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तालिबान 2.0 – दहशत के साये में धरती और आसमान – अफगानिस्तान … Terrified People of Afghanistan under Taliban 2.0.

क्राइम जरुर पढ़ें दुनिया बड़ी खबर संपादकीय

तालिबान 2.0 – दहशत के साये में धरती और आसमान – अफगानिस्तान … Terrified People of Afghanistan under Taliban 2.0.

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Taliban Kabul Afghanistan Presidential palace

सिसकता काबुलीवाला

मैं कहां जाऊं, क्या करूं। कभी ख्वाबों में भी नहीं सोचा था ये दिन देखने को मिलेगा। आज मैं अपने आपको असहाय महसूस कर रही हूं। मेरे अपने वहां छूट गए पता नहीं उनका क्या हो रहा होगाहम कुछ ही पलों में 20 साल पीछे चले गए… 20 साल पहले मैं पैदा हुई थी, वहीं पर बड़ी हुईमेरा कॉलेज, मेरे दोस्त सब छूट गए…” रुंधा हुआ गला, नम आंखें, कपकपाते हुए होंठ, चेहरे पर भय और आँखों में खौफ़, निराशा से भरा कातर स्वर, इस बात की गवाही दे रहे थे कि 20 साल की ज़ोया किस कदर सहमी हुई है। अफगानिस्तान में तालिबान ने कब्जा कर लिया। वहां के सियासतदान देश छोड़कर भाग गए। ज़ोया भी सबकुछ छोड़कर दिल्ली आई। ये तो महज एक ज़ोया है न जानें कितनी ज़ोया आज अपने और अपने देश के दुर्भाग्य पर रो रही हैं।

मैंने अपनी ज़िंदगी में कभी इतना असहाय, मजबूर और निराश महसूस नहीं किया। मैं जानती हूं कि तालिबान के लोग कैसे हैं। हमारी 20 सालों की मेहनत पलक झपकते ही ख़त्म हो जाएगी। मेरे काफ़ी दोस्त अभी भी अफ़ग़ानिस्तान में हैं जो डरे हुऐ हैं।  भारत में काम कर रही अफ़ग़ानिस्तानी नागरिक ज़ारा भी अपने आंसुओं को रोक न सकी। ज़ारा के आंसुओं में समूचे अफगानिस्‍तान का दर्द छिपा हुआ है।

यह एक ज़ोया ज़ारा  की कहानी नहीं है, हर अफगानी का दिल रो रहा है।  जिंदगी के कुछ साल एक किराए के घर में बिताने के बाद वहां से इतना लगाव हो जाता है कि वहां से निकलने पर भी हम दुःखी हो जाते हैं जबकि आप वहां से अपना सारा सामान और अपनी अच्छी बुरी यादों को लेकर जाते हैं मगर आप इन  अफगानियों की विवशता के बारे में सोचिये जिन्हें सब कुछ छोड़कर बस अपनी जान बचाकर संगीनों के साये में अफगानिस्तान की गलियों से भागना पड़ रहा है। 

Women with their children try to get inside Hamid Karzai International Airport in Kabul, Afghanistan.

