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जिस ऑक्सफोर्ड वैक्सीन पर भारत की उम्मीदें टिकी हैं, उसकी पूरी कहानी सुनिए

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जिस ऑक्सफोर्ड वैक्सीन पर भारत की उम्मीदें टिकी हैं, उसकी पूरी कहानी सुनिए

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कोरोना के खिलाफ जंग वैक्सीन पर टिकी है। चार दौर के क्लिनिकल ट्रायल और ड्रग कंट्रोलर/एडमिनिस्ट्रेटर की मंजूरी मिलने में अब तक 10 से 16 साल का वक्त लग जाता था। पहली बार कोई वैक्सीन साल भर या हो सकता है इससे भी कम वक्त में तैयार होने के करीब है। ये तय है कि जो कंपनी इस वैक्सीन को सबसे पहले लेकर आएगी, वो दुनिया की सबसे  मुनाफेदार दवा कंपनी बन जाएगी, लिहाजा इस रेस में WHO के मुताबिक 166 कंपनियां अभी शामिल हैं।  इनमें से ज्यादातर अभी अपनी वैक्सीन का ट्रायल लैब में या पशुओं पर कर रही हैं, लेकिन कुछ कंपनियां हैं जो ह्यूमन ट्रायल के स्टेज में पहुंच चुकी हैं।

ऑक्सफोर्ड वैक्सीन का क्लिनिकल ट्रायल- ब्रिटेन

वैक्सीन की यात्रा प्री क्लिनिकल ट्रायल से शुरू होती है जहां वैक्सीन का  पहले लैब में और फिर पशुओं जैसे चूहे और बंदर पर टेस्ट होता है।  क्लिनिकल ट्रायल में तीन से चार चरण होते हैं। पहले और दूसरे दौर के ट्रायल में वैक्सीन की सेफ्टी देखी जाती है और डोज की मात्रा तय की जाती है। ये टेस्ट कुछ सौ से शुरू कर एक से दो हजार लोगों पर किए जाते हैं। वैक्सीन के लिए सबसे अहम फेज 3 ट्रायल होता है जहां दो चीजों की बेहद सावधानी से जांच की जाती है।

  1. इस वैक्सीन का क्या साइड इफेक्ट है, जितना रिस्क है, उससे ज्यादा फायदा है कि नहीं?  अगर ये साइड इफेक्ट मैनेजेबल है तो खास तौर पर किन बीमारियों के मरीजों को इसे नहीं दिया जा सकता ?
  2. वायरस से लड़ने में ये कितना कारगर है, और कितने दिन, महीनों या साल तक इसका असर बना रहता है?

फेज 3 और फेज 4 में कई हजार से लेकर लाखों स्वस्थ लोगों पर वैक्सीन का ट्रायल किया जाता है और लंबे समय तक इसके असर पर रिसर्च किया जाता है।

इस बार कोशिश ये है कि फेज1 और फेज2 एक साथ किया जाए और इसी तरह फेज3 और फेज 4 एक साथ हो।

आइए उस ऑक्सफोर्ड वैक्सीन के बारे में जानें जिसका अब फेज 3 ट्रायल शुरू हो गया है।

AstraZeneca

 ऑक्सफोर्ड वैक्सीन की कहानी

ब्रिटिश स्वीडिश कंपनी AstraZeneca ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर ChAdOx1 nCoV-19 vaccine पर काम कर रही है। भारत में ये वैक्सीन सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया बना रही है।

ये वैक्सीन चिंपान्जियों में सर्दी-जुकाम लाने वाले adenovirus से बनाया गया है। इस adenovirus का जीन, लैब में बदला गया और इसमें वो जीन डाले गए जिसका इस्तेमाल कोरोना वायरस उन spike proteins को बनाने में करता है जिससे इनसान संक्रमित हो जाता है। यानी ये वैक्सीन इनसान के शरीर को उन spike proteins को पहचानना और उनसे लड़ना सिखाएगा जो कोरोना वायरस से संक्रमित होने के बाद इनसान में बनते हैं।

