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स्टील के स्लम

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स्टील के स्लम

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प्रवासी मजदूरों को शहरों में सस्ते घर मुहैया कराने के लिए सरकार स्टील से बने एक लाख सस्ते घर की योजना लेकर आई है। सरकार चाहती है कि स्टील इंडस्ट्री steel-intensive, low-cost घर बड़ी तादाद में बनाए जिससे बाकी लोग भी इस तरह के घर बनाने के लिए प्रभावित हों।

मुंबई के स्लम,venkat sidan image-pinterest

स्टील उत्पादन में चीन (996.3mt) के बाद 111.2 mtके साथ भारत दूसरे स्थान पर है। 2018 में finished steel consumption जहां चीन में 590.1 kg और दुनिया का औसत खपत सालाना 224.5 kg है, वहीं भारत में ये महज 73.3 kg है।

देश में स्टील की खपत भी बढ़े और मजदूरों को सस्ते घर भी मिले, इसके लिए सरकार स्टील होम्स की ये योजना लेकर आई है। हमारे इरादे स्टील के हों न हों, हम दुनिया में पहले स्टील के स्लम तैयार करने जा रहे हैं। इससे ऊंची इमारतों में करोड़ों के पेंटहाउस में रहने वालों की आंखों को थोड़ा सकून मिलेगा, जो अपने आशियाने के करीब पॉलिथीन या टीन की गंदी छत वाले मलिन बस्तियों को देख कर आजिज आ गए हैं। गरीबी के गुरु देश में मजदूरों की औलाद अब .. फौलाद तले रहेगी। इससे बेटर की होवे?…मजदूर का नश्वर शरीर… भूख से, इलाज की कमी से प्रवास कर सकता है… , लेकिन जिस घर में उसकी आत्मा का वास होगा, उसे न आग जला सकेगी, न पानी गला पाएगा।

वैसे सरकार चाहे तो आर्किमिडीज की तरह माननीय मंत्री जी के यूरेका मोमेन्ट की जगह उन लोगों की सलाह पर चल सकती है, जिन्हें इस मामले की शायद ज्यादा बेहतर समझ है।

सरकार क्या कर सकती है?

जनवरी 2017 में Partha Mukhopadhyay के नेतृत्व में बने देश के पहले task force on migration की रिपोर्ट को अमल में लाकर शुरूआत की जा सकती है।टास्क फोर्स का सुझाव है कि-

मजदूरों का रजिस्टर बने. Sms के जरिए मजदूर अपना रजिस्ट्रेशन खुद कर सकें।

रजिस्टर्ड मजदूरों को काम की जगह पर PDS यानी सरकारी राशन दुकानों से जोड़ा जाए

उन्हें राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना से जोड़ा जाए

कांट्रैक्ट वर्कर, unorganized workers को ESI- Employees’ State Insurance मिले

मजदूर परिवार के बच्चों को शहरों में आंगनवाड़ी- ICDS-AW और ANM- auxiliary nurse midwives से जोड़ा जाए

तालीम के लिए इन बच्चों को Sarva Shiksha Abhiyan में एनरॉल किया जाए

सॉफ्टवेयर में हमारा देश सबसे आगे है, हमारे यहां शुरू से श्रम मंत्रालय भी रहा है, लेकिन फिर भी जरा सोचिए.. ऐसा क्यों है कि हमारे यहां हर रोज तेजी से तरक्की करते कारोबारियों के इस देश में हर दिन, हफ्ते और महीने बिकने वाली कार का तो ब्योरा है, बेकार का नहीं।  कोरोना काल में प्रवासी मजदूरों की घर वापसी के बाद NDMA -National Disaster Management Authority सहित  27 राज्यों ने मजदूरों को रजिस्टर करने के लिए वेब पोर्टल बनाए। इसके अलावा हमारे पास Shramik Special Trains data भी है। अब इस डाटा को एनालाइज कर पब्लिक डोमेन में लाने की जरूरत है, ताकि इकोनॉमिस्ट इन्हें समझ कर सरकार को वाजिब सलाह दे सकें। 5.6 करोड़ प्रवासी मजदूरों का आखिरी सरकारी डाटा 2011 सेन्शस का है जिसका कुछ हिस्सा  2019 में जारी किया गया, लेकिन इसमें बुनियादी आंकड़े जैसे प्रवासी मजदूर किस संख्या में किस सेक्टर में काम रहे हैं, अब तक जारी नहीं हुआ है। देश के 718 जिलों में से 244 की पहचान प्रवासी मजदूरों के source districts with high-migrant volumes के तौर पर की गई है। उड़ीसा सरकार की तर्ज पर इन जिलों में प्रवासी मजदूरों के लिए  Labour, Education, Women and Child Welfare , Panchayati Raj संस्थाओं के जरिए टारगेटेड स्कीम्स चलाई जा सकती हैं। दिल्ली सरकार की रोजगार बाजार योजना को केंद्र सरकार सारे देश में लागू कर सकती है।

Article 217  और seventh schedule के  ‘list 1’ के तहत “inter-state migration केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है। कोरोना काल में नागरिकों को बार-बार अपनी जिम्मेदारियों की याद दिलाने वाली सरकार अगर चाहे तो एक बार अपनी जिम्मेदारी को लेकर सोचना शुरू कर सकती है।

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