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मेरा गांव मेरा देश-सिमोन उरांव

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मेरा गांव मेरा देश-सिमोन उरांव

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चेहरा और लिबास देख के पहचानने वालों के लिए ये शख्स एक चुनौती है। इस शख्स ने  इंजीनियरिंग की पढाई नहीं की, लेकिन हजारों खेतों में मुफ्त पानी पहुंचाने की व्यवस्था ईजाद की, फॉरेस्ट साइंस की तालीम लिए बगैर मेड़ों पर, सड़कों पर, कच्चे रास्तों पर हजारों पेड़ लगाए, जिससे नदी के उफनते पानी से मिट्टी का कटाव रुका, स्थानीय लोगों को जलावन मिला, फल मिला, रोजगार मिला। जहां एक फसल होती थी, वहां तीन फसल होने लगी, गरीब आदिवासियों का पलायन खत्म हो गया।

झारखंड की राजधानी रांची से 45किलोमीटर दूर बेड़ो में सिमोन बाबा का घर है।

घर के बाहर बोर्ड लगा है – 12पड़हा राजा हरिहरपुर जामटोली पद्मश्री सिमोन उरांव।  यकीन मानिए हमारे देश में किसी पद्मश्री का मकान इससे ज्यादा साधारण होना मुमकिन नहीं है।  86 साल के सिमोन यहां अपनी पत्नी के साथ रहते हैं।

ये इलाका ताना भगत का इलाका है, आजादी की जंग में अंग्रेजी सेना के सामने कुरबान होने वाले वीरों की भूमि है ये। जब आप सिमोन बाबा के गांव आएंगे तो आपको सबसे पहले स्वतंत्रता सेनानियों का स्मारक स्थल मिलेगा। ये ओपन एयर म्यूजियम है, देश के लिए शहीद होने वाले बहादुरों के नाम यहां पत्थरों पर खुदे हैं। ये समूचा गांव, यहां की साफ-सफाई, लोगों में पानी और पेड़ को बचाने का संस्कार …ये है वो आदिवासियत जिसे ज्यादा बेहतर तौर पर समझे जाने की जरूरत है।

 1961 ईस्वी में सिमोन बाबा ने जल और जंगल बचाने की मुहिम शुरू की। किसी नेता की तरह नहीं, दोस्त की तरह…गांव वालों को समझा बुझा कर पेड़ लगाने और पानी बचाने की मुहिम चलाई…बाबा हमें गायघाट के उस बांध पर ले गए जिसे उन्होंने गांव वालों की मदद से बनवाया था। बेड़ो में पर्यावरण संरक्षण का पहला प्रोजेक्ट।

सिमोन बाबा को पर्यावरण का रक्षक समझना ठीक है, लेकिन उनकी पहचान इससे कहीं बड़ी है। वो आदिवासियत की परंपरा के वाहक हैं। जनजातीय समाज में पानी और पेड़ की जगह परिवार के एक सदस्य की सी रही है। जिस साल दादी का जन्म हुआ था, उसी साल उनके पिताजी ने ये पेड़ लगाया था। तो इस पेड़ को मैं दादी के नाम से बुलाता हूं, ये वो सोच है जिसे सुनना –पढ़ना आसान है, लेकिन इसका मर्म समझना मुश्किल है। इसी तरह पानी के कुदरती बहाव को रोकना नहीं चाहिए, उसे सहेजना चाहिए, वो भी सिर्फ उतना कि पानी कहीं रुके नहीं, हर ओर जाए, हर खेत तक पहुंचे। सिमोन बाबा ने आदिवासी समाज में पानी को सहेजने की परंपरागत तकनीक और संस्कार को अमली जाना पहनाया। नदी के पानी को छोटे-छोटे नालों के जरिए दूर-दूर के खेतों तक पहुंचा कर किसान का जीवन तो खुशहाल बनाया ही, साथ ही बाढ़ का खतरा भी दूर हो गया, पर्यावरण की रक्षा भी हुई, डीजल का खर्च बचा सो अलग।

सिमोन बाबा की माली हालत ठीक नहीं है। बहुत मुश्किल से जंगली जड़ी बूटी बेच कर गुजारा करते हैं। उन्हें सरकारी पेंशन भी नहीं मिलती। स्थानीय विधायक ने पचास हजार की मदद का वायदा किया था, वो वादा पूरा नहीं हुआ। अब 86 साल की उम्र में सिमोन बाबा की एक ही हसरत है कि गांव के लोगों के साथ राय-मशविरा करने के लिए एक बड़ा सा हॉल बन जाए तो वहां सालों भर बैठक हो सकती है।

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