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भारत के सबसे ताकतवर लोग जिनका आप शायद नाम तक नहीं जानते ?

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भारत के सबसे ताकतवर लोग जिनका आप शायद नाम तक नहीं जानते ?

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दुनिया में जितनी भी वैक्सीन बनती है उसका आधा हमारे देश में बनता है, दवा के मामले में दुनिया की हर पांचवीं टैबलेट,कैप्सूल और इंजेक्शन हमारे देश में बनती है। कारोबार के नजरिए से ये करीब $ 55 billion यानी 4 लाख करोड़ का कारोबार है जो हर साल तकरीबन 22.4% की रफ्तार से बढ़ रहा है।

स्रोत- मैकिन्सी रिपोर्ट https//www.mckinsey.com/~/media/mckinsey/dotcom/client_service/Pharma%20and%20Medical%20Products/PMP%20NEW/PDFs/778886_India_Pharma_2020_Propelling_Access_and_Acceptance_Realising_True_Potential.ashx

लेकिन अकूत मुनाफे के इस कारोबार का एक काला सच है जिससे शायद आप नावाकिफ हैं। आइए इसे एक कहानी के जरिए समझाते हैं।

मान लीजिए आप किसी काम से अमेरिका या जर्मनी जाते हैं। वहां आपको लगता है कि आपको बिकोसुल या क्रॉसिन की टैबलेट चाहिए। आप दवा की दुकान पर जाते हैं तो आपको दुकानदार दो बातें बताएगा।पहली ये कि आप कोई दवा डॉक्टर की प्रेसक्रिप्शन के बगैर नहीं ले सकते और दूसरी ये कि यहां कोई बिकोसुल, क्रॉसिन या काम्बिफ्लैम नहीं मिलता। आपको दवा का pharmacological name यानी साल्ट बताना होगा-जैसे बुखार की दवा के लिए paractamol या ibrufen या diclofenac sodium

पहले इस सवाल का जवाब जानिए कि वो दवाएं जो हमारे यहां इतनी मशहूर हैं वो दुनिया के दूसरे देशों में क्यों नहीं मिलतीं?

स्याह सच 1 – दवा की ब्रान्डिंग के नियम

दुनिया भर में दवा में ब्रान्डिंग का खास मतलब है, जो हमारे यहां अकूत मुनाफे के मकसद से  दवा कंपनियों ने बदल दिया है…और सब कुछ जानते-समझते सरकार ने भी इस ओर ध्यान देना जरूरी नहीं समझा है। अमेरिका और यूरोप में किसी दवा के लिए कंपनी को अपनी पसंद का खास नाम लिखने की इजाजत एक शर्त के साथ दी जाती है। ये शर्त है पेटेन्ट का..यानी आविष्कार करने का। जब कोई कंपनी किसी दवा का आविष्कार करती है, उसे पहली बार दुनिया में सामने लाती है सिर्फ और सिर्फ तभी उसे इस दवा को सात साल तक एक एक्सक्लूसिव नाम देने का हक हासिल होता है। जैसे गिलिड ने कोरोना के लिए इंजेक्शन तैयार किया तो उसे नाम दिया remdesivir .. यानी दवा को खुद के तय किए नाम से बेचना एक बेहद खास अधिकार है। दवा में ब्रांड का मतलब ये है कि इस कंपनी के पास इस दवा का पेटेन्ट है। जिनके पास पेटेन्ट नहीं है, उन्हें ब्रांड नाम लिखने की इजाजत नहीं है। उन्हें वो दवा जैसे बुखार के लिए paracetamol  ही लिखना है, वो इसके पैक पर  अपनी कंपनी का नाम लिख सकते हैं, लेकिन इस दवा के लिए खुद तय किया अपना नाम जैसे क्रोसिन या कैल्पॉल नहीं लिख सकते। लेकिन हमारे यहां सभी दवा कंपनियों को अपनी दवा की पैकिंग पर अलग से नाम लिखने की इजाजत है। इससे फर्क ये पड़ता है कि अगर बुखार की सारी दवा पर सिर्फ paractamol ही केवल लिखा रहे, तो इनकी अलग से मार्केटिंग नहीं की जा सकती। हमारे यहां दवा कंपनियां बगैर रिसर्च में कोई निवेश किए अपने नाम से दवा बनाती हैं, और डाक्टर को कमीशन देकर उनसे वही दवा मरीज के लिए लिखवाती हैं। इस तरह मरीज एक लोकल मेड दवा के लिए इंटरनेशनल कीमत चुकाता है।

