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कुछ तो बात है ‘लालू के लाल’ में!

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कुछ तो बात है ‘लालू के लाल’ में!

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there is something special about tejaswi yadav

बिहार विधानसभा चुनाव (bihar election 2020) में जो लोग समझ रहे थे कि लालू प्रसाद के राजनीतिक परिदृश्य से हटते ही लालटेन की लौ बुझ जाएगी….उन्हें करारा झटका लगनेवाला है। तेजस्वी यादव (tejaswi yadav) ने हाल के दिनों में जिस तरह की राजनीतिक परिवपक्वता दिखाई है और जनता में अपनी पकड़ मजबूत की है, उससे साफ लगता है कि लालू प्रसाद की राजनीतिक विरासत इतनी आसानी से खत्म होने वाली नहीं है। तेजस्वी यादव की चुनावी सभाओं में जुटनेवाली भीड़ ना सिर्फ उनकी लोकप्रियता की गवाही दे रही है, बल्कि बदलाव की बयार के…आंधी बनने का संकेत भी दे रही है।

क्या है तेजस्वी यादव (tejaswi yadav) की यूएसपी?

सबसे अहम बात ये है कि तेजस्वी यादव (tejaswi yadav) कुशल वक्ता के रुप में उभर रहे हैं। पीएम मोदी या नीतीश कुमार की तरह वो सिर्फ अपनी बड़ाई करते नहीं दिखते, बल्कि लोगों से संवाद करते हैं। जनता के नब्ज पर भी उनकी खासी पकड़ है। जब वो जनता से पूछते हैं कि नौकरी चाहिए तो भीड़ खुशी से उछल पड़ती है। फिर जब वो बताते हैं कि सत्ता में आते ही पहली कैबिनेट बैठक में दस लाख नौकरियों के आदेश पर हस्ताक्षर कर देंगे…तो जनता को एकबारगी अपनी किस्मत पलटने का यकीन होने लगता है। उन्हें लगता है कि सीएम चाहे तो कुछ भी कर सकता है।

जनता उन पर इसलिए भी यकीन करना चाहती है कि उसके पास दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है। इससे पहले नीतीश कुमार पर यकीन किया, लेकिन धोखा खा गये। यही समस्या बीजेपी के साथ भी है। पीएम मोदी भी रोजगार के मोर्चे पर असफल रहे हैं, और बिहार के लोगों को इनसे भी वादों की फेहरिस्त के अलावा कुछ नहीं मिला। अब जनता की उम्मीद टूट चुकी है। ऐसे में जो भी वादा करेगा, और जिस में सीएम बनने की कूव्वत होगी…उसी पर यकीन कर लेंगे। तेजस्वी के लिए फायदे की एक बात ये है कि इन्होंने अभी कुछ किया ही नहीं है, इसलिए इनकी गलतियों या असफलताओं का स्लेट बिल्कुल साफ है। नीतीश कुमार को भी इनके खिलाफ कुछ नहीं मिलता…तो वो इनके पिता के कामकाज की याद दिलाते फिरते हैं।

नीतीश ने ही सिखाई है राजनीति

तेजस्वी यादव (tejaswi yadav) पहली बार तब जनता की नजरों में आए थे, जब 2015 में उन्होंने नीतीश कुमार के साथ गठबंधन सरकार में उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। लेकिन 2017 में ‘चाचा’ नीतीश ने इनसे किनारा कर लिया और बीजेपी के साथ सरकार बना ली। राजनीतिक तौर पर किसी युवा राजनेता के लिए ये बड़ा सबक था। सबक ये कि राजनीति में जरा सी लापरवाही और बेफिक्री भारी पड़ सकती है और कुर्सी छिन सकती है।

इसके बाद उन्होंने फिर 2019 के चुनाव में जोर लगाया, लेकिन बुरी तरह फेल रहे। राज्य की 40 लोकसभा सीटों में उन्हें एक भी हासिल नहीं हो सकी। इस असफलता ने उन्हें गठबंधन से जुड़ी समस्याओं और समीकरणों को समझने का मौका दिया। लेकिन तेजस्वी ने हार नहीं मानी। करीब एक महीने तक राजनीतिक परिदृश्य से गायब रहकर मंथन करते रहे और फिर पूरे उत्साह के साथ नीतीश सरकार के खिलाफ हवा बनानी शुरु कर दी।

