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एक एनकाउंटर की पटकथा

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एक एनकाउंटर की पटकथा

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विकास दुबे के एनकाउन्टर के अलौकिक समाचार से तीनों लोकों में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई है। समस्त नर-नारी, सुर-असुर, देवता-मुनि, यक्ष-गंधर्व प्रसन्न हैं। आगे भी सृष्टि के कल्याण हेतु हमारी पुलिस इस तरह के समाचार देती रहेगी।

विकास दुबे की पत्नी और बेटा

गैंग्सटर विकास दुबे की पत्नी और उसका नाबालिग बेटा यूपी पुलिस की गिरफ्त में हैं। कानून को खतरा न हो, इसलिए घुटनों पर बैठे नाबालिग ने अपराधी की तरह हाथ उठा रखे हैं। लेकिन कहानी ये नहीं है, कहानी वो है जो इसके बाद शुरू होती है।

https://www.youtube.com/watch?v=QQRs91H8ajo&feature=youtu.be

मैंने उसे सरेंडर करने को कहा, उल्टा उसने पुलिस पर फायर कर दिया….हां वो जिन्दा है…हम उसे अस्पताल ले जा रहे हैं, लेकिन उसके बचने की बहुत कम उम्मीद है

2004 में आई फिल्म खाकी का ये सीन एक टिपिकदल पुलिस एनकाउन्टर की कहानी है, जो सालों से बहुत थोड़े बदलाव के साथ कई थानों में लिखी गई है, सुनाई गई है और इस तरह से हमारे सिनेमा के प्लॉट में  स्थायी सीन में तब्दील हुई है।

आपने सिनेमा में एनकाउन्टर देखा, अब सुनिए यूपी पुलिस के एनकाउन्टर की पटकथा

2 जुलाई की रात जिस बेरहमी से विकास दुबे और उसके गुर्गों ने पुलिस वालों की हत्या की थी, उसके बाद ही ये तय हो गया था कि अब दुबे की जिन्दगी ज्यादा दिनों की मेहमान नहीं है। जिस जेसीबी से विकास ने पुलिस की गाड़ी को घर के करीब आने से रोका था, उसी जेसीबी से उसके घर को ढाह दिया गया, कैम्पस में रखी गाड़ियों को भी तहस-नहस कर पुलिस ने साफ संदेश दिया कि अब विकास दुबे पुलिस से किसी रहम की उम्मीद न करे। अलग-अलग एनकाउन्टर में मुठभेड़ और भागने की कोशिश के दौरान आत्मरक्षा में फायरिंग से पांच दिन में विकास गैंग के पांच गुर्गे प्रभात मिश्र, बउवा दुबे, अमर दुबे, अतुल दुबे और प्रेम प्रकाश को मार गिराया गया। विकास दुबे समझ गया कि अगर वो यूपी पुलिस की पकड़ में आया तो उसकी मौत तय है। लिहाजा उसने मध्यप्रदेश के उज्जैन में गिरफ्तारी दी। उसके साथ एक वकील भी था। जिस व्यक्ति ने खुद कभी कानून का सम्मान नहीं किया, उसे उम्मीद थी कि गिरफ्तारी के बाद उसे उज्जैन में मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाएगा। अगर ऐसा होता तो फिर उसे यहां से न्याय का संरक्षण हासिल हो जाता। लेकिन यूपी पुलिस ने मध्यप्रदेश पुलिस को इस बात के लिए मना लिया कि उसे कोर्ट में मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने के बजाय यूपी के एसटीएफ के हवाले कर दिया जाए।

यूपी एसटीएफ विकास दुबे को लेकर निकली तो देश भर का मीडिया एसटीएफ के काफिल के पीछे हो लिया। दुबे की मौत तय थी, बस जगह कौन सी होगी, ये जानने के लिए… ब्रेकिंग न्यूज देने के लिए, मीडिया एसटीएफ के काफिले के पीछे लगा रहा।  तेज बारिश के बीच मध्य प्रदेश में हाईवे पर एक ढाबे पर एसटीएफ की टीम खाना खाने रुकी तो मीडिया वालों से कहा गया कि हमारा पीछा न करें…इशारा साफ था…फैसला हो चुका था…अब बात सिर्फ टाइम और लोकेशन की थी। एनकाउन्टर की फर्स्ट ब्रेकिंग के लिए, प्रेस की गाड़ियां पीछे लगी रही। रात करीब 3:15 बजे झांसी बार्डर पर एसटीएफ की टीम ने फिर मीडिया को मनाने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी।   पुलिस काफिले के पीछे प्रेस वाले उरई, और फिर कानपुर देहात तक लगे रहे। अब कानपुर शहर पास आ गया था।
सुबह 6:30 बजे के आसपास कानपुर देहात के बारा टोल प्लाजा पर एसटीएफ की तीनों गाड़ियां तेजी से आगे निकल गई और प्रेस की गाड़ियों को सचेंडी पुलिस ने रोक दिया। अब मीडिया ब्रेकिंग का इंतजार कर रहा था।

