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गुस्सा तो बहुत आता है….!!!!

राजनीति संपादकीय

गुस्सा तो बहुत आता है….!!!!

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politics on migrant workers

बात उसी खबर की, जिसने पूरे देश की मीडिया, राजनीति और सामाजिक चिंतन को झकझोर रखा है। लाखों मजदूर पैदल चले आ रहे हैं, भूख-प्यास से बेहाल हैं और सरकार इनकी खबर नहीं ले रही। इस खबर में अपडेट कुछ नहीं है, वो चलते आ रहे हैं, और उनकी परेशानियों की तस्वीरें छपती-दिखती जा रही हैं। विपक्ष सरकार पर दोष मढ़ रहा है, और सरकार (केन्द्र और राज्य दोनों) इसे सस्ती राजनीति करार देकर अपना पल्ला झाड़ रही है। पत्रकार और प्रबुद्ध वर्ग, बौद्धिक जुगाली में व्यस्त है। उपायों पर ना तो कोई बात कर रहा है और ना ही काम। सभी संवेदना दिखाने-बेचने-छपवाने के खेल में लगे हैं।

उदाहरण के लिए, कई दिनों से लगातार हो रहे मजदूरों के पलायन के दौरान पहली बार कांग्रेस नेता राहुल गांधी को मजदूरों का ख्याल आया और शनिवार को उन्होंने दिल्ली में प्रवासी श्रमिकों से मुलाकात करके उनका हाल-चाल जाना। पांच दिनों से लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आर्थिक उपायों की घोषणा करनेवाली वित्त मंत्री ने इसे ड्रामेबाजी करार दिया। टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर सारा दिन ये मुद्दा छाया रहा और पक्ष-विपक्ष में कमेंट चलते रहे। इनमें लोग या तो विपक्ष की तरफदारी करते रहे या सरकार की, लेकिन मजदूरों की तरफदारी किसी ने नहीं की। ये नौटंकी नहीं तो क्या है?

सरकार से पूछे जाने चाहिए ये सवाल

  • जब प्रेस कॉन्फ्रेंस चल रही थी, तो किसी ने वित्त मंत्री से ये क्यों नहीं पूछा कि अगर रेल मंत्रालय भाड़े का 85 फीसदी दे ही रहा है, तो 100 फीसदी क्यों नहीं दे सकता?
  • करोड़ों के आर्थिक पैकेज के दौरान अगर केन्द्र सरकार ये भी ऐलान कर दे कि घर लौट रहे मजदूरों से कोई टिकट नहीं लिया जाएगा, तो इसमें क्या हर्ज है?
  • क्या इस एक कदम से मजदूरों ही हिम्मत नहीं बढ़ेगी, और वो पैदल निकलना छोड़ स्टेशनों का रुख करेंगे?
  • टिकट का 15 फीसदी अगर राज्य सरकारों को चुकाना है, तो मजदूरों को 800-1000 रुपये का टिकट लेना क्यों पड़ रहा है? क्या इसके लिए रेल मंत्रालय, केन्द्र या राज्य सरकारें जिम्मेदार नहीं है? क्या इनमें से कोई भी इनकी टिकटों की व्यवस्था नहीं कर सकता?
  • राज्यों में पहुंचने के बाद भी मजदूरों को बसों, गाड़ियों के लिए परेशानी उठानी पड़ रही है, दो से तीन गुना भाड़ा चुकाना पड़ रहा है। क्या इसके लिए भी केन्द्र सरकार जिम्मेदार है?

अब जरा विपक्षी दलों की बात करें। कांग्रेस नेता राहुल गांधी को इतने दिनों बाद ख्याल आया कि मजदूर पैदल चल रहे हैं। जबकि इस दौरान कई मजदूर रास्ते में, रेलवे ट्रैक पर मर-खप गये, कई साइकिलों से, रिक्शे और पैदल भी 1000-1500 किलोमीटर का सफर तय कर घर पहुंचे गये। लेकिन विपक्ष के सबसे बड़े नेता को अब जाकर याद आया कि मजदूरों का हाल-चाल जानना चाहिए।