चुनाव में दिखाई राजनीतिक सूझबूझ

तेजस्वी (tejaswi yadav) एक दिन में 12 से ज्यादा रैलियों को संबोधित कर रहे हैं। उनकी रैलियों में इस बार भारी भीड़ भी जुट रही है। उनके नजदीकी सूत्रों के मुताबिक तेजस्वी ने इस बार हर चीज पर खुद बारीकी से नजर रखा है और बेहतर मैनेजमेंट कर रहे हैं। जानकारों का मानना है कि जीतन राम मांझी, उपेंद्र कुशवाहा और मुकेश सहनी को उन्होंने जानबूझ कर गठबंधन से बाहर जाने दिया। उन्हें लगता है कि इस बार अगर अलग लड़े, तो ये महागठबंधन के नहीं बल्कि एनडीए के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाएंगे।

वहीं तेजस्वी यादव (tejaswi yadav) ने फीडबैक के आधार पर वाम दलों से हाथ मिलाया, और उन्हें अपने साथ चलने पर राजी कर लिया। ये भूलना नहीं चाहिए कि लालू प्रसाद की जिस जातिवादी राजनीति ने वाम आंदोलन को हाशिए पर किया, आज वामदल उसी राजनीति की शरण में जा रहे हैं। लेकिन तेजस्वी को पता था कि दलितों-पिछड़ों के वोट को एकजुट करने में ये गठबंधन सहायक सिद्ध होगा। साथ ही खास तौर मध्य बिहार में वाम दल उनकी पार्टी के उम्मीदवारों की जीत में मददगार साबित हो सकते हैं।

विपक्ष का हथियार, विपक्ष पर प्रहार

तेजस्वी यादव (tejaswi yadav) ने ना सिर्फ जेडीयू-बीजेपी सरकार की असफलताओं को अपना मुद्दा बनाया, बल्कि उनके अपने खिलाफ हो रहे प्रचार को हथियार बना लिया। रोजगार का मुद्दा ऐसा है, जिस पर ना तो बीजेपी कुछ कह सकती है और ना ही जेडीयू। तेजस्वी के भाषणों में ये मुद्दा छाया रहता है। सत्ताधारी दलों ने लालू राज के कीआतंक याद दिलाई, तो तेजस्वी ने अनंत सिंह जैसे बाहुबलियों को टिकट देने पर सवाल उठाने शुरु कर दिये। उनकी राजनीतिक अनुभवहीनता और शिक्षा पर सवाल उठते हैं, तो तेजस्वी कहते हैं कि खुद नीतीश कुमार ने उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाया था। उन्होंने उस वक्त ऐसी गलती क्यों की?

नीतीश कुमार ने लालू-राबड़ी की याद दिलाई, तो तेजस्वी यादव (tejaswi yadav) ने राजद के सभी पोस्टरों से अपने माता-पिता की तस्वीरें हटवा दीं। यानी आपके सामने तेजस्वी खड़ा है, तो उसकी बात कीजिए, लालू प्रसाद की नहीं। भविष्य की बात कीजिए, अतीत की नहीं। कुल मिलाकर तेजस्वी यादव (tejaswi yadav) के पास अपने खिलाफ उठनेवाले सभी सवालों के जवाब हैं, लेकिन जेडीयू-बीजेपी के पास इनके उठाये सवालों के जवाब नहीं हैं। यही बात उन्हें चुनाव प्रचार में बढ़त दिला रही है। इनका हौसला देखिये कि 31 साल के तेजस्वी, खुलेआम नीतीश कुमार जैसे अनुभवी और चतुर राजनीतिज्ञ को खुली बहस की चुनौती देते हैं, और वो कोई जवाब नहीं देते।

कमजोर हैं, पर कम नहीं

तेजस्वी यादव (tejaswi yadav) भले ही महागठबंधन की अगुवाई कर रहे हों, लेकिन इनके पास वैसा सपोर्ट सिस्टम नहीं हैं, जैसे इनके विरोधी दलों के पास। जदयू के पास पूरी सरकारी मशीनरी है, पीएम मोदी जैसे स्टार प्रचारक हैं, बीजेपी का मजबूत संगठनात्मक ढांचा है। कार्यकर्ताओं और समर्थकों की पूरी फौज है। लेकिन तेजस्वी के पास क्या है? राजद का बिखरा कुनबा…पिता की भ्रष्टाचार से बोझिल विरासत…कुल जमा 5 साल का राजनीतिक अनुभव…अपने अस्तित्व का संघर्ष कर रही कांग्रेस…और दलितों-पिछड़ों का खिसकता वोट बैंक?

लेकिन इन सबके बावजूद आज राजद नेता तेजस्वी यादव (tejaswi yadav), राजनीतिक गलियारों में सवालों के लिए नहीं… संभावनाओं के लिए जाने जा रहे हैं…जनता में नाकामी के लिए नहीं, उम्मीदों के लिए पहचाने जा रहे हैं…और सत्ता की रेस में पिछड़नेवाले नहीं, पछाड़नेवाले खिलाड़ी के रुप में देखे जा रहे हैं।

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