भीषण त्रासदी और तबाही के मंज़र 

अफगानिस्तान में तालिबान के संपूर्ण कब्जे के बाद से स्थिति अत्यंत भयावह हो गयी है। अपना देश छोड़ने के लिए काबुल एयरपोर्ट पर लोगों की बहुत बड़ी भीड़ जमा हो गई है। काबुल एयरपोर्ट के बाहर इतनी गाड़ियों का जाम है जैसे लग रहा है कि क़ाबुल की सारी सड़कें एयरपोर्ट की तरफ ही जाती हैं। तालिबान के खौफ से बाहर निकलने को लोग किसी भी तरह बस एक बार फ्लाइट तक पहुंचना चाहते हैं… इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि लोग विमानों में बैठने के लिए ऐसे भाग रहे हैं जैसे कि बसों और ट्रेन के पीछे लोग भागते हैं। ऐसा लग रहा है कि यह एयरपोर्ट न होकर कोई रेलवे स्टेशन या बस अड्डा हो। आज जिस तरह के हृदयविदारक वीडियो सामने आ रहे हैं वो सहमा देने वाले हैं। हम लोग हजारों किलोमीटर दूर बैठकर केवल तस्वीरें देख रहे हैं। मगर दूसरी ओर वो लोग जो वहां इस खौफनाक मंजर में फंसे हुए हैं उनके दिल में क्या बीत रहा होगा वो कोई बता नहीं सकता। जिंदगी बचाने के लिए जिंदगी ही दांव पर लगा रहे हैं। इंटरनेट मीडिया (Internet based social media) पर इस तरह के कई वीडियो भी वायरल हो रहे हैं। वहीं, एक वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि विमान में जगह नही मिलने पर कुछ लोग पहिए पर ही लटक गए। इस घटना में गिरने से कुछ अफगानियों की मौत भी हो गई। 

बदहवास अफगानिस्‍तान… 10 दिन में 20 साल पीछे हो गया, काबुल से आए कुछ वीडियोज आंखें नम कर रहे हैं …. इंसानियत की यह दशा ….21वीं सदी में ऐसा पलायन… , ऐसी अराजक स्थिति न कभी देखी, न और न ही कभी सुनी…कट्टरता की आग में झुलसे अफगानिस्तान में  मानवता दम तोड़ रही है, अमेरिका भाग रहा है , यू एन ओ सोया हुआ है, विश्व खामोश है ! 

Kabul Airport, Afganistan.

तालिबान कौन हैं? ( Who forms the Taliban? )

अफगानिस्तान में लगभग 55% लोग “पश्तो” भाषा बोलते हैं। तालिबान इसी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है – विद्यार्थी। नब्बे के दशक की शुरुआत में जब सोवियत संघ अफ़ग़ानिस्तान से अपने सैनिकों को वापस बुला रहा था, उसी दौर में तालिबान का उदय हुआ। कुख्यात आतंकी रहे मुल्ला उमर ने सितंबर 1994 में कंधार में 50 लड़कों के साथ यह संगठन बनाया था। मुख्यत: पश्तून लोगों का यह आंदोलन सुन्नी इस्लामिक धर्म की शिक्षा देने वाले मदरसों से जुड़े लोगों ने खड़ा किया गया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक उस समय पाकिस्तान स्थित इन मदरसों की फंडिंग सऊदी अरब करता था। इस आंदोलन में सुन्नी इस्लाम की कट्टर मान्यताओं का प्रचार किया जाता था। जल्दी ही तालिबानी अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के बीच फैले पश्तून इलाक़े में शांति और सुरक्षा की स्थापना के साथ-साथ शरिया क़ानून के कट्टरपंथी संस्करण को लागू करने का वादा करने लगे थे। इसी दौरान दक्षिण पश्चिम अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का प्रभाव तेजी से बढ़ा। सितंबर, 1995 में उहोंने ईरान की सीमा से लगे हेरात प्रांत पर कब्ज़ा किया। इसके ठीक एक साल बाद तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी क़ाबुल पर कब्ज़ा जमाया। साल 1998 आते-आते, क़रीब 90 प्रतिशत अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का नियंत्रण हो गया था। सोवियत सैनिकों के जाने के बाद अफ़ग़ानिस्तान के आम लोग मुजाहिदीन की ज्यादतियों और आपसी संघर्ष से ऊब गए थे इसलिए पहले पहल तालिबान का स्वागत किया गया। भ्रष्टाचार पर अंकुश, अराजकता की स्थिति में सुधार, सड़कों का निर्माण और नियंत्रण वाले इलाक़े में कारोबारी ढांचा और सुविधाएं मुहैया कराना- इन कामों के चलते शुरुआत में तालिबानी लोकप्रिय भी हुए। 

