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लालू हैं तो मुमकिन है !

बड़ी खबर राज्य

लालू हैं तो मुमकिन है !

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दुनिया कारोबार की हो या राजनीति की, आगे वही जाता है जो आगे देख सकता है।

राजनीति में कई दशकों बाद संक्रमण का एक दौर आता है जब पुरानी व्यवस्था मिट्टी की दीवार की तरह ढहने वाली होती है और एक नई व्यवस्था उसकी जगह लेने को तैयार हो चुकी होती है।

1989 में मंडलवाद के उफान में वो ताकत थी कि अगर लालू प्रसाद न होते तो भी उसने एक लालू प्रसाद ईजाद कर लिया होता। लालू की खासियत ये है कि जेपी के आदर्शों को अमली जामा पहनाने के लिए बिहार पुलिस से टकराने वाले लाखों युवाओं की भीड़ में जब किसी को नेता के तौर पर अपनी अलग पहचान बनाने का वक्त आया तो लालू इसके लिए  सुशील मोदी, नीतीश कुमार, रविशंकर प्रसाद, शिवानंद तिवारी से थोड़ा ज्यादा तैयार थे।

लालू इस लिए रेस में आगे निकल पाए, क्योंकि उन्होंने 1977 से 1989 तक 12 साल की राजनीति में, इसे दूसरों से पहले देख लिया कि बिहार में ठाकुर, ब्राह्मण, मुस्लिम, दलित की नफासत वाली कांग्रेस की राजनीति दरअसल सास की शौक सी खरीदी वो साड़ी थी जिससे बहू अब पोंछा लगाना चाहती थी। राज्य  का ओबीसी तबका राजनीति में अपने हिस्से की जमीन गिड़-गिड़ाकर मांगने नहीं आया था, इसे वो छीनने वाला था, वो भी कुछ इस तरह कि इस जमीन की ओर कांग्रेस अब बस हसरत से देख भर सकती थी, हासिल नहीं कर सकती थी।

लालू की खासियत ये थी कि वो अपने साथी नेताओं के बजाए अपनी खामियों से बेहतर तौर पर वाकिफ थे। उन्हें पता था कि वे छात्र आंदोलन की पैदाइश हैं, लेकिन उनकी ताकत, उनकी जातिगत पहचान से है। कांग्रेस कल्चर में जातिगत पहचान नव विवाहिता का सिन्दूर था, जिसे वो छिपा कर लगाती थी, ताकि उसका शादीशुदा होना पता न चले। लालू ने जाति की इस पहचान को अपनी कमजोरी नहीं, ताकत माना। उन्होंने बिहार की राजनीति में पहली बार दिखाया कि अपनी जाति की बात गर्व से सार्वजनिक मंचों पर की जा सकती है…और इससे पिछड़े समुदाय के लाखों लोगों को हिम्मत मिलती है, हौसला मिलता है। श्रीकृष्ण सिंह, केबी सहाय, सत्येंद्र नारायण सिन्हा और जगन्नाथ मिश्रा ऐसा कभी नहीं कर सकते थे।

 10 मार्च 1990 को लालू बिहार के मुख्यमंत्री बने… सिर्फ …पांच महीने बाद..  7 अगस्त को केंद्र की नेशनल फ्रंट सरकार ने सरकारी नौकरी में  27 फीसदी रिजर्वेशन लागू कर दिया। वी पी सिंह को लगता था कि ये उनका मास्टर स्ट्रोक है, जिससे वो जिंदगी भर पीएम बने रहेंगे। वो नहीं समझ पाए कि देश की राजनीति में लालू और मुलायम जैसे नेताओं की वजह से ये मुमकिन हुआ था। इस फैसले का दिन आ गया था, वो नहीं होते, कोई और होता, तो भी यही कानून बनता। इस कानून ने समूचे उत्तर भारत में ओबीसी समुदाय के नेताओं के लिए उपजाऊ जमीन तैयार कर दी…बीते कई साल से लालू  बिहार में इस जमीन को सींच रहे थे, अब उनके लिए वक्त फसल काटने का था। लालू को एक और मजबूत पहचान की जरूरत थी जो उन्हें लाल कृष्ण आडवाणी ने दिला दी।

1989 में RSS- BJPके राम शिला पूजा को लेकर भागलपुर में भयानक दंगा हुआ, दंगे के शिकार ज्यादातर गरीब मुसलमान हुए। लालू दिल्ली जाकर आडवाणी से मिले। गोपालगंज से रायसीना- मेरी राजनीतिक यात्रा में इस मुलाकात का वर्णन है।

लालू- आप दंगा फैलाने वाला यात्रा रोक दीजिए। बहुत परिश्रम से हमने बिहार में भाईचारा कायम किया है। अगर आप दंगा यात्रा निकालिएगा तो हम छोड़ेंगे नहीं।

आडवाणी –देखता हूं, कौन मां का दूध पीया है जो मेरा रथ रोकेगा ?

लालू- मैंने मां और भैंस दोनों का दूध पीया है..आइए बिहार में…बताता हूं।

गोपालगंज से रायसीना- मेरी राजनीतिक यात्रा

सासाराम और धनबाद में खबर लीक होने से रूट बदलने की वजह से आडवाणी बच गए, लेकिन आर के सिंह, और रामेश्वर उरांव की कोशिश से 23 अक्टूबर 1990 को आडवाणी को समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया गया।

यहां से बना वो MY काम्बिनेशन, जिसकी काट तलाशने में नीतीश कुमार को पंद्रह साल लग गए।

इस दिन के बाद लालू ने जो कुछ किया, वो अप्रासंगिक है। अगर 72 साल के बेहद बीमार, जेल में कैद, लालू आज भी नीतीश कुमार और बीजेपी के निशाने पर हैं, तो इसकी वजह ये है कि बिहार में सिर्फ वही हैं, जिनके पास पांच साल का परमानेंट फिक्स्ड डिपॉजिट वाला वोट बैंक है, जो किसी और के पास नहीं। जेल में कैद लालू, जनता के बीच मौजूद बिहार के किसी दूसरे नेता से ज्यादा असरदार हैं। वो आगे देखना जानते हैं। उनके पास अक्टूबर-नवंबर चुनाव बाद बिहार सरकार की नई कैबिनेट का पूरा खाका है….मुकाबला कठिन होगा, लेकिन लालू हैं तो तेजस्वी के लिए मुमकिन है।

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