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सोशल मीडिया से सोशल डिस्टेन्सिंग जरूरी

जरुर पढ़ें संपादकीय

सोशल मीडिया से सोशल डिस्टेन्सिंग जरूरी

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कोरोना को लेकर समाज किस तरह प्रतिक्रिया कर रहा है, उसके  सोच की दिशा क्या है, ये जानने का सबसे सही जरिया है सोशल मीडिया। फेसबुक और ट्वीटर सही और जरूरी जानकारी को चंद पलों में ही लोगों तक पहुंचा देते हैं, लेकिन इसके साथ ही इनकी एक ताकत अफवाह को खबर की तरह पेश करने की भी है।

जो गति अफवाह को हासिल है, सच उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता। एक्सपर्ट्स को तथ्यों को समझने, विश्लेषण, मूल्यांकन कर अपनी राय देने में  वक्त लगता है, तब तक अफवाह सोशल मीडिया के जहाज पर मिनटों में महादेशों का सफर तय कर लेते हैं।

मिसाल के तौर पर मुंबई के  कांग्रेस नेता मिलिंद देवड़ा ने सोशल डिस्टेन्सिंग के उल्लंघन को लेकर एक वीडियो पोस्ट किया, बाद में अल्ट न्यूज की तफ्तीश से पता चला कि ये वीडियो मुंबई नहीं पश्चिम बंगाल का था। लेकिन क्योंकि अल्ट न्यूज को कम लोग पढ़ते हैं और मिलिंद के जानने वाले लाखों हैं, नतीजा ये हुआ कि मिलिंद के इस वीडियो को हटाने के बावजूद लोग इसे अपने कमेंट के साथ रिट्वीट करते रहे।

बिहार के मुजफ्फरपुर से अरविना खातून की मौत और उनके मौत से नावाकिफ मासूम का स्टेशन से वीडियो सामने आया। दिल दहला देने वाले इस वीडियो को PIB Fact Check ने “incorrect” और “imaginary” करार दिया।  PIB Bihar ने रेलवे के इस दावे पर यकीन कर लिया कि अरविना पहले से बीमार थी।https://www.altnews.in/fact-checking-pib-fact-check-did-family-of-mother-who-died-in-shramik-train-claim-she-had-long-term-illness/

कोरोना को लेकर लोग डरे हुए हैं। सोशल मीडिया को डर पसंद है। डर सोचने की हमारी ताकत को…फैक्ट चेक करने के लिए जरूरी सब्र को  कम करता है और हमारे पूर्वाग्रह को बढ़ाता है। इससे उनका काम आसान हो जाता है जो समाज को धर्म, जाति या समुदाय के खांचे में देखते हैं।

 वायरस ने हमारी जिन्दगी को ही प्रभावित नहीं किया है, उसने हमारे सोचने के तरीके पर भी असर डाला है। पहले के किसी भी और वक्त के बजाय आज नफरत ज्यादा डिमांड में है।

 हंगरी के पीएम विक्टर ओरबन ने प्रवासियों को कोरोना का कसूरवार करार दिया तो अमेरिकी प्रेसीडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी सरकार की नाकामी छिपाने के लिए इसे चाइनीज वायरस ।

सोशल मीडिया का एल्गोरिथम इस तरह डिजायन किया गया है कि वो अफवाह, झूठ और डर को इन्सेंटिवाइज करता है। सच लाइक भी नहीं होता और अफवाह रिट्वीट हो जाता है।

 नतीजा क्या है?

1.स्केपगोटिंग – किसी को निशाना बनाना, उसे विलेन करार देना

2.डिजीटल विजिलेंटिज्म – सोशल मीडिया पर गुंडा गर्दी, किसी व्यक्ति या राजनैतिक पार्टी के खिलाफ बोलने वालों को धमकाना, गालियां देना

3.नस्ली हमले- यूरोप के सोशल मीडिया में चीन को कोरोना के गुनहगार की तरह पेश किए जाने के बाद इटली से स्पेन तक कई देशों में चीन के लोगों पर नस्ली हमले हुए। अमेरिका में ट्रंप के चीन को कसूरवार ठहराने के बाद एशियाई मूल के लोगों पर नस्ली हमले शुरू हो गए। बाद में मिनेसोटा में पुलिस के हाथों एक अश्वेत की मौत के बाद गोरों और कालों के बीच की खाई और चौड़ी हो गई।

सच के बाद की दुनिया में जीने की कीमत-elijah sad–

पोस्ट ट्रूथ सोसाइटी यानी सच के बाद की दुनिया में …. समाज में WHO, ICMR  या भारत सरकार की ओर से दिए गए तथ्य हार जाते हैं और वर्मा जी और शर्मा जी  का कहा ज्यादा सुना ज्यादा माना जाता है। एक्सपर्ट साइंटिस्ट और सरकार की सामाजिक स्वीकार्यता और लोगों पर उनके कहे का असर कम हो जाता है, क्योंकि उनकी बात सनसनीखेज़ नहीं होती, वो डराती नहीं। पोस्ट ट्रूथ समाज अपने confirmation bias के साथ सूचना को बयानों के जरिए समझना चाहता है। जो तथ्य उसके विचारों से मेल नहीं खाने वाले व्यक्ति या समूह के जरिए उसके पास आता है उसे वो फौरन किनारे कर देता है। 

आज सबसे बड़ी जरुरत डिजीटल लिटरेसी की है। ऐसे वक्त में जबकि हमें सबसे ज्यादा तथ्य और विश्लेषण की जरूरत है, हम सबसे ज्यादा अफवाहों से घिरे हैं।

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