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तीन कहानियों से समझिए प्रेमचंद कितने बड़े कहानीकार हैं ?

जरुर पढ़ें संपादकीय

तीन कहानियों से समझिए प्रेमचंद कितने बड़े कहानीकार हैं ?

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31 जुलाई 1880 को प्रेमचंद का जन्म हुआ था। जयंती पर कलम के सिपाही के लिए विशेष।

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प्रेमचंद ने कलम उठाया तो हिन्दी भाषा और साहित्य में पहली बार आम जनता के दुख-सुख, उनकी हसरतों, उनके जीवन के बारीक कतरों को जगह मिली।

 भीष्म साहनी कहते हैं – प्रेमचंद के साहित्य को पढ़ते हैं तो इच्छा होती है कि हम वैसे ही हो जाएं, जैसा प्रेमचंद चाहते थे।

प्रेमचंद हिन्दी में एक तीखा मोड़ ले कर आए, अब न भाषा पहले जैसी रह गई न साहित्य।

एक रचनाकार के तौर पर प्रेमचंद अपनी रचना और अपने जीवन दोनों में आदर्श हैं। आज के भारत में  उनकी प्रासंगकिता  को किसी बयान के जरिए समझने के बजाए, आइए उनकी कहानियों के संदर्भ से समझने की कोशिश करते हैं।

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पहली कहानी- पंच परमेश्वर

जून 1916 में हिन्दी साहित्य की सबसे मशहूर मासिक पत्रिका सरस्वती में प्रेमचंद की एक कहानी छपी – पंच परमेश्वर। कहानी दो दोस्तों की है, अलगू चौधरी और जुम्मन शेख की। जुम्मन ने खाला की जायदाद हथिया ली तो खाला ने अलगू को पंच बनाया।

क्यों ….?  

खाला—बेटा, क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे?

कुछ अरसे बाद  पंच बनने की बारी जुम्मन शेख की थी

आज मुझे ज्ञात हुआ कि पंच के पद पर बैठ कर न कोई किसी का दोस्त है, न दुश्मन। न्याय के सिवा उसे और कुछ नहीं सूझता। आज मुझे विश्वास हो गया कि पंच की जबान से खुदा बोलता है।

क्या आज के दिन पंच में परमेश्वर का वास है? क्या प्रेमचंद की ये कहानी हमारे यहां जजों को पढ़नी चाहिए ?

दूसरी कहानी – ईदगाह

ईदगाह को अमीना और हामिद यानी दादी -पोते रिश्ते की कहानी के तौर पर देखा जाता है…इस कहानी में एक सच हमारी पुलिस का भी है …..

यह पुलिस लाइन है। यहीं सब कानिसटिबिल कवायद करते हैं। रैटन! फाय फो! रात को बेचारे घूम-घूमकर पहरा देते हैं, नहीं चोरियाँ हो जाएँ। मोहसिन ने प्रतिवाद किया—यह कानिसटिबिल पहरा देते हें? तभी तुम बहुत जानते हों अजी हजरत, यह चोरी करते हैं। शहर के जितने चोर-डाकू हें, सब इनसे मुहल्ले में जाकर ‘जागते रहो! जाते रहो!’ पुकारते हें। तभी इन लोगों के पास इतने रूपये आते हें। मेरे मामू एक थाने में कानिसटिबिल हें। बरस रूपया महीना पाते हें, लेकिन पचास रूपये घर भेजते हें। अल्ला कसम! मैंने एक बार पूछा था कि मामू, आप इतने रूपये कहाँ से पाते हैं? हँसकर कहने लगे—बेटा, अल्लाह देता है। फिर आप ही बोले—हम लोग चाहें तो एक दिन में लाखों मार लाएँ। हम तो इतना ही लेते हैं, जिसमें अपनी बदनामी न हो और नौकरी न चली जाए। 

