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जिय हो बिहार के लाला !

जरुर पढ़ें संपादकीय

जिय हो बिहार के लाला !

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सुशासन का आधार है आश्वासन…

और आश्वासन सरकारी नौकरी की हो, तो इसकी क्या अहमियत है …वो ऐसे समझिए …जैसे खरंजा से फोर लेन… जैसे सरकार शिफ्ट करने बोल रही है, अनीसाबाद बाइपास में किराए के मकान से पाटलिपुत्र कालोनी में अपने मकान में …और पूछ रही है …आप जाना चाहते हैं क्या?

पाटलिपुत्रा कालोनी मतलब बिहार का लुटयंस …जहां अनन्त काल से हर दो मकान के बीच 11 कट्ठा का स्थायी सोशल डिस्टेन्सिंग है…बगल में दीघा …जैसे निराला की कविता …वो तोड़ती पत्थर

गुरु हथौड़ा हाथ,
करती बार-बार प्रहार:-
सामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार।

तुलसी और सूर जिस तरह कविता में विरुद्धों का सामंजस्य लेकर आते हैं, वही बिहार की राजनीति का सार है…गरीबी का खत्म होना नहीं, बना रहना जरूरी है…कास्ट भी जरूरी है कंट्रास्ट भी जरूरी है

बिहार की राजनीति में क्या किया… अप्रासंगिक है, सारी  प्रासंगिकता इसकी है कि.. क्या कहा …  करना यहां अकर्मक है, कहना सकर्मक ।

 कोरोना की आपदा को विपक्ष ने एक अवसर की तरह देखा था। तेजस्वी ने पार्टी की ओर से बस देने का प्रस्ताव रख कर घोड़े की ढाई वाली चाल चली…प्रस्ताव स्वीकार हुआ तो नीतीश की फजीहत और इनकार हुआ तो  इल्जाम लगेगा कि बिहार सरकार मजदूरों को खुद तो नहीं ही ला रही और विपक्ष ला रहा है तो भी इनसे देखा नहीं जाता…

अब नीतीश कह रहे हैं…किसी मजदूर को बिहार से जाना ही नहीं पड़ेगा…सबको यहीं काम मिलेगा

ये रंग का सत्ता है, जो पहली बाजी में …गुलाम पर भारी पड़ता है

 विपक्ष शतरंज खेल रहा है… नीतीश ताश।

प्राइवेट नौकरी हिन्दी सिनेमा के हीरो की बहन है, हमेशा खतरे में रहती है, सरकारी नौकरी मिल गई तो जेनरल कोटा वाले आशिक के घर लड़की का बाप बहुत अदब से आ कर कहता है…जन्म से इसका ललाट चमकता रहता था..हम जानते थे शर्मा जी एक दिन ये नाम करेगा ….

टीचर से इंजीनियर तक साल दर साल यहां इम्तिहान पर इम्तिहान देते रहते हैं, रिजल्ट नहीं निकलता …और BPSC कहता है —

हम इतना Advertisement देंगे इतना Advertisement देंगे इतना Advertisement देंगे कि तुम कनफ्यूज हो जाओगे कि किस ad के लिए तैयारी करें और किस ad के रिजल्ट के लिए आंदोलन

बिहार देश का अकेला राज्य है जहां बच्चा IIT करता है तो पिता समझाते हैं, ठीक है अब BPSC दो … जैसे ‘नमक का दारोगा’ के मुंशी जी बेटा बंशीधर को समझाते हैं –

‘नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीर का मजार है. निगाह चढ़ावे और चादर पर रखनी चाहिए. ऐसा काम ढूंढ़ना जहां कुछ ऊपरी आय हो. मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चांद है, जो एक दिन दिखाई देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है. ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है. वेतन मनुष्य देता है, इसी से उसमें वृध्दि नहीं होती. ऊपरी आमदनी ईश्वर देता है, इसी से उसकी बरकत होती हैं,’

ये बरकत वाली जो भावना है उसने बिहार की गरीब जनता से उसका सबसे बड़ा धन… स्वाभिमान छीन लिया ….नौकरी जरूरी है…तो नेताओं की चाकरी जरूरी है…नौकरी यहां अधिकार नहीं, सियासत का प्रसाद है…जाति, रिश्वत, रसूख के हिमालय को लांघ कर वो कौन आखिरी शख्स था जिसे बिहार में सिर्फ अपनी काबिलियत पर सरकारी नौकरी मिली थी.. ये एक पहेली है जिसका जवाब किसी के पास नहीं

भूख से रिरियाती हुई फैली हथेली का नाम गया है

और भूख में तनी हुई मुट्ठी का नाम है नक्सलबाड़ी

कभी सोच कर देखिएगा यूपी के धूमिल ने क्यों बिहार के गया के लिए ही रिरियाना लिखा …क्यों बिहार में ही जाति के वर्चस्व को बचाने के लिए सेना बनती है…

आपदा को अवसर में बदलने की बात अब सरकार कह रही है, नीतीश कुमार इसकी अहमियत से पहले से वाकिफ हैं। जीतनराम मांझी जैसे ही मुख्यमंत्री के पोस्ट को सीरियसली लेने लगे, नीतीश ने नौ महीने में उन्हें सीएम से भूतपूर्व सीएम बना दिया।

तीन साल पहले जैसे ही सीबीआई ने FIR में सहयोगी पार्टी आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव का नाम दिया, नीतीश ने अंतरात्मा की आवाज पर फौरन सीएम पद से इस्तीफा दे दिया…कुछ घंटे बाद फिर अंतरात्मा की आवाज पर उन्होंने बीजेपी के साथ सरकार बना ली।

नीतीश जी ने सिर्फ नौकरी का वादा नहीं किया है..चुनाव प्रचार का आगाज भी कर दिया है। बीजेपी  डरी हुई है…चुनाव करीब है, नीतीश जी की अंतरात्मा जागने का समय हो गया ….आरजेडी को भी यही लग रहा है …

और नीतीश …उनकी राजनीति पक्ष और विपक्ष दोनों के सापेक्ष भी है निरपेक्ष भी….कभी -कभी तो लगता है अपुन ही भगवान है

उसी को जीने का हक़ है जो इस ज़माने में
इधर का लगता रहे और उधर का हो जाए

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