 इसके बाद आधे घंटे तक यहां गाड़ियों की चेकिंग होती रही। फिर ब्रेकिंग न्यूज आ गई…. पुलिस की एक गाड़ी के पलटने और विकास दुबे के भागने की बात सामने आई। आधे घंटे देर से मौके पर पहुंचे मीडिया वालों को क्राइम सीन पर बताया गया कि पुलिस की जवाबी कार्रवाई में विकास दुबे घायल हो गया है और उसे अस्पताल ले जाया गया है..तब वक्त था सुबह के 07:12 बजे । विकास को चार गोलियां लगीं, इनमें से तीन उसके सीने पर लगी थीं।

विकास दुबे ने जो जिन्दगी अपने लिए चुनी थी, उसमें उसका यही अन्जाम होना था। अब इस बहादुरी के लिए पुलिस वालों का सम्मान भी होना तय है। लेकिन ये समझना जरूरी है कि एक बड़े शातिर अपराधी को जब पुलिस इस तरह मार गिराती है तो इसे बहादुरी नहीं कहा जाना चाहिए। बहादुरी तब होती, जब थाने में मंत्री की हत्या करने वाले विकास को पुलिस ने वहीं थाने में मार गिराया होता। लेकिन तब इस मामले में किसी ने गवाही तक नहीं दी, जिस वजह से विकास जेल के बाहर आ गया और आखिरकार बीते 2 जुलाई को उसने आठ पुलिस वालों की हत्या कर दी।  

 जब पुलिस विकास जैसे किसी हिस्ट्रीशीटर अपराधी को मार गिराती है तो संदेश ये जाता है कि जिन पुलिस वालों पर कानून के हिफाजत की बड़ी जिम्मेदारी है, उन्हें ही कानून पर … हमारे देश की न्याय व्यवस्था पर …भरोसा नहीं है। ये जरूरी है कि ऐसा कुछ न हो, जिससे अदालतों को लेकर जनमानस में सम्मान की भावना कम हो।

पुलिस का काम अपराधी को पकड़ कर कानून के हवाले करना है, इंसाफ अदालत करती है। पुलिस के फौरी इन्साफ से आम जनता को राहत और तसल्ली तो मिलती है, लेकिन जैसा कि तमिलनाडु मे तूतीकोरिन में पुलिस टार्चर में दो लोगों की हिरासत में मौत से साफ होता है कि बेलगाम पुलिस की कीमत आम लोगों को ही चुकानी पड़ती है।

https://www.youtube.com/watch?v=1oJ4E2LuIv4&feature=youtu.be

नाना पाटेकर की फिल्म  अब तक 56 पुलिस एनकाउन्टर को केंद्र में रख कर बनी शायद पहली फिल्म है। पुलिस बस एक मोहरा है… यहां अंडरवर्ल्ड का इस्तेमाल राजनीति में विरोधियों को खत्म करने के लिए किया जाता है, और जब अंडरवर्ल्ड में कोई ज्यादा तेजी से उभरने लगता है तो ईमानदार पुलिस अफसरों का इस्तेमाल उन्हें खत्म करने के लिए किया जाता है।

विकास दुबे या हैदराबाद रेप मामले के आरोपियों की एनकाउन्टर में मौत हमें बताता है कि पुलिस कई बार मुजरिमों को पकड़ने के लिए समाज और मीडिया के गहरे दबाव में आ जाती है। इस दबाव से उबरने के लिए वो एनकाउन्टर का सहारा लेती है। कई बार ये भी देखा गया है कि एनकाउन्टर की वजह से अपराधी नेता गठजोड़ की पूरी कहानी सामने नहीं आ पाती। यही वजह है कि हमारे देश की सबसे बड़ी अदालत ने एनकाउन्टर को लेकर बेहद सख्त प्रावधान तय किए हैं। विकाास दुबे के मौत की सीबीआई जांच की मांग को लेकर एक बार फिर देश की निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं।

 

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