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क्या आपको डॉ.साहिब सिंह वर्मा याद हैं?

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क्या आपको डॉ.साहिब सिंह वर्मा याद हैं?

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Remembering Dr. Sahib singh verma on his death anniversary

आज दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और पत्रकारों के संघर्षों के साथ डॉ. साहिब सिंह वर्मा की पुण्यतिथि है। दिल्ली की कोट पैंट की राजनीति में वे अलग और ग्रामीण भारत के असली प्रतिनिधि थे। दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री चौधरी ब्रह्मप्रकाश के बाद कृषि क्षेत्र के सबसे जानकार और देहात के लोगों के प्रति बेहद उदार थे। पत्रकारों के संघर्षो में भी वे हर मौकों पर खड़े मिलते थे। कोरोना संकट के दौर में वे होते तो यथासंभव सबकी खबर खुद ले रहे होते। और गांव गरीब और मजदूरों के साथ खड़े मिलते।

किसानों, मजदूरों और आम आदमी की राजनीति करने वाले डॉ. साहिब सिंह अपने मन की बात बिना लाग लपेट के कह देते थे। इस स्वभाव ने कई मौकों पर नुकसान पहुंचाया। लेकिन इसी नाते सभी राजनीतिक दलों के नेताओं के बीच वे सम्मन के पात्र थे। इसी ने उनको दिल्ली देहात से राष्ट्रीय कलेवर का नेता बना दिया। अपना ठेठ देहाती अंदाज और सादगी को कभी छोड़ा नहीं और बड़े पदों पर रहने के बाद भी कभी अहंकार का शिकार बने नहीं। वे खेत खलिहान से जीवन भर जुड़े रहे।

दिल्ली ही नहीं, पश्चिमी उ.प्र. हरियाणा, पंजाब और राजस्थान जैसे राज्यों में किसान समुदाय में उनकी अपनी पैठ थी। संसद हो या दिल्ली की सरकार उन्होंने किसानों के लिए हमेशा आवाज बुलंद की। केंद्र में श्रम मंत्री रहने के दौरान उन्होने खास तौर पर मजदूरों के लिए ठोस काम किया। दिल्ली के लिए भी उनका एक सपना था। उनकी कोशिश थी कि समाज के गरीब लोगों को न्याय मिले और शहरी चकाचौंध में अन्नदाता किसान को उचित सम्मान देना न भूला जाये। उनके ही प्रयासों से पहली बार दिल्ली नगर निगम ने देहात पर खास ध्यान देना शुरू किया। छोटे मोटे समारोहों में या आम आदमी के घरों तक दस्तक देने में उनको संकोच नहीं होता था।

उनका जीवन बहुत उतार-चढ़ाव और संघर्षो भरा रहा। दिल्ली हरियाणा सीमा पर बसे सरहदी गांव मुंडका में एक किसान परिवार में 15 मार्च, 1943 को पैदा हुए डा.साहिब सिंह वर्मा 1977 तथा 1983 में दिल्ली नगर निगम के सदस्य बने। 1993 में दिल्ली विधानसभा के चुनाव में वे जीते और दिल्ली सरकार के विकास और शिक्षा मंत्री बने। 26 फरवरी 1996 को दिल्ली का मुख्यमंत्री बने और इस पद पर 12 अक्तूबर 1998 तक रहे। उन्होंने अपने शासन के दौरान दिल्ली नगर निगम को संकट से उबारा। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल से अपनी बात मनवा कर ही रहे।

भारत नहीं, विश्व की सबसे बड़ी संसदीय सीट मानी जानेवाली बाहरी दिल्ली से उन्होंने 1999 में विजय हासिल की और एनडीए सरकार में अटलजी ने उनको 2002 में श्रम मंत्रालय का दायित्व सौंपा। वे शिक्षा से राजनीति में आये थे और हमेशा इस क्षेत्र पर भी ध्यान रखा। भाजपा संगठन में वे राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और कई अहम पदों पर रहे। पंजाब, हिमाचल व चंडीगढ़ मामलों के प्रभारी भी रहे। राजस्थान में गुर्जर आंदोलन के दौरान जब पुलिस ने गुर्जरों पर लाठी चार्ज किया तो अपनी ही सरकार को आड़े हाथ लेने से उन्होंने परहेज नहीं किया।

(लेखक एवं पत्रकार अरविंद कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से साभार)

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