लेकिन बाद में तालिबान पर मानवाधिकार के उल्लंघन और सांस्कृतिक दुर्व्यवहार से जुड़े कई आरोप लगने शुरू हो गए थे। इसका एक बदनामी भरा उदाहरण साल 2001 में तब देखने को मिला जब तालिबान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विरोध के बाद भी मध्य अफ़ग़ानिस्तान के बामियान में बुद्ध की प्रतिमा को गोला बारूद से उडा दिया। तालिबानी चरमपंथियों ने अक्टूबर, 2012 को मिंगोरा नगर में अपने स्कूल से घर लौट रही मलाला यूसुफ़ज़ई को गोली मार दी थी। कहा गया कि तालिबानी शासन के अत्याचार पर छद्म नाम से लिखने के चलते 14 साल की मलाला से तालिबानी नाराज़ थे। इस घटना में मलाला बुरी तरह घायल हो गई थीं। इस घटना के दो साल बाद तालिबानी चरमपंथियों ने पेशावर के एक स्कूल पर हमला किया था। उस वक्त पाकिस्तान में नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इन घटनाओं की निंदा हुई थी।

11 सितंबर, 2001 को न्यूयार्क वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले के बाद दुनिया भर का ध्यान तालिबान पर गया। हमले के मुख्य संदिग्ध ओसामा बिन लादेन और अल क़ायदा के लड़ाकों को शरण देने का आरोप तालिबान पर लगा। सात अक्टूबर, 2001 को अमेरिका के नेतृत्व में सैन्य गठबंधन ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला कर दिया और दिसंबर के पहले सप्ताह में तालिबान का शासन ख़त्म हो गया।

Taliban fighters take control of Afghan presidential palace in Kabul, Afghanistan

तालिबान से अफ़ग़ान इतना डर क्यों रहे हैं ?  (Why are Afghanis are so afraid of Taliban?)

खतरनाक रीति नीति वाले तालिबान ने दोबारा अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया है। वहां के लोगों के जेहन में तालिबान की वर्ष 1996 से 2001 के बीच रही हुकूमत की यादें ताजा हैं। तब लोगों को आजादी नसीब नहीं थी। तालिबान आतंकियों का खौफ इतना था कि दूसरे देशों से लोग अफगानिस्तान पहुंचने में कतराते थे। यही वजह है कि जब तालिबान ने राजधानी काबुल पर भी कब्जा कर लिया तो एयरपोर्ट पर लोग टूट पड़े। आइये जानते हैं कि आखिर तालिबान की पिछली हुकूमत में ऐसा क्या था, जिसे याद कर वहां के लोग इस बार जोखिम नहीं उठाना चाहते और मुल्क छोड़कर जाना चाहते हैं…

Taliban’s inhuman treatment to the general public, ladies and kids in Afganistan

पिछली हुकूमत में तालिबान के ये थे नियम (Rules under Taliban 1.0)

  •  महिलाएं सड़कों पर बिना बुर्के के नहीं निकल सकती थीं। उनके साथ किसी पुरुष रिश्तेदार की मौजूदगी जरूरी रहती थी। 
  •  महिलाओं को घरों की बालकनी में निकलने की इजाजत नहीं थी। 
  •  महिलाओं को सड़कों से इमारतों के अंदर न देख सके, इसके लिए ग्राउंड फ्लोर और फर्स्ट फ्लोर की सभी खिड़कियों के शीशों को या तो पेंट कर दिया जाता था या स्क्रीन से ढंक दिया जाता था। 
  •  कोई पुरुष महिलाओं के कदमों की आहट न सुन सके, इसलिए महिलाओं को हाई हील के जूते पहने की इजाजत नहीं थी। 
  •  कोई अजनबी न सुन ले, इसलिए महिलाएं सार्वजनिक तौर पर तेज आवाज में बात नहीं कर सकती थीं। 
  •  वे किसी फिल्म, अखबार या पत्रिकाओं के लिए अपनी तस्वीरें नहीं दे सकती थीं।
  •  उस वक्त ऐसी कई खबरें सामने आई थीं, जिनमें यह कह गया था कि तालिबान के आतंकी घर-घर जाकर 12 से 45 साल उम्र की महिलाओं की सूची तैयार करते थे। इसके बाद ऐसी महिलाओं को आतंकियों से शादी करने के लिए मजबूर किया जाता था। 
  •   दिसंबर 1996 में काबुल में 225 महिलाओं को ड्रेस कोड का पालन नहीं करने पर कोड़े लगाने की सजा सुनाई गई थी।
  •  लड़कियों को स्कूल जाने की इजाजत नहीं थी।
  •  पूरे अफगानिस्तान में संगीत और खेल गतिविधियों पर पाबंदी थी। 
  •  पुरुषों को अपनी दाढ़ी साफ कराने की इजाजत नहीं थी।
  •  आम लोगों को शिकायतें करने का अधिकार नहीं था।

