई
  2. गठबंधन की जूनियर पार्टनर बीजेपी महाराष्ट्र की तरह बिहार में भी सीनियर पार्टनर बन गई
  3. बीते बीस साल में जब भी उनकी सरकार रही, इसे नीतीश सरकार ही कहा गया, इस बार इसे बीजेपी सरकार कहा जाएगा जिसमें कहने भर के लिए सजावटी  मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं

नीतीश कुमार को जिस एक चीज से सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है, सबसे गहरी चोट पहुंची है,  वो ये कि इस चुनाव ने उनकी तीस साल की मेहनत पर पानी फेर दिया, सालों की मेहनत से बनाए, सारे समीकरण तोड़ दिए। कुरसी पर बने रहने के लिए कुरसी कुमार ने  चार समीकरण बनाए थे- 1- हम यानी हिन्दू-मुस्लिम  2- ईबीसी – गैरयादव ओबीसी जातियों का गठबंधन, जिसमें पहले कुशवाहा गए और जिन्हें साधने के लिए नीतीश ने दागी मेवालाल चौधरी को मंत्री बनाया है 3- महादलित ….4—महिला वोटर  

अब ये सारे समीकरण ध्वस्त हो चुके हैं, बेतिया से कटिहार तक जो कुछ बचा है वो एनडीए का है, बीजेपी का है…अगर जेडीयू का कुछ बचा है तो बस उतना ही जितना चुटकी भर प्रसाद पुजारी भक्त को देता है… माथे पर लगा लो या अंजुरी में पी लो, जैसी तुम्हारी श्रद्धा

सारी जिन्दगी सेकुलर वाली राजनीति की, अब एनडीए के 125 विधायकों में एक भी मुस्लिम नहीं, 1952 से अब तक बिहार में पहली बार, राज्य की सबसे बड़े समुदाय मुसलमानों का कोई नुमाइंदा नहीं… जेडीयू के सभी 11 मुस्लिम कैंडिडेट जनता ने रिजेक्ट कर दिए…1970 के दशक में कर्पूरी ठाकुर समता पार्टी के संस्थापकों में से थे, इसी समता पार्टी से 1999 में जेडीयू निकली। अब लेफ्ट से लेकर बीएसपी के पास मुस्लिम विधायक हैं, लेकिन जेडीयू के पास नहीं। बीजेपी ने मुख्यमंत्री बनाकर नीतीश और जेडीयू का भविष्य ही निगल लिया।

2015 से 17 के बीच नीतीश गहरे दबाव में थे, स्वास्थ्य हो या सड़क, हर ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए लालू की मंजूरी जरूरी होती थी, अब… भूपेंद्र यादव और नित्यानंद राय हैं …

सतीश प्रसाद सिंह पांच दिन बिहार के सीएम रहे, दीप नारायण सिंह 18 दिन ..बी पी मंडल 50 दिन, कर्पूरी ठाकुर 1 साल 99 दिन, श्री कृष्ण सिंह 8 साल 10 महीने 2 दिन …नीतीश गिन रहे हैं…कितने पूरे हुए, कितने बचे ….

सियासत में एक दिन ऐसा आता है जब एक नेता के पास सिवाय पदनाम के कुछ नहीं रह जाता, वो वर्तमान का होकर भी सिर्फ अतीत का रह जाता है, उसका होना, उसके नहीं होने से भी कम प्रासंगिक हो जाता है, वो एक दिन नीतीश कुमार बन जाता है

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