राहुल गांधी ने प्रवासी मजदूरों का जाना हाल-चाल

 विपक्ष से भी पूछे जाने चाहिए कुछ सवाल

  • मजदूरों के साथ बैठकर फोटो खिंचवाने के बजाय क्या ये बेहतर नहीं होता कि राहुल गांधी की तस्वीर उनकी मदद करते हुए खींची जाती?
  • कांग्रेस के नेता के तौर पर आपने कितने मजदूरों के लिए खाने-पीने के पैकेट, राशन या पानी की बोतल बांटी?
  • कांग्रेस नेताओं की ऐसी तस्वीरें मीडिया में क्यों नहीं आ रही, जहां ये लोगों की मदद करते दिख रहे हैं?
  • चलिए माना कि यूपी में बीजेपी आपकी बसों को चलने की अनुमति नहीं दे रही, लेकिन कांग्रेस ने पंजाब, महाराष्ट्र, राजस्थान में कितनी बसें मुहैया कराई हैं? क्या वहां मजदूर पैदल नहीं चल रहे?
  • राहुल गांधी ने मोदी सरकार से आग्रह किया कि वह आर्थिक पैकेज पर पुनर्विचार करें और लोगों के खातों में सीधे पैसे डालें क्योंकि इस वक्त उन्हें कर्ज की नहीं, बल्कि सीधी आर्थिक मदद की जरूरत है।
  • आपकी मांग बिल्कुल जायज है, लेकिन जुबानी तीर के बजाय आपने एक मिसाल क्यों नहीं पेश की? कांग्रेस शासित राज्यों में किसने 100-200 लोगों के भी खाते में पैसे डाले?
  • आपकी पार्टी ने अपने खर्च पर कितने लोगों की मदद की, कितने लोगों के हाथ में पैसे दिये? अगर दर्द है और सामर्थ्य भी, तो आप खुद आगे क्यों नहीं आ रहे?
  • कांग्रेस के पार्टी फंड में करोड़ों रुपये है, आपके खाते में काफी पैसे हैं, प्रियंका बढेरा भी संपन्न बिजनेस फैमिली से जुड़ी हैं, फिर भी आपकी तरफ से एक पैसे की मदद की खबर क्यों नहीं आई?
  • आपकी पार्टी के दो-चार नेता भी अपनी जेबें ढीली करें, तो 5 करोड़ निकल आएंगे और हजार रुपये के हिसाब से 50 हजार मजदूरों की मदद हो जाएगी। क्या किसी पार्टी ने ऐसा सोचा या ऐसा कोई कदम उठाया?
  • भला कौन सी ऐसी पार्टी है जिसमें घोटालेबाज करोड़पति नेता ना हो? लेकिन देश का पैसा खानेवाले इन नेताओं के मन में उसका थोड़ा सा हिस्सा भी लौटाने का ख्याल आया?
  • ऐसी खबरें मीडिया में क्यों नहीं छप रही जहां दलितों, गरीबों के नेता मायावती, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, वृंदा करात आदि प्रवासी मजदूरों की मदद के लिए सड़कों पर आए, उनको खाना खिलाया, या उनके लिए सरकार की लाठियां खाईं?
  • क्या ये बेहतर नहीं होता कि योगी सरकार को ट्वीट भेजने के बजाए प्रियंका गांधी अपनी 1000 बसों के साथ सड़क पर आ जातीं, और जनता देखती कि आप जनहित में डंडा खाने को तैयार हैं?
  • अगर आज चुनाव की घोषणा हो, सभी दलों में करोड़पति विधायकों, सांसदों और उम्मीदवारों की लाइन लग जाएगी, लेकिन क्या इनमें से किसी के बारे में कोई खबर छपी है, जिसमें उन्होंने अपनी संपत्ति का 10 फीसदी भी कोरोना के दौरान जनसेवा में लगाया हो?
  • आज रोजाना अखबारों में ऐसी खबरें छपती हैं, जिसमें पुलिस अधिकारियों, स्थानीय लोगों, स्वयंसेवी संस्थाओं ने लोगों में खाने के पैकेट बांटे, पैसे दिये, मदद की। लेकिन क्या आपके इलाके के विधायक, सांसद या जनप्रतिनिधि ऐसा करते दिख रहे हैं?  
  • क्या ये शर्मनाक नहीं कि आम जनता सड़कों पर उतरकर लोगों की मदद कर रही है, लेकिन उनके नुमाइंदे अपने घरों में बैठे सरकार और उसकी नीतियों को कोसने के सिवा कुछ नहीं कर रहे हैं?
  • क्या नेताओं की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार को कोसना है, कुछ काम करना नहीं? काम और खर्च केवल उस वक्त दिखना चाहिए जब चुनाव हों?

दिक्कत ये है कि हम सभी सिर्फ उम्मीदें करते हैं, काम नहीं। हम सिर्फ सवाल करते हैं, जवाब नहीं ढूंढते। हम दूसरों से सवाल करते हैं, खुद से कभी नहीं। हम दूसरों पर उंगली उठाते हैं, खुद पर कभी नहीं। हम बयान बहादुर हैं, कर्म वीर नहीं। हमें ईमानदार और कर्मठ नेता चाहिए, लेकिन वो कोई और हो, हम नहीं।

चलिए हमारा काम तो फिर भी चल जाएगा, लेकिन जिन्होंने जनता के हित में काम करने की कसम उठा रखी हो, इसे ही अपना धंधा बना रखा हो, वो भी इसे अनदेखा करें और सोचें कि जनता कुछ समझती ही नहीं, तो इससे बड़ी नासमझी क्या होगी? और ये सवाल सिर्फ कांग्रेस के लिए नहीं है, बीजेपी के लिए भी है, वाम दलों के लिए भी है, बीएसपी, एसपी, राजद के लिए भी है। हिन्दुओं के झंडाबरदार आरएसएस और मुस्लिम बोर्ड के लिए भी है, श्री श्री 108 और बाबाओं के लिए भी है। माना सरकार निकम्मी है, लेकिन आप कहां हैं…..आप के काम की खबरें कहां हैं?????

आखिर में,

महफूज सारे बादशाह, वज़ीर और शहज़ादे हैं,

जो बेघर हैं तूफान में…….वो महज़ प्यादे हैं।

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