स्याह सच 2- काउंटर वाली दवा

हमारे यहां कई दवाएं OTC यानी over the counter मिलती है, बहुत कम schedule h दवाएं हैं जिनके लिए आपसे दवा दुकान पर प्रेस्क्रिप्शन की मांग की जाती है। अब वो दवाएं जिनके लिए आपको डॉक्टर की पर्ची नहीं दिखानी पड़ती, लेकिन आप किसी ब्रांड की दवा जिसकी बहुत मार्केटिंग होती है और इस वजह से उस दवा का नाम आपको याद होता है उसे आप खरीद लेते हैं। लेकिन आप ये नहीं जानते कि यही दवा आप इससे दस गुनी कम कीमत पर भी खरीद सकते थे। ये एक राज है जो आपसे जान बूझ कर छिपाया गया है।

कीमत के इस फर्क पर गौर कीजिए

दवायूनिटजेनरिक दवा/ कीमत रुपये मेंब्रांडेट दवा/ कीमत रुपये मेंदवा का नाम-कंपनी का नाम
Paracetamol10 टैबलेट      4.50           30Crocin Advancegsk    
Cetirizine Dihydrochloride10 टैबलेट      7.65           31cetrizet/sun pharma
Tizanidine Tablets I.P 2mg 10 टैबलेट      21.20        131tizan /sun pharma 
glimepiride and metformin   hydrochloride sustained release tablets  15 टैबलेट22140Gmt sr/ indoco

स्रोत- जेनरिक दवा – http://janaushadhi.gov.in/ProductList.aspx

ब्रांडेड दवा – https://www.netmeds.com/generics/cetirizine-5mg

स्याह सच 3 – दवाई दोस्त की व्यवस्था नहीं

ज्यादातर विकसित देशों में कम्यूनिटी फार्मासिस्ट होते हैं। वो अपने इलाके में मरीजों को दवा के मामले में अहम जानकारी देते हैं। ये जानकारी दवा की मात्रा (जिस दवा का कोर्स सिर्फ चार दिन का है, उसे डाक्टर महीना भर के लिए तो नहीं लिख रहा) से लेकर उसी साल्ट की सस्ती दवा की जानकारी देता है। हमारे यहां मरीज के पास डाक्टर के बाद कोई दूसरा जरिया नहीं है, जिस पर वो यकीन कर सके और उसके सुझाव पर सस्ती दवा खरीद सके। मजबूरी में वो वही दवा खरीदता है जो डॉक्टर ने दवा कंपनी से कमीशन लेकर लिखा है।

स्याह सच 4- महंगी दवा हमें गरीब बना रही है

 हर साल 6 करोड़ भारतीय गरीबी रेखा के नीचे इसलिए जा रहे हैं, क्योंकि वो दवा का खर्च नहीं जुटा पाते। हर साल हमारे यहां 16 लाख कैंसर के मरीजों का पता चलता है जिनमें से आधे यानी 8 लाख दवा के अभाव में बगैर इलाज के मर जाते हैं।

स्रोत- संसदीय कमेटी की रिपोर्ट 2018 –

स्रोत- https://www.businesstoday.in/sectors/pharma/cancer-treatment-cost-pushes-6-crore-indians-below-poverty-line-yearly/story/390283.html#:~:text=Six%20crore%20Indian%20citizens%20are,annual%20mortality%20is%20eight%20lakh.

BMJ यानी British Medical Journal  की 6 जून 2018 की रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकारी अस्पतालल में मुफ्त दवा नहीं होने से, दवा पर एक भारतीय को अपनी जेब से 1993 में 60% खर्च करना पड़ता था जो 2011 में बढ़ कर दुनिया में सबसे ज्यादा 80% हो गया। ये इसलिए हुआ क्योंकि हमारी सरकार स्वास्थ्य पर कुछ खर्च ही नहीं करती।

स्रोत-https://www.thehindubusinessline.com/economy/rising-healthcare-costs-push-55-cr-indians-below-poverty-line/article24116816.ece

 2009 से 2018 तक हम अपनी जीडीपी का महज1.02% स्वास्थ्य पर खर्च करते आए हैं। पड़ोसी देश मालदीव का खर्च है 9.4 %…
दुनिया के सबसे गरीब, सबसे छोटे और कमजोर देश भी हमारे मुकाबले स्वास्थ्य पर कहीं ज्यादा खर्च कर रहे हैं।


देश प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर खर्च $
भारत 63
भूटान 91
श्रीलंका 118

इसे इस तरह समझिए कि हमारे यहां दवा, डायग्नोस्टिक और निजी अस्पताल एक प्रेसर ग्रुप की तरह काम करता है। इसकी ताकत कितनी है और ये किस तरह अपनी बात मनवाता है, उसे एक मिसाल से समझिए।

स्याह सच 5-हमारे देश में कई लोग हैं जो प्रधानमंत्री से ज्यादा ताकतवर हैं!

