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एक महीने बाद की हेडलाइन आज जानिए!

जरुर पढ़ें संपादकीय

एक महीने बाद की हेडलाइन आज जानिए!

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मजदूर का शहर में आना खबर नहीं था, लेकिन उसका जाना खबर बना…

कुछ इस तरह कि… छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने अपने टीवी एड में प्रवासी मजदूरों को दिए चप्पलों का जिक्र किया

एक खबर और है जो आगे एक महीने में शायद इससे भी बड़ी खबर बनने वाली है।

 …वो कहानी है, छटपटाते शहर की, खून के आंसू रोते …कंस्ट्रक्शन, ट्रांसपोर्ट और MSME के मालिकों की …और इनकी व्यथा-कथा से पूरी तरह बेपरवाह प्रवासी मजदूरों की

शहर और मजदूर का वही रिश्ता है जो शिकारी और शिकार का होता है

शहर मजदूर को पहले लुभाता है, उसे बेहतर जिंदगी का भरोसा देता है और फिर मकड़ी की तरह निगल जाता है

मकड़ी अपने जाले का कुछ हिस्सा चिपचिपा बुनती है, जिस पर पैर रखते ही कीड़े-मकोड़े चिपक जाते हैं। पहले जिंदा रहने की जिद छूटती है, फिर अधूरी हसरतों के मरने का एहसास होता है, आखिर में वो हार कबूल कर लेता है। मकड़ी उसे पहले भी मार सकती थी, लेकिन अपने शिकार की आंखों में मौत का इंतजार देखने में जो सकून है उसे वो एक बार भी खोना नहीं चाहती।

शहर की तकलीफ ये है कि उसने बड़ी सावधानी से अपने पैरों से धूल कण पोंछ लिए हैं, लेकिन इस बार इंतजार उसे करना है… उसका वो सकून खो गया है, क्या  कीड़ा फिर आएगा मकड़ी के जाले में ?

खेती से हारे किसान का स्वाभिमान मर जाता है तो वो मजदूर बन जाता है। उसे चाहे जितना भी जलील किया जाए, उसे लौट कर वहीं आना है जहां उसे रोटी मिलेगी …वो शहर से नफरत कर सकता है, लेकिन शहर के बगैर वो जिन्दा नहीं रह सकता

मजदूर लौट कर आएगा शहर

हमारे यहां पचास करोड़ मजदूर हैं, अगर पांच करोड़ गांव लौट भी आए तो उनमें से हर एक की जगह लेने दस- दस लोग खाली बैठे हैं

मजदूर के घर का चूल्हा बंद हो सकता है, लेकिन फैक्ट्रियां चलेंगी, कंस्ट्रक्शन हो कर रहेगा …सेल्स, आफ्टर सेल्स, लॉजिस्टिक्स में काम करने  के लिए,  शहर में आकर जलील होने की कीमत अबकी बार 20 टका ज्यादा मिलेगी

शहर से मोहभंग मजदूर के लिए कोई नई बात नहीं है,  गांव में थोड़े दिन रहने के बाद उसे एहसास होगा कि गांव से मोहभंग के बाद ही वो शहर गया था। परिवार के साथ रहने में सकून तो है, लेकिन पेट पालने के लिए इतना काफी नहीं है।

नून रोटी खाएंगे, लेकिन शहर नहीं जाएंगे

मजदूर के लिए भूख नई बात नहीं है, ठेकेदार की बेईमानी वो हर महीने नहीं तो हर साल झेलता ही है, बीमारी-महामारी से वो नहीं डरता…लेकिन इस बार वो इस तरह लौटा है जैसे पहले कभी नहीं लौटा था…सपरिवार. गठरी में.घर-बार लेकर …उसे भूख से.. प्यास से सड़क पर मरना मंजूर है, लेकिन शहर लौटना मंजूर नहीं है। इस बार उसने शहर का वो चेहरा देख लिया है जो उसने पहले नहीं देखा था।  

