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प्रतिबंधों के साथ शुरु हुई रथयात्रा

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प्रतिबंधों के साथ शुरु हुई रथयात्रा

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Jagannath yatra started in puri

सुप्रीम कोर्ट की इज़ाजत के बाद ओडिशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा शुरू हो गई है। पुरी में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा देवी को जय-जयकार के बीच गर्भगृह से लाकर रथों में विराजित किया गया। इस मौके पर पुरी शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती और गजपति महाराज दिब्यसिंह देब भी पूजन करने पहुंचे। पूजन के बाद पुरी के गजपति महाराज ने सोने की झाडू से भगवान जगन्नाथ का रथ बुहारा।

2500 साल से ज्यादा पुराने रथयात्रा के इतिहास में पहली बार ऐसा मौका है, जब भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा तो निकल रही है, लेकिन भक्त घरों में कैद हैं। रथयात्रा से पहले पुरी को शटडाउन कर दिया गया था। साथ कोरोना के मद्देनजर, रथ यात्रा के दौरान कर्फ्यू जैसे प्रतिबंध लगाये गये हैं।

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने अपने उस आदेश को वापस ले लिया, जिसमें कोरोना वायरस महामारी के बीच इस वर्ष के उत्सवों को प्रतिबंधित किया गया था। लेकिन भारत के मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने नौ दिवसीय उत्सव के दौरान पुरी में कर्फ्यू लगाने सहित कई शर्तें लगाईं। साथ ही अदालत ने जगन्नाथ मंदिर प्रशासन समिति और ओडिशा सरकार को इन शर्तों का कड़ाई से पालन करने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने क्या रखीं शर्तें?

  •  पुरी में दाखिल होने के सभी रास्ते और एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन, बस अड्डा भी बंद कर दिया जाए।
  • रथ यात्रा के दौरान शहर में कर्फ्यू लगा दिया जाए।
  • मन्दिर के सिर्फ वही सेवादार इन गतिविधियों में शामिल होंगे जो कोरोना नेगेटिव हों।
  • 500 से अधिक लोगों को रथ खींचने की अनुमति नहीं दी जाए।
  • टीवी चैनलों को कवरेज की इजाज़त मिले, ताकि लोग घर से यात्रा देख सकें।
  • ओडिशा सरकार यात्रा में शामिल होने वाले लोगों का पूरा ब्यौरा रखे।

पीठ ने कहा कि अगर यह सुनिश्चित करना संभव है कि भीड़ नहीं होगी, तो हमें कोई कारण नहीं दिखता है कि रथ यात्रा को सुरक्षित रूप से नहीं चलाया जा सके। इससे पहले 18 जून को सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने कहा था, ”यदि हमने इस साल हमने रथ यात्रा की इजाजत दी तो भगवान जगन्नाथ हमें माफ नहीं करेंगे।”

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक रथयात्रा शुरू होने से पहले पुरी के जगन्नाथ मंदिर को सैनिटाइज किया गया। साथ ही रथयात्रा में शामिल होने वाले सभी लोगों का कोरोना टेस्ट कराया गया। इस दौरान जगन्नाथ मंदिर के एक सेवायत का कोरोना टेस्ट पॉजिटिव आया है। उसे रथयात्रा में शामिल होने नहीं दिया गया है।

क्या है परंपरा?

रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा और भाई बलराम के साथ अपनी मौसी के घर जाते हैं। पुरी का गुंडिचा मंदिर भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर माना जाता है। यहां भगवान 7 दिनों तक आराम करते हैं, जिसके बाद वापसी की यात्रा शुरु होती है। ओडिशा में पुरी के अलावा भी कई जगहों पर ऐसी यात्राएं आयोजित की जाती हैं। कोरोना की वजह से अहमदाबाद समेत कई जगहों पर भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा मंदिर परिसर के अंदर ही निकाली जा रही है।

क्या आप जानते हैं?

  • इसकी परंपरा तो 2500 साल पुरानी है, लेकिन ऐतिहासिक तौर पर पुरी में वर्ष 1736 से रथ यात्रा की परंपरा अनवरत चली आ रही है।
  • इस रथ यात्रा के बारे में स्‍कंद पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण और ब्रह्म पुराण में भी बताया गया है।
  • रथयात्रा का शुरुआत ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा से होती है। इसी दिन भगवान जगन्नाथजी का जन्म हुआ था। इस अवसर पर तीनों विग्रहों को 108 कलशों के जल से स्नान कराया जाता है। इसके बाद प्रभु 14 दिनों के एकांतवास पर चले जाते हैं।
  • आषाढ़ शुक्ल की द्वितीया को रथयात्रा निकाली जाती है, जिसमें प्रभु नगर भ्रमण पर निकलते हैं।
  • रथयात्रा की शुरुआत में सबसे पहले बलभद्र जी का रथ निकलता है, इसके बाद सुभद्रा के पद्म रथ की यात्रा शुरू होती है। सबसे अंत में भगवान जगन्नाथ जी के रथ ‘नंदी घोष’ को खींचा जाता है।
  • यात्रा के तीनों रथ लकड़ी के बने होते हैं, जिन्हें श्रद्धालु खींचकर चलाते हैं।
  • भगवान जगन्नाथ का रथ (तीन नाम – गरुड़ध्वज, कपिध्वज, नंदीघोष ) 16 पहियों वाला और 13 मीटर ऊंचा होता है।
  • बलभद्र का रथ (नाम – तालध्वज) 14 पहियों वाला है। इस पर महादेवजी का प्रतीक होता है। इसके रक्षक वासुदेव और सारथी मातलि हैं।
  • सुभद्रा का रथ ( नाम – पद्म रथ, देवदलन) 12 पहियों वाला है। इनके रथ पर देवी दुर्गा का प्रतीक होता है। इसकी रक्षक जयदुर्गा व सारथी अर्जुन हैं।
  • भगवान जगन्नाथ के लिए जगन्नाथ मंदिर में 752 चूल्हों पर खाना बनता है। इसे दुनिया की सबसे बड़ी रसोई का दर्जा हासिल है। रथयात्रा के नौ दिन यहां के चूल्हे ठंडे हो जाते हैं।
  • गुंडिचा मंदिर में भी 752 चूल्हों की ही रसोई है, जो जगन्नाथ की रसोई की ही तरह है। इस उत्सव के दौरान भगवान के लिए भोग यहीं बनेगा।

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