17 अप्रैल 2017 को सूरत में बोलते हुए प्रधानमंत्री ने कहा था  

‘आने वाले दिनों में सरकार वो कानूनी ढांचा तैयार करेगी जिसके तहत डाक्टरों को पर्ची में जेनरिक दवाएं लिखनी होंगी जो ब्रांडेड दवाओं के मुकाबले मरीजों को काफी सस्ती मिलेंगी”

नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री

प्रधानमंत्री जिस PMBJP यानी Pradhan Mantri Bharatiya Janaushadhi Pariyojana को देश में हर जगह पहुंचाने की बात कह रहे थे, उसकी असलियत ये है कि शायद आपको इस योजना के बारे में पता भी न होगा।

हम भारत के लोग अगर एक पल के लिए आम लोगों की सोचें तो दवा की कीमत में जिस फर्क की बात प्रधानमंत्री कह रहे थे, वो ये है …

दवा(10 पत्तों के पैक में)जेनरिक ब्रांडेड
Diclofenac SR3.3551.91
Ciprofloxacin 500mg21.50  97


आप इसी तरह से इस लिस्ट में लगभग 300 दवाएं जोड़ सकते हैं जो इसी तरह कोई पांच, कोई दस तो कोई बीस गुणी सस्ती है।

स्याह सच 6- गरीबों को दवा से दूर कौन रख रहा है ?

 ऐसे तीन समूह हैं जो गरीब मरीजों के सबसे बड़े दुश्मन के तौर पर सामने आए हैं।
1. IMA –Indian Medical Association- डाक्टरों का संगठन – प्रधानमंत्री के इस सुझाव के खिलाफ देश भर के डाक्टर मोर्चा खोले बैठे हैं। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के 2016 के नोटिफिकेशन के तहत डाक्टरों के लिए जेनरिक दवाएं लिखना जरूरी कर दिया गया है। लेकिन IMA का दावा है कि उसके लिए MCI का आदेश स्वैच्छिक है अनिवार्य नहीं। असली कहानी ये है कि दवाओं को पर्ची लिखते वक्त प्राइवेट कंपनी की दवा लिखने के लिए जो कमीशन मिलता है, वो बंद हो जाएगा।
2. IPA- Indian Pharmaceutical Alliance-दवा कंपनियों की संस्था- ये पूरी तरह जेनरिक दवाओं के खिलाफ है, क्योंकि जाहिर है जेनरिक आए तो इनकी दुकान ही बंद हो जाएगी।
3. DTAB – Drugs Technical Advisory Board को सरकार ने मई 2016 में कहा कि वो सुझाव दे कि क्या हम ड्रग एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940 की धारा 65 (11 ए) में संशोधन कर सकते हैं जिससे कि दवा दुकानदारों को ये हक मिल जाएगा कि डाक्टर ने चाहे पर्ची में जो भी ब्रांड लिखा हो लेकिन वो ब्रांड की बजाए उसका जेनरिक वर्सन मरीजों को बेच सकें। लेकिन DTAB ने बगैर किसी जेनरिक दवा की जांच किए सरकार को ये रिपोर्ट दे दी कि इनकी bio availability शायद उतनी अच्छी नहीं होगी जैसे कि ब्रांडेड दवाओं की होती है।

DTAB की वजह से जनहित के जिस अहम कदम से सरकार को पीछे हटना पड़ा, उसकी असलियत भी अब समझ लीजिए। DTAB ने जिस bio availability की बात कही ये वो शर्त है जो दुनिया में दवाओं के सबसे बड़े बाजार अमेरिका में भी सरकार ने जेनरिक दवाओं पर नहीं लगाया है। अमेरिकी सरकार या कहें कि FDA के नियम के मुताबिक जेनरिक दवाओं के लिए मरीजों पर होने वाले असर की जांच करने की जरूरत नहीं है, जेनरिक दवाएं जब खून में घुलती हैं तब ब्रांडेड दवाओं के मुकाबले उनका blood concentration 3% तक कम या ज्यादा हो सकता है जो दुनिया भर में मान्य है। जाहिर है हमारे यहां जेनरिक को झूठी दलीलो और साजिशों के तहत बदनाम किया जा रहा है। अगर ऐसा न होता तो तमिल नाडु और राजस्थान की सरकारों ने पब्लिक हेल्थ सिस्टम के तहत आने वाली दुकानों में सिर्फ जेनरिक दवाओं के खरीदने का कानून न बनाया होता।