आइये,आपको अफगानिस्तान के वर्तमान और भूतकाल से निकालकर पेंटागन ले चलते हैं जहाँ नजीरा करीमी के प्रश्नों का जॉन कर्बी के पास वैसे ही कोई उत्तर नहीं है जैसे आज विश्व समुदाय के पास अफगानिस्तान के भविष्य का कोई जवाब नहीं है। 

‘कहां हैं राष्ट्रपति गनी?’ ( Where is President Ghani ?)

यह सवाल अफगानिस्तान के हर नागरिक की जुबान पर है और जब अमेरिकी रक्षा विभाग के सामने भी यही सवाल करते हुए अफगान मूल की एक रिपोर्टर रो पड़ी तो एक पल को सब खामोश हो गए।  नजीरा करीमी करीब 20 साल पहले तालिबान के साये से निकलने के लिए अफगानिस्तान छोड़कर आ गई थीं। आज जब पेंटागन प्रवक्ता जॉन कर्बी प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित कर रहे थे तो करीमी अपना दर्द छिपा नहीं सकीं और उन्होंने भी वही सवाल किया कि आखिर राष्ट्रपति गनी कहां है? करीमी ने कहा, ‘मैं अफगानिस्तान से हूं और आज मैं बहुत दुखी हूं क्योंकि महिलाओं को उम्मीद नहीं थी कि देखते ही देखते पूरा तालिबान आ जाएगा। उन्होंने हमारा झंडा हटा दिया और अपना झंडा लगा लिया। हर कोई दुखी है खासकर महिलाएं।’

आज अफगानियों की नम आंखें टकटकी लगागर पूरे विश्व की ओर देख रही हैं इस आस से कि शायद कोई तो होगा जो उनकी इस दुर्दशा पर उनकी मदद करेगा। आगे आएगा और तालिबान को रोकने की कोशिश करेगा।

फिल्म “काबुलीवाला” में एक गाना है जिसको आज भी कोई सुनता है तो उसकी आंखें नम हो जाती हैं। उस गाने को प्रेम धवन ने लिखा है और मन्ना डे ने अपनी आवाज से खूबसूरत बनाया है। इस गाने को आज सुनेंगे तो यूं लगेगा कि कोई अफगानिस्‍तानी अपने मुल्‍क से जुदा होते हुए गा रहा है…

मेरे प्यारे वतन, मेरे बिछड़े चमन, तुझ पे दिल क़ुरबान… 

तू ही मेरी आरज़ू, तू ही मेरी आबरू तू ही मेरी जान …

Terrified People of Afghanistan under taliban 2.0

– मंजुल मयंक शुक्ला

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1 Comment

  1. तालिबान क्या है, उसका क्या इतिहास रहा है, उसके शासन काल मे महिलाओं की क्या दुर्दशा रही है और आम नागरिकों पर किस तरह की पाबन्दी थी, इस लेख को पढ़कर बारीकी से ज्ञात हुआ | अफगानिस्तान का आनेवाला भविष्य किस तरह का होने वाला है इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है |

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