उसने देखा कि लॉकडाउन में 10 में से 8 लोगों की मजदूरी काट ली गई(SWAN -Stranded Workers Action Network सर्वे ) लेकिन किसी ने कंस्ट्रक्शन मालिकों, ठेकेदारों पर दबाव नहीं बनाया, उसके लिए आवाज नहीं उठाई

100 में 82 मजदूरों को सरकारी राशन नहीं मिला, लेकिन देश की शोर-शराबे वाली राजनीति में ये सवाल किसी ने पूछना जरूरी नहीं समझा

राशन उन्हें मिलता भी कैसे? सरकार के पास प्रवासी मजदूरों का कोई रिकार्ड ही नहीं है, अब ये अलग बात है कि इस वास्ते संसद ने चालीस साल पहले कानून बनाया था

उन्हें उम्मीद सुप्रीम कोर्ट से थी, जिसने बहुत धैर्य के साथ, सरकार का ये पक्ष सुना कि देश में सड़कों पर कोई प्रवासी मजदूर है ही नहीं

उन्हें उम्मीद मीडिया से थी…जिसने स्टिंग, मोन्टाज, क्रोमा टेक्सट में उन्हें जगह दी, लेकिन उन्होंने केंद्र सरकार से ये सवाल नहीं पूछा कि अगर आप वुहान और तेहरान से फ्लाइट में प्रवासी भारतीयों को मुफ्त ला सकते हैं तो प्रवासी मजदूरों से…जिनके पास फीचर फोन रिचार्ज तक के पैसे नहीं हैं, उनसे ट्रेन की टिकट के पैसे क्यों ले रहे हैं?

उन्होंने केंद्र सरकार से ये नहीं पूछा कि जब ब्राजील जैसा देश कोरोना काल में मजदूरों को 8500 रुपया महीना दे रहा है तो हमारी सरकार जन धन खाते में सिर्फ  एक बार 500 क्यों दे रही है?

1.7 लाख करोड़ हो या 20 लाख करोड़ …उन्होंने सरकार के हर पैकेज को ऐतिहासिक करार दिया…बस ये जानने की कोशिश नहीं की, कि जो भूख से मर रहा है, उसके जिंदा रहने के  लिए अभी इस पैकेज में क्या है, कितना है ? अगर योजनाएं इतनी ही अच्छी हैं तो लोग सड़कों पर क्यों हैं?

उसने राज्य सरकारों से नहीं पूछा कि जब आपको केंद्र सरकार ने 31 हजार करोड़ का फंड सिर्फ कंस्ट्रक्शन वर्कर्स के लिए दिया है तो ये गरीब सड़कों पर भूखे क्यों घूम रहे हैं ? SDRF के 11 हजार करोड़ जो मजदूरों को क्वारंटीन करने, उनके रहने-खाने पर खर्च करने के लिए केंद्र सरकार से मिले थे, उसमें से कितना आपने अब तक खर्च किया है ?

वो इसलिए नहीं लौटेंगे, क्योंकि उन्हें लगने लगा है कि …हमारे यहां लोकतंत्र बस एक रूमाल है जो नेताओं की बहती नाक पोंछने के काम आ रहा है

वो इसलिए नहीं लौटेंगे, क्योंकि उनमें एक साथ कई काम का हुनर है। पहले वो मॉल और मल्टीप्लेक्स बना रहे थे, कुरियर बॉय थे, रिक्शा-  ऑटो चला रहे थे, फिर वो सब्जी और फल के ठेले लगाने लगे। अब खरीफ का मौसम आ रहा है..अपने खेत में काम करेंगे, गांव में मजूरी करेंगे, इंट भट्ठा पर काम करेंगे, रिक्शा चलाएंगे।

अब मजदूर लौट कर नहीं आएंगे बाबू, शहर से कहो, अपनी नफरत का नया सामान तलाश ले।

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