अब आता है ये सवाल कि.. क्या जेनरिक दवाएं ब्रांडेड दवाओं की तरह कारगर हैं ? और फिर एक और सवाल कि दुनिया के दूसरे देश खास तौर पर विकसित देश इस बारे में क्या कर रहे हैं ?
चलिए आपको दवा की दुनिया के सबसे बड़े सच से रूबरू कराते हैं ये वो सच है जिसका जिक्र न तो कोई दवा कंपनी कभी करेगी और न ही कोई डाक्टर। सच ये है कि दवा का सबसे बड़ा बाजार अमेरिका भारत की तरह ब्रांडेड नहीं एक जेनरिक कंट्री है और बीते सालों में सरकार की नीति की वजह से जेनरिक दवाओं का कारोबार और कुल कारोबार में हिस्सा भी तेजी से बढ़ा है। अमेरिका में 2005 में कुल दवाओं की बिक्री में जेनरिक का हिस्सा लगभग 50% था जो 2016 में बढकर 84.6% हो गया है। अमेरिका के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक सरकार के इस कदम से अमेरिकी लोगों के इलाज के खर्च में 253 बिलियन $ (1 b$ =6500 करोड़ रुपये) की बचत हुई है। अमेरिका में जेनरिक दवा का कारोबार 2019 में 115.2 बिलियन $ था जिसके 2024 में 190बिलियन$ होने का अनुमान है।

स्रोत- https://www.globenewswire.com/news-release/2019/07/15/1882522/0/en/Global-Market-for-Generic-Drug-Size-Share-Will-Reach-to-USD-380-60-Billion-by-2021.html

 सारी दुनिया में जेनरिक दवा का कुल कारोबार 2021 में 380.60 बिलियन होने का अनुमान है।

स्रोत- https://www.imarcgroup.com/us-generics-market

 सवाल है जब अमेरिका जेनरिक कंट्री है, सारी दुनिया जेनरिक बन गई है, तो हम ब्रांडेड क्यों हैं ?

करीब चार साल पहले अखबार में खबर आई थी  कि मुकेश अंबानी को पीछे छोड़ कर एक व्यापारी चंद महीने के लिए भारत का सबसे अमीर शख्स बन गया है। इस शख्स का नाम है दिलीप सांघवी जो तकरीबन दो लाख करोड़ की M cap वाली भारत की सबसे बड़ी दवा कंपनी सन फार्मा के मालिक हैं।
अब सवाल है कि जब सन फार्मा ब्रांडेड कंपनी है तो वो जेनरिक बाजार अमेरिका में क्या कर रही है ? ये है दवा कंपनी का वो राज जो आज तक आपको किसी ने बताया नहीं।
पहले ये बताइए कि क्या आपने सन फार्मा, डा रेड्डीज लैब, सिपला, कैडिला जैसी कंपनियों के बारे में सुना है ? आप कहेंगे बिल्कुल। ये भारत की बड़ी ब्रांडेड दवा कंपनियां हैं। नहीं, एक दम झूठ । जिन्हें आप ब्रांडेड दवा कंपनियां कह रहे हैं और जिनके नाम पर, जिनका डाक्टर और मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव और एड पर खर्च को लेकर जेनरिक दवाओं की बिक्री आम दवा दुकानों पर नहीं हो रही, वो दरअसल जेनरिक कंपनियां हैं, एक बार फिर गौर से सुनिए जी हां ये सभी जेनरिक कंपनियां हैं और अगर विश्वास न हो तो अमेरिका में FDA की वेबसाइट से कंफर्म कर सकते हैं जहां रजिस्ट्रेशन और रेगुलेशन की मोटी फीस चुका कर ये तमाम तथाकथित हमारी ब्रांडेड दवा कंपनियां वहां जाकर जेनरिक कंपनियों के नाम से रजिस्टर्ड हो गई हैं।

तो खेल ये है कि हमारे यहां जेनरिक दवाओं तक गरीबों की पहुंच नहीं है, लेकिन ब्रांडेड के नाम पर महंगी दवाएं बनाने वाली कंपनियों की मोनोपोली जारी है। और यही कंपनियां अमेरिका जा कर वहां जेनरिक नाम पर दवाएं बेच रही हैं। अब सरकार को तय करना है कि वो किसके साथ है देश की गरीब जनता के साथ या उनकी जान से खिलवाड़ कर रहे लालची डाक्टरों के साथ, वो जेनरिक के साथ है या ब्रांडेड कंपनी के नाम पर लोगों को लूट रही फर्जी दवा कंपनियों के साथ। इस मामले में आपको हक है कि सरकार की खामोशी को भी एक जवाब मानें।

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