शुरूआत में जब इस वैक्सीन का बंदरों पर ट्रायल हुआ तो नतीजे खुश करने वाले नहीं थे। वैक्सीन देने के बाद भी बंदर संक्रमित हो रहे थे, राहत की बात बस इतनी थी कि उन्हें निमोनिया नहीं हो रहा था जो किसी कोरोना वैक्सीन की कामयाबी की पहली शर्त है। 13 मई को इस स्टडी को BioRxiv में प्रकाशित किया गया। कहा गया कि ये वैक्सीन पूरी तो नहीं लेकिन कुछ हद तक कारगर माना जा सकता है।

इसके पहले अप्रैल में इस वैक्सीन का 1000 वालंटियर्स पर ह्यूमन ट्रायल शुरू हुआ। फेज 1 और अब तक चल रहे फेज 2 ट्रायल के जितने आंकड़े सामने आए थे, उसे 20 जुलाई को The Lancet में प्रकाशित किया गया। इस स्टडी मे पाया गया कि इस वैक्सीन का कोई खास साइड इफेक्ट नहीं था। कुछ मामूली किस्म की परेशानियां जैसे muscle ache and chills की शिकायत आईं, लेकिन इसे मैनेज किया जा सकता था। ये पाया गया कि वैक्सीन से शरीर का इम्यून सिस्टम हरकत में आ रहा था और SARS-CoV-2-specific T-cells बना रहा था। ये T-cells दरअसल खून में white blood cells के समूह हैं जो किसी बीमारी से लड़ने में सबसे अहम भूमिका निभाते हैं। नतीजा ये हुआ कि वैक्सीन देने के बाद अब वायरस शरीर में सेल्स को इन्फेक्ट नहीं कर पा रहा था। ये उम्मीद से बेहतर रिजल्ट था, लेकिन असली इम्तिहान तो अभी शुरू ही हुआ है।

वैक्सीन को कैसे अच्छा समझा गया ?

ये पाया गया कि वैक्सीन देने से शरीर में दो बदलाव हुए। पहला ये कि एंडीबडी तैयार हुआ और दूसरा T-cell तैयार हुआ। एंटीबडी का काम वायरस को पहचानना, उसे घेरना और फिर पैथोजेन को डिसेबल करना है। इसके बाद T-cell शरीर में infected body cells की पहचान कर उन्हें खत्म कर देता है। इस तरह वायरस का शरीर में reproduction रुक जाता है।

ब्राजील और साउथ अफ्रीका में फेज 3 का ट्रायल 5000 लोगों पर शुरू हो चुका है। अगस्त में भारत के साथ ही ब्रिटेन में 10,500 और अमेरिका में 30,000 लोगों पर इसका ट्रायल शुरू होने वाला है। भारत में पुणे और मुंबई में करीब पांच हजार लोगों पर इस वैक्सीन का ट्रायल अगस्त के आखिरी हफ्ते में होगा। फेज 3 का ये ट्रायल अगस्त से नवंबर तक यानी चार महीने तक चलेगा।

Oxford’s Jenner Institute के डायरेक्टर Adrian Hill जो वैक्सीन बनाने वाली टीम के भी हिस्सा हैं, का दावा है

T-cell responses are “very high”. They are also, he says, “clearly better” than those from another vaccine being developed by Moderna, an American biotechnology firm.

इसके साथ ही टीम ऑक्सफोर्ड एक बड़े जोखिम का काम करने जा रही है। challenge studies on humans के नाम से कंपनी एक प्रयोग करने वाली है जिसमें स्वस्थ लोगों को वायरस की छोटी मात्रा से संक्रमित कर उसके नतीजे की स्टडी करेगी। अगर ये कामयाब रहा तो इससे वैक्सीन को मंजूरी मिलने में और कम वक्त लगेगा।

अमेरिकी सरकार को इस वैक्सीन से इतनी उम्मीद है कि उसने AstraZeneca को $1.2 बिलियन यानी करीब दस हजार करोड़ की पेशगी दी है। ये पेशगी इस शर्त के साथ दी गई है कि अगर कंपनी की वैक्सीन को मंजूरी मिल जाती है तो कंपनी अक्टूबर 2020 तक 30 करोड़ ( अमेरिका की आबादी 32.82 करोड़-2019) डोज अमेरिका के HHS यानी Health and Human Services को देगी। उम्मीद है दिसंबर में इस वैक्सीन Covishield की 30 से 40 करोड़ डोज भारत में उपलब्ध हो जाएगी।

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