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हिन्दी सिनेमा में प्यार के गीत-2(lovesong)

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हिन्दी सिनेमा में प्यार के गीत-2(lovesong)

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काली घोड़ी द्वार खड़ी (चश्मेबद्दूर)

हिन्दी सिनेमा में प्यार का शायद ये अकेला गानाlovesong है जिसमें एक बार भी प्यार का जिक्र नहीं है, लेकिन फिर भी इसमें प्यार का अनूठा एहसास है …ये इत्मीनान से इंतजार वाला प्यार है, शुरूआत… प्रेमी के आने के संकेत से है …काली घोड़ी द्वार खड़ी…और इस प्यार का असर ऐसा कि…. चकित भई सगरी नगरी…एक ओर संगीत में सुरों का बंधन तो दूसरी ओर पिया के मिलन की आस में चंचल मन। संगीतकार  राजकमल ने शुरू के दो अंतरों को राग काफी पर ढाला है। लोकसंगीत की आग में सिगड़ी सा सुलगता… आधी रात का चंचल राग ….मन अधूरा …राग काफी

Kali Ghodi Dwar Khadi Deepti Naval

काली घोड़ी द्वार खड़ी

मूंगों से मोरी मांग भरी

मूंगों से मोरी मांग भरी

बर जोरी सैंया ले जावे

बर जोरी सैंया ले जावे

चकित भई सगरी नगरी

न मेक अप, न गेट अप, न प्रॉप न हिल स्टेशन …80 के दशक का प्यार …म्यूजिक स्कूल से बस स्टॉप के बीच का प्यार है…कोई दिखावा नहीं… जैसा है, वैसा वाला प्यार … जिसमें सारी दुनिया में और कोई नजर ही नहीं आता …बस …भीड़ के बीच अकेले मितवा और इस वजह से …जंगल बीच महक गए फुलवा

भीड़ के बीच अकेले मितवा

जंगल बीच महक गए फुलवा

जंगल बीच महक गए फुलवा

कौने ठगवा बइयाँ धरी

कौने ठगवा बइयाँ धरी

चकित भई नगरी सगरी

संगीत जो अब तक किताबों में था, गुरु से मिल रही तालीम में था, बिन बताए हौले से जिन्दगी में दाखिल हो गया है, पहले वो सिर्फ स्कूल में संगीत सीखती थी, अब नेहा का सड़क पर चलना भी रियाज है।  

बाबा के द्वारे भेजे हरकारे

अम्मा को मीठी बतियन सँभारे

चितवन से मूक हरी

चकित भई नगरी सगरी

इसके बाद है इस गीत का सर्वश्रेष्ठ अंश…जिसने नेहा के जीवन में संगीत भर दिया, वो कैसा है?.. वो ऐसा है कि उसे देखती ही नेहा सुध-बुध खो देती है।

काली घोड़ी पे गोरा सैयां चमके

कजरारे मेघा में बिजुरी दमके

बिजुरी दमके

सुध-बुध बिसर गयी हमरी

बर जोरि सैंया ले जावे

चकित भई नगरी सगरी

राजकमल यहां राग काफी छोड़ मालकौस साधते हैं। सभी स्वर शुद्ध…आरोह, अवरोह दोनों में धैवत वर्जित…निराला जब अपनी बेटी सरोज के सौंदर्य का चित्रण करते हैं तो लिखते हैं– काँपा कोमलता पर सस्वर, ज्यौं मालकौस नव वीणा पर

धीरे-धीरे फिर बढा़ चरण,
बाल्य की केलियों का प्रांगण
कर पार, कुंज-तारुण्य सुघर
आईं, लावण्य-भार थर-थर
काँपा कोमलता पर सस्वर
ज्यौं मालकौस नव वीणा पर

अगर आपकी उम्र चालीस के करीब है तो आप सई परांजपे की चश्मेबद्दूर के लिए वयस्क नहीं हैं। ये फिल्म 1980 के दौर में हिन्दी पट्टी के शहरों और कस्बों से कॉलेज की पढ़ाई के लिए महानगर आए लोगों की जिंदगी का एक…..रसभरा कतरा है… जिसे वो शायद आज भी…अकेले में याद करते हैं और बरबस हंस पड़ते हैं…जैसे इस गीत में बस स्टॉप पर खड़े बच्चे, महिला और युवा… चकित भई सगरी नगरी के लिए डायरेक्टर सई परांजपे बस स्टॉप पर रिएक्शन का कोलाज लेकर आती हैं। बच्चे हैं जो मन ही मन गाती हुई दीदी को देख कर खुश हो रहे हैं, यहां दूसरे लोग भी हैं, जो खुद में खोई इस लड़की को देख … बहुत इत्मीनान से हैरान होते हैं। प्यार की खुशी पसर कर..उनको भी छू लेती है जो महज इसके साक्षी हैं। ये वो दौर था… जब किसी के प्यार में होने का पता उसकी आंखों की चमक से चलता था। चश्मेबद्दूर में…चमको वाशिंग पावडर वाली नेहा ने प्यार का सबसे बड़ा राज खोल दिया….जब किसी लड़की की आंखें दीप्त हो जाएं.. दीप्ति नवल की तरह…तो समझिए …प्यार में है लड़की… राग भैरवी में येसुदास और हेमंती शुक्ला के बोल…..भारतीय युवा की आजादी का.. सुरों में पहला एहसास… अनमोल

लाज चुनरिया उड़-उड़ जावे

अंग-अंग पी रंग रचावे

उनके काँधे लट बिखरी

उनके काँधे लट बिखरी

काली घोड़ी दौड़ पड़ी

हिन्दी सिनेमा में 1981 प्यार का साल था…इक दूजे के लिए, लव स्टोरी, उमराव जान, सिलसिला और कुदरत के बीच सई परांजपे की चश्मेबद्दूर ने भी अपनी जगह बनाई। और…अगर इंदू जैन ने काली घोड़ी द्वार खड़ी… गीत नहीं लिखा होता तो शायद टाइम्स ग्रुप की चेयरपर्सन की छोटी पहचान से ही वो बंधी रह जातीं।

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