प्रेमचंद नहीं रहे, ईदगाह भी लोग भूलने लगे हैं, लेकिन जामिया से जेएनयू तक हैदराबाद से तूतीकोरिन और लखनऊ तक ईदगाह वाली पुलिस आज भी मौजूद है।  

तीसरी कहानी –कफन

साल था 1936… यानी जिस साल जयशंकर प्रसाद कामायनी लिखते हैं। जिस साल ब्रिटेन में जॉन मेनार्ड कीन्स general theory of employment का सिद्धांत देते हैं.. दुनिया में पहली बार किसी अर्थशास्त्री ने कहा कि रोजगार बढ़ाना है तो सरकार खर्च बढ़ाए। इसी साल प्रेमचंद लिखते हैं अपनी –आखिरी  कहानी  …हिन्दी साहित्य की…सबसे बड़ी कहानी…कफन  

खेत से चुराए आलू छील कर खाते बाप-बेटे… घीसू और माधव… और झोपड़ी के अंदर प्रसव पीड़ा से पछाड़ खाती बहू बुधिया ….बेटा अंदर जाकर पत्नी को इसलिए नहीं देखता  कि कहीं बाप सारे बचे आलू न खा ले …जिस स्त्री ने साल भर इनका जतन से ख्याल रखा उसके लिए उसकी भावना ये है कि —मरना ही तो है जल्दी मर क्यों नहीं जाती? देखकर क्या करूँ?

कहानी का एक हिस्सा है–

बाज़ार में पहुँचकर घीसू बोला-लकड़ी तो उसे जलाने-भर को मिल गयी है, क्यों माधव!

माधव बोला-हाँ, लकड़ी तो बहुत है, अब कफ़न चाहिए।

‘तो चलो, कोई हलका-सा कफ़न ले लें।’

‘हाँ, और क्या! लाश उठते-उठते रात हो जाएगी। रात को कफ़न कौन देखता है?’

‘कैसा बुरा रिवाज है कि जिसे जीते जी तन ढाँकने को चीथड़ा भी न मिले, उसे मरने पर नया कफ़न चाहिए।’

‘कफ़न लाश के साथ जल ही तो जाता है।’

‘और क्या रखा रहता है? यही पाँच रुपये पहले मिलते, तो कुछ दवा-दारू कर लेते।’

कफन गरीब के भूख की कहानी नहीं है, वो सामाजिक मर्यादा की कहानी भी नहीं है(अबे, कह देंगे कि रुपये कमर से खिसक गये। बहुत ढूँढ़ा, मिले नहीं। लोगों को विश्वास न आएगा, लेकिन फिर वही रुपये देंगे।) ये  निम्न वर्ग के सामाजिक अलगाव और आक्रोश की कहानी है — (जिसे जीते जी तन ढाँकने को चीथड़ा भी न मिले, उसे मरने पर नया कफ़न चाहिए)

एक लेखक और रचनाकार के तौर पर प्रेमचंद की सबसे बड़ी कामयाबी ये है कि उन्होंने मध्यवर्ग के असली चरित्र को पहचान लिया था। उन्होंने समझ लिया था कि जिस वर्ग से देश बदलाव की उम्मीद लगाए बैठा था, दरअसल वो मध्यवर्ग सिर्फ दिखावे के लिए निम्न वर्ग के नुमाएंगे के तौर पर खुद को पेश कर रहा था, उसकी असली फितरत और हसरत उच्च वर्ग में शामिल होने की थी। इसलिए 1936 के भारत में प्रेमचंद गोदान रचते हैं तो महाकाव्य सी इस रचना में रायसाहब, खन्ना, मिस्टर मेहता बस हाशिए के किरदार हैं और केंद्र में है सीमांत किसान होरी महतो। प्रेमचंद के साहित्य को समझना, देश मे अस्सी-नब्बे आबादी के सच को महसूस करना है। ये हरगिज सुखद एहसास नहीं है, हो भी क्यों?

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